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CBSE की नई तीन-भाषा नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे अभिभावक, छात्रों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता

CBSE की नई तीन-भाषा नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे अभिभावक, छात्रों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता

CBSE की नई तीन-भाषा नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे अभिभावक, छात्रों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता

Central Board of Secondary Education (CBSE) की नई तीन-भाषा नीति को लेकर देश के कई शहरों में अभिभावकों और शिक्षकों के बीच असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। बोर्ड द्वारा जारी हालिया सर्कुलर में कहा गया है कि 2026-27 सत्र से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा। इनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होना जरूरी है। इस फैसले को लेकर अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।

दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के कुछ अभिभावकों और शिक्षकों ने इस नीति के खिलाफ याचिका दायर की है। उनका कहना है कि छात्रों को अचानक नई भाषा पढ़ने के लिए मजबूर करना उनकी पढ़ाई और मानसिक संतुलन दोनों पर असर डाल सकता है।

विदेशी भाषाओं को लेकर बढ़ी चिंता

सीबीएसई के नए नियम के अनुसार अगर कोई छात्र फ्रेंच, जर्मन या अन्य विदेशी भाषा पढ़ना चाहता है, तो उसे तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में ही चुनना होगा। बोर्ड का कहना है कि यह फैसला National Education Policy 2020 और NCF-SE 2023 के दिशा-निर्देशों के तहत लिया गया है।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कई छात्र वर्षों से विदेशी भाषाएं पढ़ रहे हैं। ऐसे में कक्षा 9 में अचानक भाषा बदलने से उनकी शैक्षणिक तैयारी प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिहाज से कक्षा 9 और 10 बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं और इस दौरान अतिरिक्त भाषा का दबाव छात्रों के प्रदर्शन पर असर डाल सकता है।

CBSE पर बदले गए वादे का आरोप

याचिका में दावा किया गया है कि अप्रैल 2026 में बोर्ड की ओर से संकेत दिया गया था कि यह नियम 2029-30 से लागू होगा। इसी आधार पर कई स्कूलों और परिवारों ने अपनी शैक्षणिक योजना तैयार की थी। लेकिन मई 2026 में जारी नए सर्कुलर में इसे जुलाई 2026 से लागू करने की बात कही गई।

अभिभावकों का कहना है कि अचानक समयसीमा बदलने से छात्रों, शिक्षकों और स्कूल प्रशासन के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। उनका आरोप है कि इतनी बड़ी नीति को बिना पर्याप्त तैयारी और संक्रमण अवधि के लागू करना व्यावहारिक नहीं माना जा सकता।

शिक्षकों और किताबों की कमी भी बड़ा मुद्दा

याचिका में यह भी कहा गया है कि कई स्कूलों में नई भाषाओं के लिए पर्याप्त शिक्षक और अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है। कुछ स्कूलों में दूसरे विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों से भाषा पढ़ाने की तैयारी कराई जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नई भाषा नीति को सफल बनाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक, पाठ्यपुस्तकें और स्पष्ट कार्यान्वयन योजना बेहद जरूरी होती है। बिना इन व्यवस्थाओं के जल्दबाजी में लागू किया गया फैसला छात्रों के लिए चुनौती बन सकता है।

विदेशी भाषा शिक्षकों के रोजगार पर भी असर की आशंका

नई व्यवस्था को लेकर विदेशी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों और संस्थानों के बीच भी चिंता बढ़ी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अगर विदेशी भाषाएं मुख्य तीन-भाषा प्रणाली से बाहर हो जाती हैं, तो इससे हजारों शिक्षकों के रोजगार पर असर पड़ सकता है।

फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषाओं की पढ़ाई पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों और निजी संस्थानों में तेजी से लोकप्रिय हुई है। ऐसे में नई नीति से इस क्षेत्र में काम कर रहे शिक्षकों और ट्रेनिंग संस्थानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

छात्रों के मानसिक दबाव पर भी बहस

अभिभावकों का कहना है कि कक्षा 9 और 10 पहले से ही छात्रों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होती हैं। बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और अतिरिक्त गतिविधियों के बीच नई भाषा जोड़ना छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ा सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया है that नई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य छात्रों को विकल्प और लचीलापन देना था, लेकिन मौजूदा व्यवस्था उसी भावना के विपरीत दिखाई देती है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों की नजर बनी हुई है।

Asmita Sarkar

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