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NCERT की नई किताब में न्यायपालिका पर टिप्पणी क्यों बना बड़ा मुद्दा?

NCERT की नई किताब में न्यायपालिका पर टिप्पणी क्यों बना बड़ा मुद्दा?

NCERT की नई किताब में न्यायपालिका पर टिप्पणी क्यों बना बड़ा मुद्दा?

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक एक बड़े विवाद में घिर गई है। किताब के एक अध्याय में न्यायपालिका से जुड़े भ्रष्टाचार और लंबित मामलों पर चर्चा की गई है, जिस पर Supreme Court of India ने सख्त आपत्ति जताई है। अदालत ने इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए टिप्पणी की है और अब आशंका है कि यह अध्याय पूरी तरह हटाया जा सकता है।

मामला सिर्फ एक अध्याय का नहीं, बल्कि शिक्षा और न्याय व्यवस्था के बीच संतुलन की उस बहस का है जो हाल के वर्षों में कई बार सामने आई है।

किताब में आखिर लिखा क्या है?

कक्षा आठ की नई सामाजिक विज्ञान की किताब में ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक से एक अध्याय जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य न्यायपालिका की संरचना और चुनौतियों को समझाना था, लेकिन किताब में कुछ ऐसे बिंदु शामिल किए गए जिन पर विवाद खड़ा हो गया।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर टिप्पणी

अध्याय में लिखा गया है कि आम लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करते हैं, जिससे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों के लिए न्याय तक पहुंच और मुश्किल हो जाती है। किताब में न्यायाधीशों की आचार संहिता, जवाबदेही तंत्र और केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) का भी जिक्र है, जिसके माध्यम से 2017–2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतों के दर्ज होने की जानकारी दी गई है।

किताब में पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई के जुलाई 2025 के बयान को भी शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार के मामलों में पारदर्शी और निर्णायक कार्रवाई से न्यायपालिका पर जनता का भरोसा दोबारा मजबूत किया जा सकता है।

लंबित मामलों का दबाव

पुस्तक में अदालतों में लंबित मामलों की गंभीरता को भी रेखांकित किया गया है। इसमें बताया गया है कि न्यायाधीशों की कमी, जटिल प्रक्रियाएं और कमजोर बुनियादी ढांचा भारी बैकलॉग की मुख्य वजह हैं।

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी क्यों?

इस मुद्दे को अदालत में सबसे पहले वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal और Abhishek Manu Singhvi ने उठाया। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने इस पाठ पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें इस संबंध में कई संदेश और फोन कॉल मिले हैं और कुछ हाई कोर्ट जज भी इस सामग्री से परेशान हैं। उन्होंने इसे न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने की “सोची-समझी कोशिश” बताया।

पुरानी किताब में क्या था?

एनसीईआरटी की पिछली किताब में न्यायपालिका का जिक्र तो था, लेकिन उसमें इसकी संरचना, स्वतंत्रता, अदालतों के प्रकार, जजों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया पर ही ध्यान दिया गया था। भ्रष्टाचार या लंबित मामलों को उस तरह से उजागर नहीं किया गया था जैसा कि नई किताब में किया गया है।

विवादों से घिरा एनसीईआरटी: यह पहली बार नहीं

एनसीईआरटी पिछले कुछ वर्षों में कई बार पाठ्यक्रम बदलावों को लेकर चर्चा में रहा है। हाल के विवादों पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है।

1. भारत विभाजन पर नए मॉड्यूल का विवाद

एनसीईआरटी ने कक्षा 6–12 के लिए दो विशेष मॉड्यूल जारी किए थे, जिनमें विभाजन की जिम्मेदारी जिन्ना, कांग्रेस और लॉर्ड माउंटबेटन पर केंद्रित की गई थी। कई विपक्षी दलों ने इसे इतिहास को “एकतरफा” तरीके से पेश करने का आरोप लगाया था।

2. संवेदनशील विषयों को हटाना

2024 में राजनीति विज्ञान की किताबों से बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगे और अल्पसंख्यकों से जुड़े अध्याय हटाए गए। एनसीईआरटी का कहना था कि ये परिवर्तन “नए राजनीतिक संदर्भ” के अनुरूप किए गए हैं।

3. मुगल इतिहास में बदलाव

2025 में इतिहास की किताबों में दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के वर्णन में बड़े बदलाव किए गए। कई अध्यायों में मुगल शासन को असहिष्णु बताया गया। हालांकि, साथ ही यह भी जोड़ा गया कि इतिहास को पढ़ते समय आज के संदर्भ में किसी पर दोषारोपण नहीं किया जाना चाहिए।

क्या यह अध्याय हटेगा?

सुप्रीम कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया के बाद यह चर्चा तेज है कि विवादित अध्याय को हटाया जा सकता है। हालांकि, इस पर अंतिम निर्णय एनसीईआरटी या मंत्रालय की ओर से अभी नहीं आया है। लेकिन इतना तय है कि यह विवाद न्यायपालिका, शिक्षा व्यवस्था और इतिहास लेखन के बीच खिंची उस रेखा को फिर सामने ले आया है, जिसके इर्द-गिर्द भारत में पाठ्यपुस्तकों की बहस लंबे समय से चलती रही है।

Asmita Sarkar

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