
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी के एक नए अनिवार्य पाठ्यक्रम को लेकर देशभर में बहस शुरू हो गई है। संस्थान ने अपने पाठ्यक्रम में पुनर्जन्म (Reincarnation), मृत्यु-समीप अनुभव (Near-Death Experience), शरीर से बाहर के अनुभव (Out-of-Body Experience) और सूक्ष्म शरीर (Subtle Body) जैसे विषयों को शामिल किया है। इन विषयों को अनिवार्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने के बाद कई शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने इस पर सवाल उठाए हैं।
इसी क्रम में मार्कजी तालीमी बोर्ड (MTB) के चेयरमैन और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) जयपुर के पूर्व प्रोफेसर मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि किसी प्रमुख वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थान में ऐसे विषयों को अनिवार्य रूप से पढ़ाने से पहले उनके वैज्ञानिक आधार और शैक्षणिक औचित्य की गहन समीक्षा होनी चाहिए।
क्या है पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब IIT मंडी के एक नए कोर्स में चेतना (Consciousness) और मानव अनुभव से जुड़े विषयों के तहत पुनर्जन्म, मृत्यु-समीप अनुभव, शरीर से बाहर के अनुभव और सूक्ष्म शरीर जैसे अध्याय शामिल किए गए। इन विषयों को लेकर सोशल मीडिया और शैक्षणिक जगत में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
समर्थकों का तर्क है कि चेतना और मानव अनुभव पर दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में भी शोध किए जाते हैं और ऐसे विषयों का अध्ययन अकादमिक दृष्टि से किया जा सकता है। वहीं आलोचकों का कहना है कि यदि इन अवधारणाओं को अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो उनके पीछे उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों और शोध का स्पष्ट आधार होना चाहिए।
प्रो. मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने क्या कहा?
मार्कजी तालीमी बोर्ड के चेयरमैन प्रो. मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने कहा कि IIT जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में किसी भी विषय को अनिवार्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से पहले उसकी वैज्ञानिक वैधता, शैक्षणिक प्रासंगिकता और संवैधानिक पहलुओं की गंभीर समीक्षा आवश्यक है।
उनका कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ाए जाने वाले सभी विषयों का मूल्यांकन समान वैज्ञानिक मानकों पर होना चाहिए। यदि कोई विषय प्रमाण-आधारित वैज्ञानिक शोध पर आधारित नहीं है, तो उसे अनिवार्य रूप से पढ़ाने के निर्णय पर व्यापक अकादमिक चर्चा होनी चाहिए।
NEP 2020 का भी दिया हवाला
प्रो. सलीम ने अपनी प्रतिक्रिया में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह नीति छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक सोच और प्रमाण-आधारित तर्क विकसित करने पर जोर देती है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पुनर्जन्म और मृत्यु-समीप अनुभव जैसे विषयों का मूल्यांकन भी उन्हीं वैज्ञानिक मानकों के आधार पर किया गया है, जिनका पालन इंजीनियरिंग और विज्ञान के अन्य विषयों में किया जाता है।
धार्मिक और दार्शनिक अध्ययन के रूप में पढ़ाने का सुझाव
प्रो. सलीम इंजीनियर का मानना है कि यदि इन विषयों का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक या दार्शनिक परंपराओं को समझाना है, तो इन्हें तुलनात्मक धर्म अध्ययन (Comparative Religion) या अंतर्विषयक अध्ययन (Interdisciplinary Studies) के हिस्से के रूप में पढ़ाया जाना अधिक उपयुक्त होगा।
उनके अनुसार, इस तरह के पाठ्यक्रम में इस्लाम, हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म और अन्य दार्शनिक परंपराओं का संतुलित और वस्तुनिष्ठ अध्ययन कराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय इसी तरह के शैक्षणिक मॉडल का पालन करते हैं।
IIT मंडी की ओर से क्या स्थिति है?
IIT मंडी ने इस पाठ्यक्रम को चेतना अध्ययन (Consciousness Studies) और मानव अनुभव से जुड़े व्यापक अकादमिक विमर्श के संदर्भ में तैयार किया है। संस्थान का उद्देश्य इन विषयों पर उपलब्ध शोध, विभिन्न दृष्टिकोणों और दार्शनिक विचारों को छात्रों के सामने रखना है। हालांकि, इस विवाद पर संस्थान की ओर से अब तक ऐसी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है जिसमें पाठ्यक्रम में बदलाव या उसे वापस लेने की बात कही गई हो।
क्यों महत्वपूर्ण है यह बहस?
यह विवाद केवल एक पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह बड़ा सवाल भी जुड़ा है कि देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में विज्ञान, दर्शन और चेतना अध्ययन जैसे विषयों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए। एक पक्ष इसे नए शोध क्षेत्रों की ओर बढ़ता कदम मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष वैज्ञानिक प्रमाणों और अकादमिक मानकों को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस विषय पर विशेषज्ञ समितियां, शिक्षा नीति से जुड़े संस्थान और IIT मंडी किस तरह का रुख अपनाते हैं। फिलहाल यह मुद्दा उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और पाठ्यक्रम निर्माण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।




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