
सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को मिलने वाले आरक्षण को लेकर Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि OBC वर्ग में क्रीमी लेयर तय करने के लिए केवल माता-पिता की सैलरी को आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके साथ-साथ यह भी देखना जरूरी है कि माता-पिता किस पद पर कार्यरत हैं और उनकी सामाजिक स्थिति क्या है।
अदालत के इस फैसले से उन कई उम्मीदवारों को राहत मिली है, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद नियुक्ति नहीं पा सके थे। दरअसल, सरकार ने उन्हें क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया था, जिसके कारण वे OBC आरक्षण के लाभ से बाहर हो गए थे। इन उम्मीदवारों में कई ऐसे थे जिनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों या अन्य संस्थानों में कार्यरत थे।
यह विवाद उस समय सामने आया जब कुछ सफल उम्मीदवारों को नियुक्ति से वंचित कर दिया गया। सरकार ने 14 अक्टूबर 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र का हवाला देते हुए कहा था कि यदि किसी PSU या निजी क्षेत्र की नौकरी को सरकारी पद के समकक्ष तय नहीं किया गया है, तो क्रीमी लेयर का निर्धारण माता-पिता की आय के आधार पर किया जा सकता है। इसी आधार पर जिन उम्मीदवारों के माता-पिता की आय निर्धारित सीमा से अधिक थी, उन्हें OBC आरक्षण से बाहर कर दिया गया।
इस फैसले को कई उम्मीदवारों ने पहले प्रशासनिक न्यायाधिकरण और बाद में अलग-अलग उच्च न्यायालयों में चुनौती दी। Central Administrative Tribunal तथा Madras High Court, Delhi High Court और Kerala High Court ने उम्मीदवारों के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने इन निर्णयों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि 1993 का वह ऑफिस मेमोरेंडम, जो Indra Sawhney Judgment के बाद लागू किया गया था, उसमें साफ तौर पर लिखा है कि क्रीमी लेयर तय करते समय माता-पिता की सैलरी और कृषि आय को एक साथ जोड़कर मुख्य आधार नहीं बनाया जाएगा। उस नीति में माता-पिता का पद और उनकी सामाजिक स्थिति को प्रमुख मानदंड माना गया था, जबकि आय को कुछ मामलों में सहायक मानदंड के रूप में देखा गया था।
अदालत ने कहा कि केवल सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर तय करना नीति और कानून दोनों की भावना के खिलाफ है। ऐसा करने से सार्वजनिक क्षेत्र या निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ भेदभाव की स्थिति पैदा हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए निर्देश दिया कि इस फैसले को छह महीने के भीतर लागू किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि जरूरत पड़े तो प्रभावित उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त पद भी बनाए जा सकते हैं, ताकि उन्हें न्याय मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला OBC आरक्षण की मूल भावना को स्पष्ट करता है और यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी जरूरत है।




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