
Indian Institute of Technology Gandhinagar के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी में सामने आया है कि शहरों में हरियाली बढ़ाने से गर्मी और हीट स्ट्रेस को कम करने में मदद मिल सकती है, लेकिन सिर्फ पेड़ लगाना ही पर्याप्त नहीं होगा। शोध में कहा गया है कि शहरों की जलवायु, आबादी की घनत्व और शहरी डिजाइन को ध्यान में रखकर ही प्रभावी समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
यह अध्ययन 2003 से 2020 के बीच भारत के 138 शहरों पर किया गया। इसमें ट्रॉपिकल सवाना, सेमी-एरिड स्टेपी और ह्यूमिड सबट्रॉपिकल जैसे अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि हरियाली का ठंडक देने वाला प्रभाव हर शहर में समान नहीं होता। यह नमी, पेड़ों की घनत्व, शहर की बनावट और हवा के बहाव जैसी स्थितियों पर निर्भर करता है।
यह रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जर्नल Nature Communications में प्रकाशित हुई है। इस शोध पत्र को अंगना बोरा, अद्रिजा दत्ता, आशीष एस कुमार, रविराज दवे और उदित भाटिया ने मिलकर तैयार किया है।
हर शहर के लिए अलग होनी चाहिए ग्रीनिंग रणनीति
आईआईटी गांधीनगर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर उदित भाटिया ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए शहरों में हरियाली जरूरी है, लेकिन सभी शहरों में एक जैसे पेड़ लगाने का लक्ष्य कारगर नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि शहरी हरियाली की योजना बनाते समय छाया, नमी और वेंटिलेशन यानी हवा के बहाव को साथ में ध्यान में रखना जरूरी है। वहीं रिसर्च ग्रेजुएट अंगना बोरा का कहना है कि असली सवाल यह नहीं है कि शहरों को हरा-भरा बनाया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि किस तरह की हरियाली चाहिए, उसे कहां लगाया जाए और कितनी मात्रा सही होगी।
स्टडी के अनुसार सूखे शहरों में हरियाली ज्यादा ठंडक दे सकती है, लेकिन अधिक नमी और घनी आबादी वाले इलाकों में हवा का सही बहाव बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
पार्क, पेड़ और खुली जगहों को साथ में प्लान करने की जरूरत
शोध में कहा गया है कि भारतीय शहरों को एकीकृत कूलिंग रणनीति अपनानी होगी। इसके तहत छायादार पेड़, पार्क, सड़क किनारे पौधारोपण, खुली जगहें और वेंटिलेशन कॉरिडोर को साथ में प्लान करना जरूरी होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक घने और नम इलाकों में पेड़ों की प्रजाति, उनकी दूरी, कटाई-छंटाई, सिंचाई और सड़क डिजाइन जैसे पहलू भी यह तय करते हैं कि हरियाली गर्मी कम करने में कितनी असरदार होगी।
गरीब और घनी बस्तियों में ज्यादा खतरा
रिसर्च में यह भी बताया गया कि खतरनाक गर्मी का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जो घनी और कम वेंटिलेशन वाली बस्तियों में रहते या काम करते हैं। इन इलाकों में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी बड़ी समस्या है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि बेहतर तरीके से प्लान की गई हरियाली ऐसी आबादी को लंबे समय तक गर्मी के खतरे से बचाने में मदद कर सकती है।
तापमान और नमी दोनों को ध्यान में रखकर हुई स्टडी
रिसर्च टीम ने Heat Index का इस्तेमाल किया, जो तापमान और नमी को मिलाकर यह बताता है कि इंसानी शरीर को गर्मी वास्तव में कितनी महसूस होती है। अध्ययन में सैटेलाइट डेटा, वनस्पति सूचकांक, पेड़ों की घनत्व, नाइट-टाइम लाइट डेटा और Local Climate Zone Mapping जैसी आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया गया।
स्टडी में पाया गया कि हरियाली सभी शहरों में एक जैसी ठंडक नहीं देती। कुछ मामलों में ज्यादा नमी और घनी आबादी वाले इलाकों में अत्यधिक पेड़ और घना कैनोपी स्ट्रक्चर उल्टा उमस और हीट स्ट्रेस को बढ़ा सकता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि भविष्य की शहरी योजना केवल ग्रीन कवर बढ़ाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जैसे-जैसे शहर ज्यादा गर्म और नम होते जाएंगे, वैसे-वैसे ऐसी रणनीति की जरूरत होगी जो छाया दे, नमी को संतुलित रखे और हवा के बहाव को भी बनाए रखे।




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