
बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए माता-पिता अक्सर उन्हें पढ़ाई के साथ संगीत, कला, ताइक्वांडो और दूसरी extracurricular activities में भेजते हैं। लेकिन क्या बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए उन्हें लगातार अलग-अलग क्लास में भेजना ही काफी है? सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 20 अगस्त 2026 को एक बच्चे की custody से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान इस सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि बच्चों को बहुत सारी अतिरिक्त कक्षाओं में भेजने के बजाय माता-पिता को उनके साथ बैठकर बातचीत करने और समय बिताने पर ध्यान देना चाहिए। कोर्ट ने बच्चों को अच्छे व्यवहार, शिष्टाचार और खासकर लड़कों को लड़कियों और महिलाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना सिखाने की जरूरत पर भी जोर दिया।
हर गतिविधि बच्चे के लिए जरूरी नहीं
सुनवाई के दौरान पीठ ने बच्चों को कई तरह की school के बाद होने वाली activities में भेजने के चलन पर सवाल उठाया। एक पक्ष की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि संगीत, कला और दूसरी गतिविधियों की कक्षाएं बच्चों के सर्वांगीण विकास में मदद करती हैं और उन्हें प्रतिस्पर्धी माहौल के लिए तैयार करती हैं।
इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि बच्चों के लिए बहुत सारी कक्षाएं भी अच्छी नहीं होतीं। उन्होंने माता-पिता को बच्चों के साथ बैठने और उनसे बातचीत करने की सलाह दी।
कोर्ट की टिप्पणी का सीधा संदेश यह है कि बच्चों के विकास को केवल activities और classes की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए। उनके साथ माता-पिता का समय, बातचीत और मार्गदर्शन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
बच्चों को अच्छे व्यवहार और सम्मान की सीख दें
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की परवरिश में अच्छे व्यवहार और शिष्टाचार की भूमिका पर भी जोर दिया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि माता-पिता को बच्चों को अच्छे manners सिखाने चाहिए और विशेष रूप से लड़कों को यह समझाना चाहिए कि उन्हें लड़कियों और महिलाओं के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए।
यह सलाह केवल पढ़ाई या extracurricular activities तक सीमित नहीं है। बच्चों के व्यक्तित्व और व्यवहार का विकास घर के माहौल और माता-पिता के साथ उनके संवाद से भी होता है।
‘बच्चों के साथ खुद एक क्लास करें’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बच्चों को लगातार art class, music class, taekwondo या दूसरी गतिविधियों में भेजने के बजाय माता-पिता को खुद उनके साथ समय बिताने की बात कही। उनका जोर इस बात पर था कि माता-पिता बच्चों के साथ बैठें, उनसे बात करें और उन्हें जीवन में अच्छे व्यवहार और सही मूल्यों की समझ दें।
यानी बच्चों के लिए हर खाली समय को किसी न किसी class या activity से भर देना जरूरी नहीं है। कभी-कभी उनके साथ बैठकर उनकी बातें सुनना, उनके सवालों का जवाब देना और रोजमर्रा की चीजों पर बातचीत करना भी उनकी परवरिश का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
बच्चों की परवरिश में माता-पिता की भूमिका क्यों अहम?
बच्चों के लिए खेल, संगीत, कला और दूसरी activities निश्चित रूप से उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन हर बच्चे की जरूरत और रुचि अलग होती है। ऐसे में माता-पिता के लिए यह समझना जरूरी है कि बच्चा वास्तव में क्या करना चाहता है और उस पर activities का कितना दबाव है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी संतुलन की ओर इशारा करती है। बच्चों को हर क्षेत्र में आगे रखने की कोशिश में अगर माता-पिता उनके साथ बातचीत और समय बिताने का मौका ही कम कर दें, तो इसका असर parent-child relationship पर पड़ सकता है।
हाल के एक अन्य सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी बच्चों की custody से जुड़े मामलों में उनके welfare को सबसे महत्वपूर्ण consideration बताया गया है। कोर्ट ने कहा था कि बच्चे की शिक्षा, मानसिक और बौद्धिक विकास के साथ उसके moral और ethical welfare को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
माता-पिता के लिए सुप्रीम कोर्ट की सलाह का मतलब
सुप्रीम कोर्ट की 20 अगस्त की टिप्पणी को एक सरल संदेश के तौर पर समझा जा सकता है—बच्चों को हर समय किसी न किसी activity में व्यस्त रखना ही अच्छी parenting नहीं है।
बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार activities का मौका देना जरूरी है, लेकिन इसके साथ माता-पिता को उनके लिए पर्याप्त समय भी निकालना चाहिए। उनसे स्कूल, दोस्तों, उनकी पसंद-नापसंद और रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में बात करनी चाहिए। इसी बातचीत के जरिए बच्चों को सम्मान, शिष्टाचार और दूसरों के साथ सही व्यवहार की सीख दी जा सकती है।
बच्चों के माता-पिता के लिए खास संदेश
बच्चों को हर संभव class में भेजने के बजाय यह देखें कि उनके लिए वास्तव में क्या जरूरी है। उनके साथ कुछ समय बैठें, उनकी बात सुनें और अपनी बात भी समझाएं। बच्चों की अच्छी परवरिश केवल स्कूल या extra classes की जिम्मेदारी नहीं है। घर में माता-पिता का व्यवहार और बच्चों के साथ उनका जुड़ाव भी उनके व्यक्तित्व को आकार देता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सार यही है कि बच्चों के विकास के लिए classes के साथ-साथ माता-पिता का समय, बातचीत और सही मार्गदर्शन भी जरूरी है।




Add comment