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IIT मद्रास ने विकसित किया ई-वेस्ट पायलट प्लांट, हर साल 100 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे का प्रसंस्करण करने में सक्षम

IIT मद्रास ने विकसित किया ई-वेस्ट पायलट प्लांट, हर साल 100 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे का प्रसंस्करण करने में सक्षम

IIT मद्रास ने विकसित किया ई-वेस्ट पायलट प्लांट, हर साल 100 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे का प्रसंस्करण करने में सक्षम

भारत में तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे की चुनौती से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए IIT मद्रास के शोधकर्ताओं ने एक स्वदेशी पायलट प्लांट विकसित किया है, जो हर साल 100 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे का प्रसंस्करण करने में सक्षम है। यह अत्याधुनिक सुविधा विशेष रूप से प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) से मूल्यवान धातुओं की रिकवरी के लिए तैयार की गई है और ई-कचरे के सुरक्षित एवं टिकाऊ प्रबंधन को बढ़ावा देगी।

IIT मद्रास द्वारा 14 जून को साझा की गई जानकारी के अनुसार, यह पायलट प्लांट तिरुचिरापल्ली स्थित BHEL परिसर में स्थापित किया गया है। इसकी क्षमता प्रति वर्ष लगभग 100 टन बिना आवरण वाले प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) को प्रोसेस करने की है। PCB इलेक्ट्रॉनिक कचरे का सबसे धातु-समृद्ध और संवेदनशील हिस्सा माना जाता है, जिसमें तांबा, टिन और सीसा जैसी महत्वपूर्ण धातुएं मौजूद होती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ई-कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निपटान नहीं किया जाए तो इनमें मौजूद धातुएं मिट्टी और भूजल में रिस सकती हैं। इससे लंबे समय तक पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में यह नई तकनीक न केवल कचरे के सुरक्षित निपटान में मदद करेगी, बल्कि उपयोगी संसाधनों की दोबारा प्राप्ति का रास्ता भी खोलेगी।

ई-कचरे से धातु निकालने की स्वदेशी तकनीक

IIT मद्रास के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह तकनीक पुराने और अनुपयोगी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से मूल्यवान धातुओं को निकालने में सक्षम है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक जीरो-डिस्चार्ज प्रक्रिया पर आधारित है। यानी इस पूरी प्रक्रिया के दौरान ऐसा कोई अपशिष्ट नहीं निकलता, जो पर्यावरण को प्रदूषित करे।

यह तकनीक सिंगल-एसिड प्रोसेस का उपयोग करती है, जिससे पूरी प्रक्रिया अधिक सरल, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल बन जाती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह मॉडल बड़े पैमाने पर ई-कचरे के प्रबंधन के लिए एक प्रभावी समाधान साबित हो सकता है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न उद्योग रिपोर्टों के अनुसार, भारत दुनिया के सबसे बड़े ई-कचरा उत्पादक देशों में शामिल है। देश में हर वर्ष लगभग 50 लाख मीट्रिक टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न होता है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण आने वाले वर्षों में यह मात्रा और बढ़ने की संभावना है।

ऐसे समय में ई-कचरे से उपयोगी धातुओं की रिकवरी करने वाली स्वदेशी तकनीक न केवल पर्यावरण संरक्षण में मदद करेगी, बल्कि आयातित धातुओं पर निर्भरता कम करने में भी योगदान दे सकती है। यह पहल सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को मजबूत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

‘मेक इन इंडिया’ और संसाधन सुरक्षा को मिलेगा बढ़ावा

IIT मद्रास के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग में YBG वर्मा चेयर प्रोफेसर प्रोफेसर एस. पुष्पावनम ने कहा कि भारत में ई-कचरे की बढ़ती चुनौती को देखते हुए यह पायलट प्लांट स्वच्छ और बड़े पैमाने पर धातु रिकवरी का एक व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार यह परियोजना ‘मेक इन इंडिया’, सर्कुलर इकोनॉमी और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की सुरक्षा जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप है।

उन्होंने बताया कि यह तकनीक IIT मद्रास की आंतरिक रूप से वित्तपोषित शोध परियोजना से विकसित हुई है और इसकी एक और बड़ी उपलब्धि यह है कि इसका निर्माण पूरी तरह भारतीय कंपनियों द्वारा किया गया है।

क्या हैं इस पायलट प्लांट की प्रमुख विशेषताएं?

इस स्वदेशी प्रणाली में सिंगल-एसिड तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे जीरो-डिस्चार्ज प्रक्रिया संभव हो पाती है। इसके अलावा इसमें उच्च स्तर की सुरक्षा व्यवस्था और ऑटोमेटेड संचालन प्रणाली शामिल है, जिससे औद्योगिक स्तर पर इसका उपयोग अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाया जाता है, तो भारत में ई-कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन और मूल्यवान धातुओं की रिकवरी के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।

Syed Sufiyan

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