उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों को लेकर इन दिनों राजनीतिक बयानबाजी और सोशल मीडिया पर बहस तेज है। दावा किया जा रहा है कि 2017 के बाद राज्य में 26 हजार से ज्यादा सरकारी प्राथमिक स्कूल बंद हो गए। दूसरी ओर, हालिया राष्ट्रीय आंकड़े भी बताते हैं कि पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या में बड़ी कमी आई है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने स्कूल कम हुए, बल्कि यह भी है कि क्या इन सभी स्कूलों पर ताला लगा या बड़ी संख्या में स्कूलों का विलय किया गया?
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों और रिपोर्टों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। स्कूलों की संख्या में वास्तविक गिरावट दर्ज हुई है, लेकिन इसे सीधे-सीधे इतने स्कूलों के भवन बंद होने के बराबर मानना सही नहीं होगा। कई मामलों में स्कूलों के विलय और एकीकरण (School Consolidation) के कारण अलग-अलग स्कूलों को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में दर्ज किया गया है।
26 हजार स्कूलों का दावा कहां से आया?
2017 के बाद उत्तर प्रदेश में 26 हजार से अधिक सरकारी प्राथमिक स्कूलों के बंद होने का दावा समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अगस्त 2026 में किया था। उनके मुताबिक, मार्च 2017 तक राज्य में 1,13,938 सरकारी प्राथमिक स्कूल थे और उसके बाद 26 हजार से अधिक स्कूल कम हुए। उन्होंने लखीमपुर खीरी, सीतापुर, प्रयागराज और गोरखपुर जैसे जिलों में बड़ी संख्या में स्कूलों के बंद होने का दावा भी किया था। यह एक राजनीतिक दावा है, इसलिए इसे सरकारी आंकड़े के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों की संख्या में गिरावट की बात अलग सरकारी डेटा से भी सामने आती है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के आधार पर 2014-15 से 2024-25 के बीच देश में सरकारी स्कूलों की संख्या करीब 94 हजार कम हुई। रिपोर्ट में स्कूलों की संख्या में कमी के पीछे स्कूलों के विलय, कम नामांकन और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसे कारणों का उल्लेख किया गया है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में मिलाकर करीब 40 हजार स्कूलों पर इस बदलाव का असर पड़ा।
इसलिए 26 हजार के आंकड़े को समझते समय यह अंतर महत्वपूर्ण है कि ‘स्कूलों की संख्या कम होना’ और ’26 हजार स्कूल भवनों का पूरी तरह बंद हो जाना’ एक ही बात नहीं है।
क्या सभी स्कूलों पर लगा ताला?
नहीं। स्कूलों की संख्या घटने का एक प्रमुख कारण विलय या कंसोलिडेशन भी है। इसका मतलब है कि आसपास स्थित या बहुत कम छात्र संख्या वाले दो या अधिक स्कूलों को प्रशासनिक तौर पर एक स्कूल में शामिल कर दिया जाता है।
नीति आयोग की स्कूल शिक्षा से जुड़ी रिपोर्ट में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को मिलाकर बड़े स्कूल बनाने की नीति को संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से जोड़ा गया है। रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के उदाहरण में बताया गया है कि एक ही परिसर या बहुत पास स्थित अलग-अलग स्कूलों को एक स्कूल के रूप में एकीकृत किया गया। ऐसे मामलों में स्कूल की प्रशासनिक पहचान खत्म हो सकती है, जबकि बच्चों की पढ़ाई उसी या संबंधित परिसर में जारी रह सकती है।
उत्तर प्रदेश के मामले में भी उपलब्ध रिपोर्टों में स्कूलों की संख्या में कमी को बड़े पैमाने पर स्कूल विलय और एकीकरण से जोड़ा गया है। इसलिए ’26 हजार स्कूल बंद’ जैसी हेडलाइन पूरी तस्वीर नहीं बताती।
सरकारी आंकड़ों में अभी भी यूपी सबसे बड़ा स्कूल नेटवर्क वाला राज्य
UDISE+ के 2024-25 आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 1,37,172 सरकारी प्राथमिक स्कूल दर्ज थे। सभी श्रेणियों को मिलाकर राज्य में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या 2,62,358 थी। इसका मतलब है कि स्कूलों की संख्या में पिछले वर्षों में कमी आने के बावजूद उत्तर प्रदेश में अभी भी देश के सबसे बड़े सरकारी स्कूल नेटवर्क में से एक मौजूद है।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि स्कूलों की संख्या में कमी को सीधे सरकारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था के खत्म होने के रूप में नहीं देखा जा सकता। राज्य में लाखों बच्चे अब भी सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और सरकारी स्कूलों का नेटवर्क बहुत बड़ा है।
465 स्कूलों की मान्यता क्यों रद्द हुई?
