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IIT बॉम्बे में शुरू हुई भारत की पहली इंटीग्रेटेड CCUS फील्ड लेबोरेटरी, स्वच्छ ऊर्जा और क्लाइमेट टेक रिसर्च को मिलेगा बढ़ावा

IIT बॉम्बे में शुरू हुई भारत की पहली इंटीग्रेटेड CCUS फील्ड लेबोरेटरी, स्वच्छ ऊर्जा और क्लाइमेट टेक रिसर्च को मिलेगा बढ़ावा

IIT बॉम्बे में शुरू हुई भारत की पहली इंटीग्रेटेड CCUS फील्ड लेबोरेटरी, स्वच्छ ऊर्जा और क्लाइमेट टेक रिसर्च को मिलेगा बढ़ावा

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए देश की पहली इंटीग्रेटेड कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) फील्ड लेबोरेटरी फैसिलिटी की शुरुआत की है। यह अत्याधुनिक सुविधा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT Bombay) में भारत इनोवेट्स 2026 कार्यक्रम के तहत स्थापित की गई है।

इस प्रयोगशाला का उद्घाटन 11 मई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया। इस अवसर पर शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, उद्यमी और IIT बॉम्बे के फैकल्टी सदस्य भी मौजूद रहे।

कार्बन मैनेजमेंट तकनीक के लिए राष्ट्रीय टेस्टबेड बनेगी सुविधा

शिक्षा मंत्रालय के अनुसार यह परियोजना भारत का पहला ऐसा पायलट-स्केल प्लेटफॉर्म है, जहां कार्बन कैप्चर तकनीक को कार्बन उपयोग और स्थायी भू-भंडारण प्रणाली के साथ जोड़ा गया है।

यह सुविधा भविष्य की कार्बन मैनेजमेंट तकनीकों और क्लाइमेट-टेक इनोवेशन के लिए राष्ट्रीय स्तर के टेस्टबेड के रूप में काम करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ औद्योगिक तकनीकों को विकसित करने में मदद मिलेगी।

प्रतिदिन तीन टन तक कार्बन कैप्चर करने की क्षमता

इस प्रयोगशाला में स्वदेशी तकनीक पर आधारित कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) पायलट सुविधा विकसित की गई है, जिसकी क्षमता प्रतिदिन तीन टन तक कार्बन डाइऑक्साइड कैप्चर करने की है।

इसके साथ ही डेक्कन ट्रैप्स की बेसाल्ट चट्टानों में वैज्ञानिक ड्रिलिंग के जरिए कार्बन डाइऑक्साइड के भू-भंडारण पर भी अध्ययन किया जाएगा। शोधकर्ता स्टोरेज क्षमता, इंजेक्टिविटी, फ्रैक्चर परमीएबिलिटी और लंबे समय तक कार्बन को सुरक्षित रखने की संभावनाओं पर रिसर्च करेंगे।

समुद्री पानी और औद्योगिक अपशिष्ट से भी काम करेगी तकनीक

IIT बॉम्बे में विकसित यह तकनीक जलीय-आधारित कैटेलिटिक कार्बन कैप्चर पद्धति पर आधारित है। इसकी खास बात यह है कि यह वातावरण और औद्योगिक उत्सर्जन दोनों से कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ सकती है।

साथ ही यह प्रक्रिया केवल मीठे पानी पर निर्भर नहीं है। इसमें औद्योगिक अपशिष्ट जल और समुद्री पानी जैसे गैर-पीने योग्य जल स्रोतों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव कम होगा।

औद्योगिक क्षेत्रों में दोबारा इस्तेमाल होगा कार्बन

कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट साल्ट में बदलकर स्टील, सीमेंट, पेट्रोकेमिकल और फार्मास्यूटिकल जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सकेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक “वेस्ट टू वेल्थ” मॉडल को बढ़ावा देगी, जहां औद्योगिक उत्सर्जन को दोबारा उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकेगा।

2070 नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में अहम कदम

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह पहल उभरती तकनीकों में भारत की बढ़ती क्षमता को दर्शाती है। उन्होंने इसे भारत की “पंचामृत” जलवायु प्रतिबद्धताओं और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य से भी जोड़ा।

उन्होंने कहा कि यह परियोजना राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उस विजन के अनुरूप है, जिसमें रिसर्च, इनोवेशन और उद्यमिता आधारित संस्थागत विकास पर जोर दिया गया है।

स्टार्टअप और इंडस्ट्री के सहयोग से विकसित हुई तकनीक

यह इंटीग्रेटेड सुविधा भारत सरकार, उद्योग भागीदारों और IIT बॉम्बे के इनोवेशन इकोसिस्टम के सहयोग से विकसित की गई है।

इस तकनीक को आगे बढ़ाने का काम UrjanovaC नामक डीप-टेक स्टार्टअप कर रहा है, जिसे IIT बॉम्बे के Society for Innovation and Entrepreneurship (SINE) में इनक्यूबेट किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल भारत को क्लाइमेट टेक्नोलॉजी और कार्बन मैनेजमेंट के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद कर सकती है।

Asmita Sarkar

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