
घर में सैकड़ों किताबों से भरी बुकशेल्फ देखकर अक्सर लगता है कि उस व्यक्ति को पढ़ने का बहुत शौक होगा। लेकिन घर में कम किताबें होना यह जरूरी नहीं बताता कि व्यक्ति की जानकारी या किताबों में रुचि कम है।
कुछ लोगों के लिए किताबों का छोटा संग्रह उनकी सोच-समझकर की गई पसंद को दिखाता है। वे सिर्फ वही किताबें रखना पसंद कर सकते हैं जिन्हें वे पढ़ चुके हैं, इस समय पढ़ रहे हैं या भविष्य में दोबारा पढ़ना चाहते हैं। वहीं कुछ लोग ई-बुक, ऑडियोबुक और लाइब्रेरी का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, इसलिए उन्हें किताबों की फिजिकल कॉपी रखने की जरूरत कम महसूस होती है।
इसलिए किसी की बुकशेल्फ पर रखी किताबों की संख्या से यह तय नहीं किया जा सकता कि वह व्यक्ति कितना पढ़ता है या उसके पास कितनी जानकारी है।
छोटी लाइब्रेरी सोच-समझकर चुनी गई किताबों का संग्रह हो सकती है
लोग अपने घर को अलग-अलग तरीके से व्यवस्थित करते हैं और किताबें भी इसी का हिस्सा होती हैं।
छोटा बुक कलेक्शन रखने वाला व्यक्ति किताबों का चुनाव अपनी जरूरत, काम, शौक या भावनात्मक जुड़ाव के आधार पर कर सकता है। वह हर पढ़ी हुई किताब को संभालकर रखने के बजाय जरूरत खत्म होने पर उसे किसी को दे सकता है, बदल सकता है या हटा सकता है।
ऐसे में बुकशेल्फ सिर्फ दिखावे की चीज नहीं रहती, बल्कि काम आने वाली किताबों का संग्रह बन जाती है।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपनी पसंद के कुछ उपन्यास, काम से जुड़ी जरूरी किताबें और किसी खास विषय की किताबें अपने पास रख सकता है, जबकि बाकी किताबें वह डिजिटल माध्यम से पढ़ता हो या लाइब्रेरी से लेकर पढ़ता हो।
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि बड़ी लाइब्रेरी रखने वाला व्यक्ति अव्यवस्थित है या छोटी लाइब्रेरी वाला व्यक्ति ज्यादा समझदार है। किताबों की संख्या किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता, पढ़ने की क्षमता या जिज्ञासा का पैमाना नहीं है।
कोई व्यक्ति कम किताबें क्यों रख सकता है?
किसी के फिजिकल बुक कलेक्शन का आकार कई व्यावहारिक और व्यक्तिगत कारणों से प्रभावित हो सकता है।
1. घर में जगह की कमी
छोटे घर में रहने वाले लोगों के पास बड़ी बुकशेल्फ या किताबें रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं हो सकती। ऐसे में वे सीमित संख्या में किताबें रखना पसंद कर सकते हैं।
2. डिजिटल तरीके से पढ़ना
ई-रीडर, टैबलेट और स्मार्टफोन ने किताबें पढ़ना काफी आसान बना दिया है। डिजिटल माध्यम में कोई व्यक्ति सैकड़ों किताबें रख सकता है, लेकिन इसके लिए घर में अलग जगह की जरूरत नहीं होती।
3. ऑडियोबुक का इस्तेमाल
कुछ लोग किताबें पढ़ने के बजाय उन्हें सुनना पसंद करते हैं। ऐसे व्यक्ति के पास कम फिजिकल किताबें हो सकती हैं, लेकिन उनकी पढ़ने या किताबें सुनने की आदत काफी मजबूत हो सकती है।
4. चुनिंदा किताबें रखना
कुछ पाठक सिर्फ उन्हीं किताबों की फिजिकल कॉपी रखना पसंद करते हैं, जिन्हें वे बहुत उपयोगी या खास मानते हैं।
5. कम विकल्प रखना
कम किताबें होने से अगली किताब चुनना भी आसान हो सकता है। अगर शेल्फ पर दर्जनों ऐसी किताबें हों जिन्हें अभी पढ़ना बाकी है, तो कई लोगों के लिए विकल्प बढ़ने के बजाय उलझन भी बढ़ सकती है।
6. घर को व्यवस्थित रखना
कुछ लोग घर में खुली और साफ जगह पसंद करते हैं। वे अपने आसपास कम सामान रखना पसंद करते हैं और इसी वजह से किताबों का संग्रह भी सीमित रख सकते हैं।
Environmental Psychology क्या कहती है?
Environmental Psychology में यह समझने की कोशिश की जाती है कि हमारे आसपास का भौतिक वातावरण हमारे व्यवहार, ध्यान और भावनाओं को किस तरह प्रभावित कर सकता है।
हमारा दिमाग आसपास मौजूद चीजों से लगातार मिलने वाली दृश्य जानकारी को प्रोसेस करता रहता है। इसलिए बहुत ज्यादा सामान वाली जगह में अपेक्षाकृत साधारण और कम सामान वाली जगह की तुलना में ज्यादा दृश्य जानकारी हो सकती है।
इसका यह मतलब नहीं है कि बड़ी बुकशेल्फ अपने आप तनाव पैदा करती है। कई लोगों के लिए किताबों से भरी शेल्फ आराम, प्रेरणा और खुशी का स्रोत हो सकती है।
वहीं कुछ लोग कम सामान और साधारण दिखने वाली जगह में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। ऐसे लोग किताबों समेत अपनी फिजिकल चीजों की संख्या भी जानबूझकर सीमित रख सकते हैं।
Cognitive Load का क्या संबंध है?
