
NEET-PG 2025-26 के लिए योग्यता कट-ऑफ प्रतिशत कम करने के फैसले को लेकर विवाद गहरा गया है। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्ज़ामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) द्वारा जारी नोटिस के खिलाफ अब सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इस संशोधन से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
कट-ऑफ में असामान्य गिरावट: विरोध की शुरुआत
13 जनवरी 2026 को NBEMS ने एक नोटिस जारी कर NEET-PG की क्वालिफाइंग कट-ऑफ में भारी कमी की घोषणा की। याचिका के अनुसार, संशोधित कट-ऑफ को इतना कम कर दिया गया कि कुछ श्रेणियों में यह शून्य, और आरक्षित वर्गों के लिए -40 अंक तक पहुंच गया। इससे निम्न स्कोर वाले अभ्यर्थी भी मेडिकल पीजी कोर्सेस के लिए योग्य माने जाने लगे।
फैसले के बाद डॉक्टर संगठनों, विशेषज्ञों और अभ्यर्थियों ने इसे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता के लिए खतरा बताते हुए तीखा विरोध शुरू कर दिया।
कौन-कौन पहुंचे सुप्रीम कोर्ट?
यह जनहित याचिका चार याचिकाकर्ताओं- सामाजिक कार्यकर्ता हरीशरण देवगन, न्यूरोसर्जन डॉ. सौरव कुमार, यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल और वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉ. आकाश सोनी- द्वारा दायर की गई है। इनका कहना है कि NBEMS का नोटिस मनमाना, अवैज्ञानिक, और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
क्या है विवाद?
13 जनवरी को NBEMS ने NEET-PG कट-ऑफ में संशोधन किया। कट-ऑफ प्रतिशत को इतना ज्यादा कम किया गया कि कुछ के लिए यह शून्य तक पहुंच गया।आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार -40 स्कोर के साथ भी पात्र हो गए। डॉक्टर समुदाय ने इसे मेडिकल पेशे के मानकों के साथ समझौता बताया। विरोध के बादअब सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी गई है।
‘यह फैसला संविधान के खिलाफ’
अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में कहा गया है कि कट-ऑफ में यह अत्यधिक ढील संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करती है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि चिकित्सा शिक्षा सीधे मानव जीवन और सुरक्षा से जुड़ी है। खाली सीटों को भरने के लिए मेरिट के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। इतनी कम कट-ऑफ ने प्रतियोगी परीक्षा को औपचारिकता बना दिया है। यह कदम भविष्य के डॉक्टरों की गुणवत्ता और पेशेवर मानकों को प्रभावित करेगा। यह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 की भावना के भी खिलाफ है।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर जल्द सुनवाई की उम्मीद है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ चाहते हैं कि अदालत इस फैसले पर विस्तृत जांच करे, ताकि मेडिकल शिक्षा और मरीजों की सुरक्षा के मानकों से समझौता न हो।
NBEMS पहले भी कट-ऑफ में संशोधन के लिए आलोचनाओं का सामना कर चुका है, लेकिन इस बार कट-ऑफ को शून्य और नकारात्मक स्तर तक ले जाने के फैसले ने बहस को और तेज कर दिया है।




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