
केंद्र सरकार की नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के उम्मीदवारों को उम्र सीमा में छूट और अतिरिक्त प्रयास (अटेम्प्ट) देने की मांग पर दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने साफ रुख अपनाते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार का नीतिगत फैसला न तो मनमाना है और न ही संविधान के खिलाफ।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि EWS श्रेणी के उम्मीदवारों को उम्र या प्रयासों में छूट देने के लिए अदालत ‘रिट ऑफ मैंडमस’ जारी नहीं कर सकती। कोर्ट के मुताबिक, यह पूरी तरह नीति से जुड़ा मामला है, जिसमें हस्तक्षेप का दायरा सीमित है।
यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा था, जिनमें केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 31 जनवरी 2019 के ऑफिस मेमोरेंडम, 2022 के FAQs और संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) की सिविल सेवा परीक्षा 2024 की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि Constitution (103rd Amendment) Act, 2019 के तहत EWS को 10 प्रतिशत आरक्षण तो दिया गया, लेकिन SC, ST और OBC की तरह उम्र और प्रयासों में कोई छूट नहीं दी गई, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि EWS श्रेणी के लिए तय पात्रता मानदंड जानबूझकर सख्त रखे गए हैं, ताकि केवल वास्तविक आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही इसका लाभ उठा सकें। साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमाएं होती हैं और हर नीति संबंधी फैसले में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
फैसले में यह भी कहा गया कि विधायिका ने EWS वर्ग की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आरक्षण का प्रावधान किया है। लेकिन उम्र में छूट या अतिरिक्त प्रयास जैसे मुद्दों पर निर्णय लेते समय प्रशासनिक व्यवहार्यता, वित्तीय प्रभाव और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर पड़ने वाले असर जैसे कई पहलुओं पर विचार करना जरूरी होता है। ऐसे फैसले मूल रूप से सरकार और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि अलग-अलग राज्यों और केंद्र सरकार की नीतियों में समानता की मांग नहीं की जा सकती। भर्ती से जुड़ी शर्तें—जैसे अधिकतम उम्र और परीक्षा के प्रयासों की संख्या—संबंधित एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।
साथ ही अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 342A का हवाला देते हुए कहा कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की केंद्र और राज्य की सूचियां अलग-अलग होती हैं। ऐसे में अगर कोई समुदाय केंद्र की सूची में शामिल नहीं है, तो वह केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण या उससे जुड़ी छूट का दावा नहीं कर सकता।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि सिविल सेवा परीक्षा 2024 की अधिसूचना सिविल सेवा परीक्षा नियमों के तहत जारी की गई है। इन नियमों में अलग-अलग श्रेणियों के लिए उम्र सीमा और प्रयासों की संख्या तय है, लेकिन EWS उम्मीदवारों के लिए किसी अतिरिक्त छूट का प्रावधान नहीं है। चूंकि इन नियमों को अदालत में चुनौती नहीं दी गई, इसलिए इनके आधार पर दी गई अधिसूचना को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
अंत में कोर्ट ने साफ किया कि जब तक केंद्र सरकार इस संबंध में कोई नई नीति नहीं बनाती, तब तक EWS उम्मीदवार उम्र या प्रयासों में छूट को अधिकार के तौर पर नहीं मांग सकते।
यह फैसला उन लाखों उम्मीदवारों के लिए अहम है, जो EWS श्रेणी के तहत सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं और भविष्य में नीति में बदलाव की उम्मीद लगाए हुए हैं।




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