सरकारी स्कूलों के विलय से अलग एक दूसरा मामला निजी स्कूलों की मान्यता रद्द किए जाने का है। जून 2026 में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद यानी UP Board ने राज्य के 465 स्ववित्तपोषित स्कूलों की मान्यता वापस ली थी।
बोर्ड के अनुसार इन स्कूलों में लगातार दो शैक्षणिक सत्रों यानी 2024-25 और 2025-26 में न तो कक्षाएं संचालित हुईं और न ही कोई छात्र बोर्ड परीक्षा में शामिल हुआ। जांच के बाद इन्हें गैर-संचालित संस्थान माना गया और उनकी मान्यता वापस ली गई।
यह कार्रवाई सरकारी प्राथमिक स्कूलों के विलय से अलग है। इसलिए 465 निजी स्कूलों की मान्यता रद्द होने के आंकड़े को भी 26 हजार सरकारी प्राथमिक स्कूलों के दावे के साथ जोड़कर देखना सही नहीं होगा।
क्या स्कूलों के विलय से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। सरकार या प्रशासन के नजरिए से बहुत कम छात्र संख्या वाले अलग-अलग स्कूलों को एक जगह लाने से शिक्षकों, भवनों और अन्य संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। नीति आयोग की रिपोर्ट में भी बड़े और बेहतर संसाधनों वाले स्कूलों के जरिए शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था सुधारने की संभावना बताई गई है।
लेकिन दूसरी तरफ, स्कूल का स्थान बदलना या बच्चों को दूसरे परिसर में जाना पड़ना ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में गंभीर सवाल पैदा कर सकता है। खासकर छोटे बच्चों, लड़कियों और ऐसे परिवारों के लिए जिनके पास रोजाना आने-जाने की सुविधा नहीं है। स्कूल की दूरी बढ़ने पर नामांकन और नियमित उपस्थिति पर असर पड़ने की आशंका को लेकर शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों और संगठनों ने चिंता जताई है।
इसलिए स्कूल कंसोलिडेशन की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने स्कूलों को एक किया गया। यह भी देखना जरूरी है कि बच्चों की स्कूल तक पहुंच, शिक्षकों की उपलब्धता, कक्षा की गुणवत्ता और नामांकन पर इसका क्या असर पड़ा।
यूपी की शिक्षा व्यवस्था पर क्या कहता है मौजूदा डेटा?
UDISE+ के 2024-25 आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों का नेटवर्क अभी भी बहुत बड़ा है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर पिछले दशक में सरकारी स्कूलों की संख्या और सरकारी स्कूलों में नामांकन दोनों में गिरावट दर्ज हुई है। नीति आयोग ने इसके पीछे स्कूल विलय के साथ कम होती स्कूल-आयु आबादी और ऊपरी कक्षाओं में छात्रों को बनाए रखने की चुनौतियों को भी कारणों में शामिल किया है।
इसका मतलब यह है कि यूपी में स्कूलों की संख्या घटने का मुद्दा वास्तविक है, लेकिन ’26 हजार स्कूलों पर ताला लग गया’ कहना पूरी तस्वीर नहीं है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि स्कूलों की संख्या में कमी के पीछे विलय और एकीकरण की बड़ी भूमिका है। साथ ही, जहां किसी इलाके में स्कूल वास्तव में बंद या स्थानांतरित हुए हैं, वहां बच्चों की शिक्षा तक आसान पहुंच बनाए रखना एक अलग और महत्वपूर्ण नीति चुनौती है।
आखिरकार, इस बहस का असली सवाल स्कूलों की संख्या से आगे जाता है—क्या हर बच्चे को उसके घर के पास अच्छी गुणवत्ता वाला सरकारी स्कूल, पर्याप्त शिक्षक और जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं? स्कूलों का विलय तभी प्रभावी माना जा सकता है जब इससे संसाधन बेहतर हों, लेकिन बच्चों की शिक्षा तक पहुंच मुश्किल न हो।




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