
लखनऊ स्थित सेंट्रल सॉइल सैलिनिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट (CSSRI) के वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए एक बड़ी राहत देने वाला समाधान तैयार किया है। पराली निस्तारण की समस्या से जूझ रहे किसानों को अब एक सस्ता, प्रभावी और पर्यावरण–हितैषी विकल्प मिलने जा रहा है। संस्थान ने तीन साल की रिसर्च के बाद एक जैविक लिक्विड ‘हेलो केयर’ तैयार किया है, जो फसल अवशेषों को बेहद कम समय में खाद में बदल देता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, धान, मक्का और गन्ने जैसी फसलों की पराली सामान्य रूप से सड़कर खाद बनने में दो से तीन महीने का समय लेती है। लेकिन ‘हेलो केयर’ के इस्तेमाल से यह प्रक्रिया केवल तीन हफ्तों में पूरी हो जाती है। परीक्षणों में यह तकनीक पारंपरिक तरीकों की तुलना में करीब 20% अधिक प्रभावी पाई गई है, जो इसे किसानों के लिए खास बनाती है।
यह लिक्विड एक फंगस आधारित जैविक मिश्रण है, जिसे खेतों में उपयोग करना काफी आसान है। वैज्ञानिक बताते हैं कि 1 लीटर ‘हेलो केयर’ को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ खेत में छिड़काव करना होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्रक्रिया पर 150 से 200 रुपये प्रति एकड़ से ज्यादा खर्च नहीं आता, जो वर्तमान समय में किसानों के लिए एक किफायती विकल्प है।
इस तकनीक से बनने वाली जैविक खाद मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाती है और इसकी उर्वरता में सुधार करती है। खेतों में किए गए प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने फसल उत्पादन में 12 से 15 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की है। धान की पराली के साथ-साथ यह लिक्विड गेहूं की नरई, मक्का और गन्ने के अवशेषों पर भी उतना ही प्रभावी साबित हुआ है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ‘हेलो केयर’ का व्यापक स्तर पर उपयोग शुरू हो जाता है, तो पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इससे न सिर्फ किसानों को फायदा होगा बल्कि पूरे उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान बनने वाली स्मॉग की समस्या को भी काबू करने में मदद मिलेगी।
CSSRI इस उत्पाद के पेटेंट की प्रक्रिया में है और जल्द ही इसे देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभागों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाने की तैयारी चल रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले सीजन में यह तकनीक बड़े पैमाने पर अपनाई जा सकेगी और पराली निस्तारण की पुरानी समस्या का स्थायी समाधान बनकर उभरेगी।




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