Edinbox Hindi

जर्मनी में स्कूली शौचालयों की हालत सुधारने का अनूठा अभियान 

स्कूलों में अच्छे शिक्षक, बढ़िया कक्षाएं, प्रयोगशाला, लाइब्रेरी, खेल के मैदान जैसी स्वाभाविक लगने वाली जरूरतों की तुलना में बढ़िया शौचालय की आवश्यकता पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जबकि साफ-सुथरे शौचालय छात्रों और शिक्षकों, दोनों के लिए बेहद जरूरी हैं। जर्मनी के कई स्कूलों में शौचालय इतनी बदतर हालत में हैं कि छात्र वहां जाने से कतराते हैं। इसी को देखते हुए जर्मनी में ‘टॉइलेट्स मेक स्कूल’ अभियान चलाया जा रहा है ताकि स्कूली शौचालयों की हालत सुधारी जा सके। यह पहल इस दिशा में कारगर भी साबित हो रही है। 

“टॉइलेट्स मेक स्कूल” नाम के इस अभियान से जर्मनी के कई स्कूली शौचालयों की स्थिति संवरी है और छात्र, शिक्षक और अभिभावक भी बेहतर महसूस कर रहे हैं। इसी कड़ी में पिछले दिनों जर्मनी में पहला ‘स्कूल शौचालय सम्मेलन’ भी आयोजित किया गया। इसका आयोजन जर्मन टॉइलेट ऑर्गनाइजेशन (जीटीओ) ने किया, जिसके अंतर्गत स्कूल में शौचालयों को बेहतर बनाने से जुड़ी एक प्रतियोगिता के विजेताओं का एलान हुआ। जीतने वालों को 50 हजार यूरो से ज्यादा के पुरस्कार दिए गए। 

पुरस्कार जीतने वालों में शामिल 8वीं कक्षा के छात्र हेंड्रिक जिमॉन ने पुराने दिनों को याद करते हुए मीडिया को बताया, “पहले शौचालय में बहुत अंधेरा हुआ करता था, टॉइलेट पर लगे लिड भी तोड़-फोड़ दिए गए थे, कुल मिलाकर बहुत खराब माहौल था।  कई साल तक अपने स्कूल के शौचालय जाने से मैं कतराता रहा। यह हालत थी कि तेज पेशाब आने पर भी मैं रोक कर क्लास में बैठा रहता था। शौचालयों को रीडिजाइन किए जाने से पहले चीजें बहुत अलग थीं।”

रेनोवेशन के बाद जिमॉन के स्कूल की स्थिति बेहतर और खुशनुमा है। शौचालयों में डिस्को बॉल लगे हैं, पौधे हैं, बदबू मिटाने के लिए सेंट डिस्पेंसर है, जैकेट टांगने के लिए हुक लगे हैं। रोशनी, साबुन और टॉइलेट पेपर की भी कोई कमी नहीं। 

प्रतियोगिता की संयोजक स्वेन्या क्सॉल कहती हैं, “लोग इस मुद्दे के बारे में बात नहीं करते, इसकी उपेक्षा होती है, जैसे कि यह मायने ही नहीं रखता। यह बहुत खिझाने वाला है। कई शिक्षक और स्कूल प्रशासक हमसे कहते हैं कि ये बड़ा बेवकूफी भरा मुद्दा है, हम वैसे भी इस पर काबू नहीं कर सकते।” क्सॉल बताती हैं कि स्कूलों में मिलने वाला खाना और बुलीइंग के साथ-साथ शौचालय भी उन मुख्य मुद्दों में है, जिससे छात्र प्रभावित होते हैं। 

इस आयोजन का उद्देश्य जर्मनी के हर स्कूल को साफ और सुरक्षित शौचालय मुहैया कराना है। इसकी जरूरत रेखांकित करते हुए जीटीए ने यह भी दलील दी कि स्कूल का शौचालय समाज की वह शुरुआती जगह है, जहां बच्चे बड़ों की निगरानी के बिना सार्वजनिक संपत्ति को संभालना और उससे बरतना सीखते हैं। ऐसे में यह शैक्षणिक और सामाजिक मूल्यों के हिसाब से भी खासा महत्व रखता है। 

