
भारत में हरित क्रांति ने सिंचाई और उर्वरकों के दम पर खेती को नई दिशा दी थी। अब अगली बड़ी कृषि क्रांति जीनोमिक्स, जीन एडिटिंग और स्वदेशी तकनीकों के सहारे आकार ले रही है। इस बदलाव के केंद्र में ICAR-राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान का एक अहम शोध है, जिसने फसल विज्ञान में नई उम्मीद जगाई है।
इस संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. कुतुबुद्दीन अली मोल्ला द्वारा विकसित जीन एडिटिंग टूल ‘TnpB’ को भारत का जवाब माना जा रहा है, जो वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल होने वाली CRISPR-Cas9 तकनीक का विकल्प बन सकता है। CRISPR-Cas9 जहां पेटेंट के कारण महंगा और सीमित उपयोग वाला है, वहीं TnpB न केवल आकार में छोटा है, बल्कि ज्यादा सटीक और पेटेंट प्रतिबंधों से मुक्त भी है। इसका छोटा आकार इसे पौधों की कोशिकाओं में आसानी से प्रवेश करने में मदद करता है और एक साथ कई जीन में बदलाव (मल्टीप्लेक्स एडिटिंग) संभव बनाता है।
खेती के लिहाज से यह एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। सूखा सहन करने की क्षमता, कीट प्रतिरोध और अधिक उत्पादन जैसे गुण किसी एक जीन से नहीं, बल्कि कई जीन के मेल से तय होते हैं। ऐसे में एक साथ कई जीन में बदलाव करने की क्षमता वैज्ञानिकों को तेजी से ऐसी फसलें विकसित करने में मदद कर सकती है, जो जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना कर सकें। भारत जैसे देश के लिए यह बेहद जरूरी है, जहां बदलते मौसम का असर खेती पर साफ दिखाई दे रहा है।
भारत ने इस दिशा में कदम भी बढ़ा दिए हैं। वर्ष 2025 में जीनोम एडिटेड धान की किस्मों के व्यावसायिक उपयोग को मंजूरी दी जा चुकी है। ये फसलें पारंपरिक जीएम फसलों से अलग हैं, क्योंकि इनमें बाहरी डीएनए नहीं जोड़ा जाता। इसी वजह से इन्हें आमतौर पर कम नियामकीय बाधाओं और कम सार्वजनिक चिंता का सामना करना पड़ता है।
इस तकनीक का दायरा सिर्फ धान तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक दलहन और तिलहन फसलों में भी इसी तरह के प्रयोग कर रहे हैं। ये दोनों क्षेत्र ऐसे हैं जहां भारत अभी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। अगर देश में इनकी उत्पादन क्षमता बढ़ती है, तो आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और किसानों की आय में भी सुधार होगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि 2026 इस बदलाव के लिए अहम साल साबित हो सकता है। इसकी वजह यह है कि नीति, विज्ञान और तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने की क्षमता—तीनों एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। भारत में नियामकीय ढांचा अब ज्यादा अनुकूल हो रहा है, स्वदेशी तकनीकें विकसित हो रही हैं और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप भी मजबूत हो रही है। इससे कृषि नवाचार का एक स्थायी इकोसिस्टम तैयार हो सकता है।
अब खेती का मतलब सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं रह गया है, बल्कि स्मार्ट तरीके से गुणवत्ता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी हो गया है। जीन एडिटिंग जैसी तकनीकें बीज से लेकर थाली तक पूरे खाद्य तंत्र को बदलने की क्षमता रखती हैं।
सबसे अहम बात यह है कि अब प्रयोगशाला और रसोई के बीच की दूरी तेजी से कम हो रही है। यानी जो शोध आज लैब में हो रहा है, वह जल्द ही किसानों के खेतों और आम लोगों की थाली तक पहुंच सकता है—और यही भारत की नई कृषि क्रांति की असली पहचान होगी।




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