इससे जुड़ा एक और महत्वपूर्ण विचार Cognitive Load है। इसका मतलब है किसी काम के दौरान दिमाग को प्रोसेस करनी पड़ने वाली जानकारी की मात्रा।
जब हमारे आसपास बहुत सारी चीजें या विकल्प मौजूद होते हैं, तो वे ध्यान को अलग-अलग दिशाओं में खींच सकते हैं। एक व्यवस्थित वातावरण इस तरह की अतिरिक्त जानकारी को कुछ हद तक कम कर सकता है।
यही बात किताबों पर भी लागू हो सकती है।
20 सोच-समझकर चुनी गई किताबों वाली शेल्फ से उसके मालिक को यह याद रखना आसान हो सकता है कि कौन-सी किताब उसके पास है, उसने उसे क्यों रखा है और अगली बार क्या पढ़ना है।
वहीं सैकड़ों किताबों वाली शेल्फ में विकल्प काफी ज्यादा होंगे।
हालांकि, हर व्यक्ति का अनुभव अलग होता है। कुछ लोग किताबों से घिरे रहना पसंद करते हैं और उनके लिए बड़ी लाइब्रेरी तनाव का कारण बनने के बजाय पढ़ने की प्रेरणा बन सकती है।
छोटी लाइब्रेरी का मतलब कम पढ़ना नहीं है
सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि किताबों का मालिक होना और किताबें पढ़ना एक ही बात है।
ऐसा नहीं है।
कोई व्यक्ति सैकड़ों किताबें पढ़ सकता है, लेकिन उसके पास फिजिकल रूप से सिर्फ कुछ ही किताबें हों। वह लाइब्रेरी से किताबें ले सकता है, दोस्तों से किताबें उधार ले सकता है, डिजिटल बुक सेवाओं का इस्तेमाल कर सकता है या ऑडियोबुक सुन सकता है।
इसके उलट, किसी व्यक्ति के पास सैकड़ों किताबें हो सकती हैं, लेकिन उसने उनमें से बहुत कम किताबें पढ़ी हों।
इसलिए बुकशेल्फ किसी व्यक्ति की सिर्फ फिजिकल चीजों की एक झलक देती है। इससे उसके पूरे बौद्धिक जीवन या पढ़ने की आदत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
किताबों की संख्या से ज्यादा जरूरी उनकी उपयोगिता हो सकती है
छोटी लाइब्रेरी सोच-समझकर चीजें रखने की आदत को दिखा सकती है।
कोई व्यक्ति यह सोच सकता है कि वह कितनी किताबें रखना चाहता है, बजाय इसके वह खुद से पूछ सकता है कि क्या उसने यह किताब पढ़ी है, क्या वह इसे दोबारा पढ़ेगा, क्या यह पढ़ाई या काम के लिए जरूरी है, क्या इसका उससे कोई व्यक्तिगत जुड़ाव है और क्या यही जानकारी डिजिटल रूप में आसानी से उपलब्ध है।
यह सोच सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है। कपड़े, फर्नीचर, गैजेट और घर में रखी दूसरी चीजों के मामले में भी लोग इसी तरह फैसला ले सकते हैं।
छोटी लाइब्रेरी से क्या समझा जा सकता है?
छोटी बुकशेल्फ किसी व्यक्ति की कुछ आदतों की ओर इशारा कर सकती है। वह व्यक्ति चीजों को सोच-समझकर रखने वाला हो सकता है और तय कर सकता है कि घर में किस चीज को जगह मिलनी चाहिए।
कम सामान होने से जरूरी चीजों की पहचान और उन्हें व्यवस्थित रखना आसान हो सकता है। साथ ही, किताबें पढ़ने के लिए उनका फिजिकल रूप से मालिक होना जरूरी नहीं है।
किसी के लिए किताबें पढ़ाई और सीखने का साधन हो सकती हैं, तो किसी के लिए मनोरंजन या काम से जुड़ी जरूरत। लेकिन सिर्फ बुकशेल्फ देखकर इनमें से किसी भी बात का निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
बड़ी बात क्या है?
घर की लाइब्रेरी का कोई ऐसा तय आकार नहीं है, जिसे मनोवैज्ञानिक रूप से सही या गलत कहा जा सके।
किसी व्यक्ति के लिए किताबों से भरी पूरी दीवार उसकी पहचान, पसंद और कई वर्षों की पढ़ाई का हिस्सा हो सकती है। वहीं किसी दूसरे व्यक्ति के लिए पांच चुनिंदा किताबें ही काफी हो सकती हैं।
असल फर्क किताबों को अपने पास रखने और उन्हें पढ़ने या इस्तेमाल करने के बीच है।
छोटी लाइब्रेरी में ऐसी किताबें हो सकती हैं जो किसी व्यक्ति की शिक्षा, पसंदीदा कहानियों, काम की जानकारी या निजी अनुभवों से जुड़ी हों। वहीं यह कम जगह, डिजिटल पढ़ने की आदत या घर को व्यवस्थित रखने की पसंद का नतीजा भी हो सकती है।
इसलिए यह पूछने के बजाय कि किसी व्यक्ति के पास कितनी किताबें हैं, ज्यादा दिलचस्प सवाल यह हो सकता है कि उसने उन्हीं किताबों को अपने पास रखने का फैसला क्यों किया?
किताबों की संख्या से कहीं ज्यादा यह फैसला बता सकता है कि कोई व्यक्ति अपनी चीजों को किस तरह इस्तेमाल करता है, उन्हें कितनी अहमियत देता है और अपने आसपास की जगह को कैसे व्यवस्थित करता है।




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