
कंबोडिया, लाओस और म्यांमार जैसे देशों में नौकरी करने के लिए जाने वाले भारतीय युवाओं से साइबर क्राइम कराया जाता है। अगर वे मना करते हैं तो उनको पीटा जाता है। कई-कई दिनों तक भूखा रखा जाता था। जी हां, यह हम नहीं कह रहे बल्कि उन भारतीय युवाओं ने अपने दर्द की यह कहानी बयां की है, जो नौकरी के नाम पर इन देशों में साइबर क्राइम में फंसे थे और जिन्हें हाल ही में कंबोडिया, म्यांमार और लाओस से मुक्त कराया गया है।
भारतीय दूतावास ने हाल ही में कंबोडिया से 14, म्यांमार से आठ और लाओस से 13 भारतीय युवाओं को मुक्त कराया है। स्वयं दूतावास की तरफ से बताया गया है कि उसने कंबोडिया से 650 से अधिक, लाओस के साइबर क्राइम केंद्रों से 518 भारतीय नागरिकों को मुक्त कराने और वापस भेजने में मदद की है, जो नौकरी के नाम पर झांसों में फंसे थे।
यही वजह है कि इन देशों के भारतीय दूतावास ने लोगों से अपील की है कि वे कंबोडिया और अन्य किसी देश में नौकरी की पेशकश को लेकर सावधानी बरतें। संदिग्ध गतिविधि मिलने पर दूतवास को सूचना दें। अप्रैल में भी दूतावास ने फर्जी नौकरियों को लेकर एडवाइजरी जारी की थी। दूतावास ने कहा था कि कंबोडिया में आकर्षक नौकरी के फर्जी वादों के लालच में आकर भारत के लोग मानव तस्करों के जाल में फंस रहे हैं। भारत के लोग केवल अधिकृत एजेंटों के माध्यम से कंबोडिया आएं और नौकरी देने वालों के बारे में अच्छे से जांच करें।
बहरहाल, कंबोडिया से मुक्त कराये गए युवाओं का कहना है कि यहां जो पढ़े-लिखे युवा भारतीय छात्र आते हैं, उनसे साइबर क्रिमिनल धोखाधड़ी जैसे फोन कॉल से स्कैम के लिए भारतीयों को फोन कराते हैं। क्रिप्टो करेंसी में निवेश के नाम पर धोखाधड़ी कराते हैं। इसके अलावा जो अनपढ़ होते हैं, उनसे खनन और लकड़ी के कारखाने में मजदूरी कराई जाती है। ऐसा करने से मना करने पर उनको पीटा जाता है।
लाओस का भी यही हाल है जहाँ के साइबर क्राइम केंद्रों से 13 भारतीयों को मुक्त कराया गया। बताया गया है कि लाओस में गोल्डन ट्राइएंगल स्पेशल इकोनॉमिक जोन में कॉल सेंटर और क्रिप्टोकरेंसी धोखाधड़ी में शामिल कंपनियां युवाओं को डिजिटल सेल्स और मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव और कस्टमर सपोर्ट सर्विस में नौकरी देती थीं। कंपनियों के एजेंट दुबई, बैंकॉक, सिंगापुर और भारत में भारतीय युवाओं का साक्षात्कार और परीक्षा लेते थे। इसके बाद इनको थाईलैंड के रास्ते लाओस में सीमा पार लाया जाता था। इसके बाद लाओस में काम कराने के लिए बंदी बना लिया जाता था। दूतावास ने बताया कि अब तक ऐसे 518 भारतीयों को बचाया गया है।
कंबोडिया में भी कुछ ऐसा ही तरीका अपनाया गया जैसा लाओस में हुआ। भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक नौकरियों का वादा कर भारतीयों को कंबोडिया ले जाया गया। लेकिन कंबोडिया पहुंचने के बाद इनके पासपोर्ट ले लिए गए और इन्हें ऐसे काल सेंटरों में काम करने के लिए बाध्य किया गया जो भारतीयों को साइबर ठगी का शिकार बनाते हैं। पुलिस को इस बड़े घोटाले के बारे में पिछले साल के अंत में पता चला जब केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने दावा किया कि उसके साथ 67 लाख रुपये से अधिक की धोखाधड़ी हुई है और शिकायत दर्ज कराई। कंबोडिया से अब तक 650 भारतीयों को साइबर अपराधियों के चंगुल से बचाकर भारत भेजा जा चुका है। इनमें ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले हैं।
वहीं म्यांमार के हपा लू म्यावाड्डी से नौकरी के नाम पर लाए गए आठ भारतीयों को बचाया गया। म्यांमार में भारतीय दूतावास ने बताया कि म्यांमार पुलिस ने आठ भारतीयों को मुक्त कराया है। म्यांमार के अधिकारियों की सहायता से फर्जी नौकरी रैकेट का भंडफोड़ किया गया।




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