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IIT में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का बनेगा अलग कैडर? छात्रों और शिक्षकों को मिलेगी नियमित सहायता

देश के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में छात्रों और शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञों का अलग कैडर बनाने पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत काउंसलर, मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक जैसे पेशेवरों के लिए नियमित पद बनाए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को ही नहीं, बल्कि शिक्षकों और संस्थानों के अन्य कर्मचारियों को भी जरूरत के समय बेहतर मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।

आईआईटी निदेशकों के अनुसार, इस प्रस्ताव पर पिछले दो वर्षों से चर्चा चल रही है। इसलिए इसे हाल में सामने आई छात्र आत्महत्या की घटनाओं के बाद शुरू की गई पहल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि, इन घटनाओं ने उच्च शिक्षा संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता की जरूरत को लेकर चिंता जरूर बढ़ाई है।

IIT में छात्र आत्महत्या की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

इस साल कई आईआईटी परिसरों में छात्रों की मौत की घटनाओं ने मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई से जुड़े दबाव पर बहस तेज की है। 18 सितंबर को आईआईटी बॉम्बे के एक छात्र की परिसर स्थित छात्रावास के कमरे में मौत हो गई थी। इस घटना के बाद छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया और संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य सहायता की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए। इससे पहले अगस्त में आईआईटी दिल्ली के एक छात्र की भी आत्महत्या से मौत हुई थी।

देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में इस तरह की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। पढ़ाई का दबाव, कड़ी प्रतिस्पर्धा, भविष्य की चिंता और निजी जीवन की परेशानियां विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में जरूरी है कि संस्थानों में सहायता की व्यवस्था केवल संकट के समय सक्रिय होने तक सीमित न रहे, बल्कि छात्र समय रहते अपनी परेशानी साझा कर सकें।

क्या IIT में पहले से उपलब्ध हैं काउंसलिंग सेंटर?

शिक्षा मंत्रालय ने इस साल संसद को बताया था कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT), भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (NIT) और भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIIT) में मानसिक स्वास्थ्य या परामर्श केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों पर पूर्णकालिक या जरूरत के अनुसार उपलब्ध होने वाले काउंसलर और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सेवाएं देते हैं। कुछ संस्थानों में मनोचिकित्सक भी उपलब्ध हैं।

हालांकि, संस्थानों में विद्यार्थियों की संख्या और उनकी अलग-अलग जरूरतों को देखते हुए मौजूदा व्यवस्था को पर्याप्त बनाने की चुनौती बनी हुई है। कुछ आईआईटी बाहरी मोबाइल ऐप और डिजिटल सेवाओं के जरिए भी सहायता उपलब्ध कराते हैं, लेकिन ऐसी सुविधाएं स्थायी और नियमित पेशेवर सहायता का पूरा विकल्प नहीं हो सकतीं।

अलग कैडर बनाने का विचार इसी जरूरत से जुड़ा है। नियमित पद और निर्धारित बजट होने से संस्थान विशेषज्ञों की नियुक्ति की बेहतर योजना बना सकेंगे। इससे सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने और जरूरत के समय प्रशिक्षित पेशेवरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।

23 IIT में कितने मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जरूरत?

देश में इस समय 23 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैं। अलग-अलग आईआईटी परिसरों में विद्यार्थियों की संख्या लगभग 3,000 से 18,000 तक बताई जाती है। इनके अलावा शिक्षक, अन्य कर्मचारी और परिसर में रहने वाले समुदाय के लोगों को भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत पड़ सकती है।

इतनी बड़ी आबादी के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ उपलब्ध कराना आसान नहीं है। आईआईटी निदेशकों के अनुसार, जब तक काउंसलर, मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक के लिए अलग पद स्वीकृत नहीं होते और बजट तय नहीं किया जाता, तब तक नियमित नियुक्तियों में कठिनाई आ सकती है। संविदा पर विशेषज्ञों की नियुक्ति भी संसाधनों और संस्थागत मंजूरी पर निर्भर करती है।

प्रस्तावित कैडर के जरिए नियुक्तियों, पदों, बजट और सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर अधिक व्यवस्थित ढांचा तैयार करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, विशेषज्ञों की अंतिम संख्या, संस्थानवार नियुक्तियों और प्रस्ताव लागू होने की समयसीमा को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने आना अभी बाकी है।

क्या सभी IIT में एक जैसी व्यवस्था लागू होगी?

आईआईटी परिषद की पिछले साल हुई बैठक में इस प्रस्तावित व्यवस्था पर चर्चा हुई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके ढांचे को भारतीय पुनर्वास परिषद के दिशानिर्देशों के अनुरूप तैयार करने की योजना है। इसमें विशेषज्ञों के लिए पदोन्नति के अवसर और उनकी सेवाओं की नियमित समीक्षा जैसे प्रावधान शामिल किए जाने पर भी विचार किया जा रहा है।

आईआईटी गांधीनगर इस व्यवस्था का ढांचा तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल है। एक आईआईटी निदेशक के मुताबिक, इस प्रस्ताव को पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सामने भी रखा गया था।

