
महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, नागपुर ने “Four Decades of the NDPS Act, 1985: Jurisprudential Evolution, Contemporary Challenges, and a Roadmap towards a Drug-Free India by 2047” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन में देशभर से आए विधि विशेषज्ञों, प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारियों, शिक्षाविदों और छात्रों ने मादक पदार्थ नियंत्रण कानून, उसकी चुनौतियों और आगे की रणनीति पर विस्तृत चर्चा की।
कार्यक्रम की शुरुआत सम्मेलन समन्वयक डॉ. त्रिशा मित्तल के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि NDPS कानून के 40 वर्ष पूरे होने के बाद अब इसके न्यायशास्त्रीय आधार, संस्थागत संरचना और बदलते अपराध स्वरूपों की पुनर्समीक्षा जरूरी है। मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) जी.एस. बाजपेयी, कुलपति – नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली, ने वर्चुअल माध्यम से NDPS मामलों में जांच, ट्रायल और जमानत से जुड़े जटिल पहलुओं को रेखांकित किया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) विजेंद्र कुमार ने कहा कि “2047 तक नशा-मुक्त भारत कोई नारा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी संवैधानिक जिम्मेदारी है।”
ड्रग तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग पर गहन विमर्श
पहले तकनीकी सत्र में एनसीबी के अमित घावते, ईडी के मयंक माखिजा और UNODC की सीमा जोशी ने सहभागिता की। अमित घावते ने NDPS कानून के प्रवर्तन और भारत की सप्लाई-डिमांड रिडक्शन रणनीति की रूपरेखा समझाई। मयंक माखिजा ने NDPS और PMLA के बीच संबंधों को व्याख्यायित करते हुए बताया कि ड्रग तस्करी अक्सर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी होती है। वहीं सीमा जोशी ने वैश्विक स्तर पर रोकथाम, उपचार और पुनर्वास आधारित मॉडल को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
नशा-मुक्ति और पुनर्वास को स्वास्थ्य-केंद्रित दृष्टिकोण से जोड़ने की वकालत
दूसरे सत्र में पुलिस अधिकारी हर्ष पोद्दार, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पुनर्वास केंद्रों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने कहा कि नशे की समस्या को केवल अपराध की नजर से नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देखने की जरूरत है। युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए, पुनर्वास, काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर एकीकरण की आवश्यकता बताई गई। सामाजिक कलंक और पुनः लत जैसी चुनौतियों को भी गंभीर मुद्दे के रूप में सामने रखा गया।
कानूनी संतुलन, जांच और बचाव अधिकारों पर महत्वपूर्ण चर्चा
तीसरे पूर्ण सत्र में वरिष्ठ वकील विक्रम चौधरी, अधिवक्ता तनवीर अहमद मीर और पूर्व एनसीबी अधिकारी समीर वानखेड़े शामिल हुए। समीर वानखेड़े ने NDPS कानून के कठोर प्रावधानों और प्रवर्तन स्तर पर आने वाली चुनौतियों को समझाया। विक्रम चौधरी ने कहा कि बचाव पक्ष न्यायिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। तनवीर मीर ने अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष प्रक्रिया और अभियुक्त के अधिकारों पर बल दिया। सत्र के दौरान “fruit of the poisonous tree” सिद्धांत, साक्ष्य की विश्वसनीयता और जांच की पारदर्शिता जैसे कई महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर भी चर्चा हुई।
उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए सम्मान
समापन सत्र में सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र का पुरस्कार शिवकुमार अय्यर को दिया गया, जबकि गौरांगी बी. नाइक को द्वितीय स्थान मिला। सम्मेलन को सफल बनाने में विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों और छात्र समन्वयकों का विशेष योगदान रहा।
दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ने NDPS कानून के चार दशकों की यात्रा, उसकी न्यायशास्त्रीय प्रगति, मौजूदा चुनौतियों और भविष्य की दिशा को गहराई से समझने का अवसर दिया। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि 2047 तक नशा-मुक्त भारत का लक्ष्य केवल कठोर कानूनी प्रावधानों से पूरा नहीं होगा, बल्कि इससे जुड़ी सामाजिक, स्वास्थ्य और पुनर्वास नीतियों को एकीकृत तरीके से मजबूत करने की आवश्यकता है। यह सम्मेलन इसी व्यापक दृष्टिकोण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।




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