इस प्रतियोगिता के लिए जीटीओ ने इसी साल जनवरी में एक खास पोर्टल जारी किया था, जिसमें सभी स्कूलों से हिस्सा लेने की अपील की गई थी। प्रतियोगिता के तहत, शौचालयों की हालत सुधारने के लिए सुझाव देने थे। एंट्री भेजने की आखिरी तारीख 23 अप्रैल थी। हिस्सा लेने के लिए स्कूलों को एक टीम बनानी थी, जिसमें कुछ खास समूहों के लोग होने चाहिए थे। ये समूह थे: छात्र, शिक्षक, स्कूलों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, स्कूल प्रशासन, स्कूल की देखभाल और सुरक्षा करने वाले केअरटेकर और सफाईकर्मी। इसके लिए 14 राज्यों के 135 स्कूलों ने अपने सुझाव दिए। कुल मिलाकर 76,000 से ज्यादा स्कूली छात्रों ने भाग लिया। इसके बाद 13 से 17 मई तक शौचालय विशेषज्ञों की एक खास जूरी ने सभी एंट्रियों और सुझावों की समीक्षा की। 18 जून को राजधानी बर्लिन में आयोजित पहले जर्मन स्कूल टॉइलेट समिट में विजेताओं का एलान किया गया। 

दरअसल, जीटीओ ने बॉन यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट फॉर पब्लिक हेल्थ एंड हाइजीन (आईएचपीएच) के साथ मिलकर स्कूली शौचालयों की हालत पर एक विस्तृत अध्ययन किया था । पहली बार इसे एक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में खंगाला गया। इस स्टडी का मकसद स्कूलों में शौचालयों की हालत और साफ-सफाई की सुविधाओं का जायजा लेना था।  इसके अंतर्गत साल 2022 में राजधानी बर्लिन के 11 जिलों के 17 सेकेंडरी स्कूलों में सर्वे किया गया था। पाया गया कि कई मामलों में स्कूलों का बुनियादी ढांचा बुरी हालत में है। शौचालयों से बदबू आती है, निजता नहीं होती, वे इतने गंदे होते हैं कि छात्र वहां जाने से कतराते हैं। 

यह भी पाया गया कि स्कूली शौचालयों में ना केवल सफाई की ज्यादा व्यवस्था जरूरी है, बल्कि बदबू दूर करने के इंतजाम और स्कूल परिसर में सुरक्षा बढ़ाने पर भी काम करना होगा। साथ ही, आपत्तिजनक ग्रैफिटी आर्ट को भी हतोत्साहित किए जाने के जरूरत महसूस की गई। नतीजों के आधार पर चार मुख्य अनुशंसाएं की गईं। पहला, दिन में कम-से-कम दो बार शौचालयों की सफाई हो। दूसरा, डिजाइन संबंधी पक्षों में छात्रों की भी भागीदारी हो। तीसरा, कमियां बताने के लिए स्पष्ट और पारदर्शी संवाद की व्यवस्था हो। चौथा, कमियां दूर करने के लिए जल्दी कदम उठाए जाएं। 

इसे “टॉइलेट्स मेक स्कूल” का नाम दिया गया। इसके उद्देश्यों के बारे में बताते हुए कॉन्फ्रेंस ऑफ एजुकेशन मिनिस्टर्स 2024 की अध्यक्ष क्रिस्टीने श्ट्राइशेर्ट ने अपने संदेश में कहा, “स्कूल सीखने की जगह हैं। यह ऐसी जगह है जहां लोग साथ रहते हैं, हंसते हैं और रोज नए अनुभव पाते हैं। स्कूल एक ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां दिन का एक बड़ा हिस्सा बिताने वाले लोगों को अच्छा महसूस हो। स्कूल का अच्छा माहौल बस इस चीज से नहीं तय होता कि स्कूली कार्यक्रम अच्छा हो, सीखने का अच्छा माहौल हो।”

श्ट्राइशेर्ट ने शौचालयों पर ध्यान देने की जरूरत रेखांकित करते हुए कहा, “स्कूलों को ऐसी जगह भी होना चाहिए, जहां लोग सुरक्षित और आरामदेह महसूस करें। इसमें स्वाभाविक तौर पर स्कूली शौचालयों की साफ-सफाई भी शामिल है।” उन्होंने कहा कि इस दिशा में कई स्कूल अपने कार्यक्रम विकसित कर रहे हैं, जिसमें छात्रों को भी शामिल किया गया है और ऐसी पहल का स्वागत होना चाहिए।”

 

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed