
IIT गुवाहाटी (IIT Guwahati) के शोधकर्ताओं की एक टीम ने ऐसी ऊर्जा-कुशल ईंटें विकसित की हैं, जो इमारतों को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में मदद कर सकती हैं। इस तकनीक से एयर कंडीशनर (AC) के इस्तेमाल में कमी आ सकती है। यह शोध Journal of Energy Storage में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में Bitupan Das, Urbashi Bordoloi, Pushpendra Singh और Pankaj Kalita शामिल रहे।
आज के समय में गर्मियों के दौरान ज्यादातर आधुनिक इमारतें ठंडक बनाए रखने के लिए AC पर निर्भर रहती हैं। इससे बिजली की खपत बढ़ती है और पर्यावरण पर भी असर पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि बिना ज्यादा ऊर्जा खर्च किए इमारतों को ठंडा कैसे रखा जाए। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने दीवारों और छतों में गर्मी के प्रवाह को नियंत्रित करने पर काम किया।
इन खास ईंटों में “फेज चेंज मटेरियल” (PCM) का इस्तेमाल किया गया है, जो मोम (वैक्स) जैसे पदार्थ होते हैं। ये पदार्थ पिघलते समय गर्मी को सोख लेते हैं और ठंडा होने पर उसे धीरे-धीरे वापस छोड़ते हैं। दिन के समय ये अतिरिक्त गर्मी को अपने अंदर ले लेते हैं, जिससे कमरे का तापमान कम रहता है। रात में, जब तापमान गिरता है, तो यही गर्मी धीरे-धीरे बाहर निकलती है।
टेस्ट किए गए विकल्पों में OM35 नाम का PCM खास साबित हुआ, जो 35 डिग्री सेल्सियस पर पिघलता है। यह 28 से 38 डिग्री के बीच के तापमान वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त माना गया है, जो भारत के कई हिस्सों में आम है।
PCM के पिघलने के दौरान उसके रिसाव को रोकने के लिए टीम ने इसे बायोचार (कार्बन से भरपूर पदार्थ) के साथ मिलाया। इससे एक मजबूत मिश्रण तैयार हुआ, जो PCM को अंदर ही सुरक्षित रखता है और गर्मी के ट्रांसफर को भी बेहतर बनाता है। इस तकनीक से बनी ईंटें आकार में स्थिर रहती हैं, दबाव सहन कर सकती हैं और गर्म व आर्द्र मौसम में भी प्रभावी रहती हैं।
प्रोफेसर पंकज कलिता के अनुसार, ये PCM-युक्त ईंटें सामान्य ईंटों की तुलना में तापमान को नियंत्रित करने में ज्यादा सक्षम हैं। ये दिन की गर्मी को सोखकर रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे AC के इस्तेमाल में काफी कमी लाई जा सकती है।
हालांकि, इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करना अभी चुनौतीपूर्ण है। शुरुआती लागत ज्यादा है, बड़े पैमाने पर उत्पादन आसान नहीं है, उद्योग में इसके लिए स्पष्ट मानक नहीं हैं और बिल्डर्स के बीच इसकी जानकारी भी सीमित है। इसके अलावा, अभी इसके बहुत कम व्यावहारिक उदाहरण मौजूद हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक को सफल बनाने के लिए लागत कम करना, फील्ड ट्रायल्स करना, सरकारी प्रमाणन हासिल करना, बिल्डर्स के साथ साझेदारी बढ़ाना और जागरूकता अभियान चलाना जरूरी होगा। अगर इन दिशा में काम जारी रहा, तो भविष्य में यह ऊर्जा-कुशल ईंटें खासकर गर्म और आर्द्र क्षेत्रों में निर्माण का एक सामान्य हिस्सा बन सकती हैं।




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