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Student Suicide in India: 2024 में 14,488 छात्रों ने की आत्महत्या, 10 साल में करीब 80% बढ़े मामले

भारत में छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की Accidental Deaths & Suicides in India (ADSI) 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में देश में 14,488 छात्रों की आत्महत्या से मौत दर्ज की गई। यह 2023 के 13,892 मामलों से 4.3 प्रतिशत अधिक है और 2014 के 8,068 मामलों की तुलना में करीब 79.6 प्रतिशत ज्यादा है। 2024 का आंकड़ा अब तक का सबसे अधिक है।

छात्रों की आत्महत्या में यह बढ़ोतरी ऐसे समय दर्ज हुई है जब देश में कुल आत्महत्याओं की संख्या 2023 के 1,71,418 से घटकर 2024 में 1,70,746 हो गई। यानी कुल आत्महत्याओं में मामूली कमी के बावजूद छात्रों से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी हुई। 2024 में छात्रों की आत्महत्या कुल आत्महत्याओं का करीब 8.5 प्रतिशत थी।

2014 से 2024 के बीच 1.23 लाख से ज्यादा छात्र आत्महत्या

NCRB के आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2024 के बीच देश में कुल 1,23,918 छात्र आत्महत्याएं दर्ज की गईं। 2014 में यह संख्या 8,068 थी, जो 2024 में बढ़कर 14,488 हो गई। हालांकि, इन आंकड़ों को केवल छात्रों की मानसिक सेहत की स्थिति का सीधा माप नहीं माना जा सकता, क्योंकि NCRB का आंकड़ा दर्ज आत्महत्याओं की संख्या बताता है और इसमें देश के कुल छात्र समूह की संख्या को आधार बनाकर छात्र आत्महत्या दर नहीं निकाली जाती।

2015 में 8,934 छात्र आत्महत्याएं दर्ज हुई थीं, जबकि 2020 में यह संख्या बढ़कर 12,526 और 2023 में 13,892 हो गई। 2022 इस अवधि में ऐसा साल रहा जब पिछले साल की तुलना में छात्र आत्महत्याओं में मामूली गिरावट दर्ज हुई थी।

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मामले

2024 में राज्यों के बीच महाराष्ट्र में छात्रों की आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए। यहां 1,909 मामले सामने आए, जो देश में दर्ज कुल छात्र आत्महत्याओं का 13.2 प्रतिशत है। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 1,585, मध्य प्रदेश में 1,447 और तमिलनाडु में 1,287 मामले दर्ज किए गए। इन चार राज्यों को मिलाकर 2024 में देश के कुल छात्र आत्महत्या मामलों का लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा रहा।

यहां यह समझना जरूरी है कि किसी राज्य में मामलों की संख्या अधिक होने के पीछे कई सामाजिक, जनसंख्या और शिक्षा से जुड़े कारण हो सकते हैं। केवल इन आंकड़ों के आधार पर किसी खास शहर, कोचिंग सेंटर या शिक्षा व्यवस्था को आत्महत्या का कारण बताना सही नहीं होगा।

आत्महत्या के पीछे परीक्षा में असफलता भी एक दर्ज कारण

NCRB के आंकड़ों में आत्महत्या के पीछे कई अलग-अलग कारण दर्ज किए जाते हैं। 2024 में पारिवारिक समस्याएं प्रमुख दर्ज कारणों में रहीं, जबकि परीक्षा में असफलता भी एक महत्वपूर्ण कारण के रूप में सामने आई।

2024 में परीक्षा में असफलता के कारण 2,032 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। यह उस वर्ष दर्ज कुल छात्र आत्महत्याओं का करीब 14 प्रतिशत है। हालांकि, इन आंकड़ों को यह मानकर नहीं पढ़ना चाहिए कि छात्रों की आत्महत्या के पीछे केवल परीक्षा या पढ़ाई का दबाव ही जिम्मेदार है। आत्महत्या के पीछे अक्सर कई परिस्थितियां एक साथ काम कर सकती हैं।

केवल कॉलेज छात्रों तक सीमित नहीं है चिंता

छात्र आत्महत्या के आंकड़े शिक्षा व्यवस्था में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल उठाते हैं, लेकिन समस्या को केवल कॉलेज या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा।

NCRB की 2024 रिपोर्ट में 18 साल से कम उम्र के लोगों की आत्महत्याओं का भी अलग से आंकड़ा दिया गया है। इस आयु वर्ग में 10,000 से ज्यादा आत्महत्या के मामले दर्ज हुए। यानी मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम को स्कूल स्तर से ही गंभीरता से देखने की जरूरत है।

सरकार की ओर से क्या कदम उठाए गए हैं?

केंद्र सरकार ने आत्महत्या की रोकथाम के लिए National Suicide Prevention Strategy (NSPS) 2022 में शुरू की थी। इसका लक्ष्य 2030 तक देश में आत्महत्या से होने वाली मौतों में 10 प्रतिशत की कमी लाना है। रणनीति में स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य की जांच, संकट के समय सहायता के लिए हेल्पलाइन और मनोवैज्ञानिक सहायता केंद्र, जागरूकता कार्यक्रम तथा जोखिम वाले समूहों के लिए विशेष सहायता जैसे कदम शामिल हैं। छात्रों को भी इस रणनीति के प्रमुख लक्षित समूहों में रखा गया है।

इसके अलावा सरकार का Tele-MANAS कार्यक्रम 24 घंटे मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराता है। जरूरत पड़ने पर कॉल करने वाले व्यक्ति को आगे विशेषज्ञ सेवाओं से भी जोड़ा जा सकता है। Tele-MANAS की हेल्पलाइन 14416 या 1-800-891-4416 है।

छात्रों के लिए शिक्षा मंत्रालय की Manodarpan पहल भी मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य से जुड़ी सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

आंकड़ों से आगे भी समझने की जरूरत

14,488 का आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है। इसके पीछे अलग-अलग परिवार, परिस्थितियां और व्यक्तिगत संघर्ष जुड़े हैं। इसलिए छात्रों की मानसिक सेहत पर चर्चा करते समय केवल परीक्षा के दबाव को जिम्मेदार ठहराने के बजाय परिवार, स्कूल-कॉलेज, सामाजिक माहौल, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और समय पर सहायता मिलने जैसे पहलुओं को भी समझना जरूरी है।

छात्रों के लिए ऐसा माहौल जरूरी है जहां परीक्षा में कम अंक या असफलता को जीवन की अंतिम स्थिति न माना जाए और परेशानी होने पर मदद मांगना कमजोरी न समझा जाए। स्कूलों और कॉलेजों में प्रशिक्षित काउंसलिंग व्यवस्था, शिक्षकों की संवेदनशीलता और परिवारों में खुलकर बातचीत इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अगर कोई छात्र या युवा खुद को संकट में महसूस कर रहा है या आत्महत्या के विचार आ रहे हैं, तो उसे अकेला न छोड़ें और तुरंत परिवार, भरोसेमंद व्यक्ति या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें। भारत में Tele-MANAS 14416 पर 24×7 मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है।

Raish Ahmed

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