इस पहल का उद्देश्य केवल काउंसलिंग सेवाओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता को संस्थानों की नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाना है। इसके लिए नियुक्ति के मानक, विशेषज्ञों की योग्यता, प्रशिक्षण और सेवाओं की गुणवत्ता का आकलन महत्वपूर्ण होगा।

शिक्षकों के प्रशिक्षण में भी सामने आई कमी

मानसिक स्वास्थ्य के मामलों में केवल विशेषज्ञों की नियुक्ति पर्याप्त नहीं है। शिक्षकों को भी यह समझने की जरूरत है कि किसी विद्यार्थी में तनाव, भावनात्मक परेशानी या दूसरे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी संकेतों को कैसे पहचाना जाए और उसे सही मदद तक कैसे पहुंचाया जाए।

उच्चतम न्यायालय की ओर से गठित राष्ट्रीय कार्यबल ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में शिक्षकों के प्रशिक्षण की कमी पर चिंता जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र से वित्तपोषित 31 संस्थानों से मिले जवाबों में लगभग 90 प्रतिशत शिक्षकों के पास विद्यार्थियों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में मदद करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं था।

यह स्थिति बताती है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संस्थानों में केवल सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को भी यह प्रशिक्षण देना जरूरी है कि वे किसी विद्यार्थी की परेशानी को पहचान सकें, उससे संवेदनशीलता के साथ बात कर सकें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेने का रास्ता बता सकें।

राष्ट्रीय कार्यबल को 31 अक्टूबर तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपनी है। इस रिपोर्ट की सिफारिशें उच्च शिक्षा संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता और प्रशिक्षण की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

कितने संस्थानों में विशेषज्ञ और प्रशिक्षण की सुविधा है?

राष्ट्रीय कार्यबल की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक, 31 केंद्रीय वित्तपोषित संस्थानों में से 18 में कम से कम एक मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता उपलब्ध था। वहीं, केवल चार संस्थानों ने शिक्षकों के मार्गदर्शन कार्यक्रमों के लिए औपचारिक प्रशिक्षण की जानकारी दी। दस संस्थानों ने विद्यार्थियों के बीच आपसी सहयोग से जुड़ी पहलों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था होने की बात कही।

रिपोर्ट में एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाया गया है। अलग-अलग संस्थान ‘काउंसलर’ शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग भूमिकाओं के लिए करते हैं। ऐसे में यह स्पष्ट करना कठिन हो जाता है कि किसी संस्थान में वास्तव में कितने प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मौजूद हैं और वे किस तरह की सेवाएं दे सकते हैं।

विशेषज्ञों के लिए अलग कैडर बनने से उनकी योग्यता, जिम्मेदारियों और नियुक्ति के मानकों को स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है। इससे संस्थानों के बीच सेवाओं की तुलना करना और जरूरत के अनुसार सुधार करना भी आसान हो सकता है।

IIT में पहले से चल रही हैं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी पहल

अलग कैडर पर चर्चा के बीच कई आईआईटी अपने परिसरों में मानसिक स्वास्थ्य और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग कदम उठा रहे हैं।

आईआईटी रुड़की ने इस साल व्यापक मानसिक स्वास्थ्य नीति का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की थी। आईआईटी खड़गपुर में शाम के समय बिजली बंद करने की पहल की गई, ताकि विद्यार्थी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से कुछ समय दूर रहकर आपस में बातचीत कर सकें। वहीं, आईआईटी गुवाहाटी का ‘अपने पड़ोसी को जानें’ अभियान छात्रों के बीच परिचय, संवाद और सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है।

इसके अलावा, पाठ्यक्रम में जरूरी बदलाव, परिसर में स्वास्थ्य और परामर्श केंद्र, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी वेबसाइट और मोबाइल ऐप, संकट के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण तथा विद्यार्थी सहायता समूह जैसे उपाय भी उपयोगी हो सकते हैं।

हालांकि, इन पहलों का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि विद्यार्थी इनका कितना इस्तेमाल कर पाते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें कितनी जल्दी प्रशिक्षित विशेषज्ञों की सहायता मिलती है।

मानसिक स्वास्थ्य सहायता को स्थायी व्यवस्था बनाना जरूरी

आईआईटी में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का अलग कैडर बनाने का प्रस्ताव उच्च शिक्षा संस्थानों में सहायता व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब नियमित नियुक्तियों के साथ पर्याप्त बजट, प्रशिक्षित कर्मचारी, गोपनीय परामर्श सेवाएं और समय पर सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी हो।

इसके साथ ही ऐसा माहौल बनाना जरूरी है, जहां विद्यार्थी मानसिक परेशानी को छिपाने के बजाय बिना डर के मदद मांग सकें। शिक्षकों को भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि वे किन परिस्थितियों में स्वयं सहायता दे सकते हैं और कब किसी प्रशिक्षित विशेषज्ञ की जरूरत है।

मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल केवल किसी संकट के बाद की जाने वाली कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। इसे शिक्षा, परिसर के माहौल और विद्यार्थियों की नियमित देखभाल का हिस्सा बनाना जरूरी है। प्रस्तावित कैडर इस दिशा में मददगार हो सकता है, बशर्ते इसे स्पष्ट नियमों, पर्याप्त संसाधनों और जवाबदेही के साथ लागू किया जाए।

Raish Ahmed

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