जामिया मिल्लिया इस्लामिया में करीब दो दशक बाद छात्र संघ चुनाव कराने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र संघ के संविधान का मसौदा तैयार करने वाली टीम में प्रोफेसरों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ छात्रों को भी शामिल करने का फैसला किया है। हर फैकल्टी से छात्र प्रतिनिधि लिए जाएंगे, ताकि संविधान तैयार करते समय अलग-अलग विभागों और संकायों के विद्यार्थियों की राय भी सामने आ सके।
विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. एमडी महताब आलम रिजवी के अनुसार, छात्र संघ के संविधान को मंजूरी देने और लागू करने की प्रक्रिया 15 मई 2027 तक पूरी की जाएगी। इसके बाद लिंगदोह समिति की सिफारिशों और दिशा-निर्देशों के अनुसार चुनाव की अधिसूचना जारी होगी। प्रशासन ने 16 जुलाई 2027 से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र के छह सप्ताह के भीतर चुनाव कराने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, अभी मतदान की कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई है।
संविधान बनाने में छात्रों की भी होगी भागीदारी
जामिया प्रशासन के पहले गठित पांच सदस्यीय मसौदा समिति में विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शामिल थे। इस पर आंदोलन कर रहे छात्रों ने आपत्ति जताई थी। उनकी मांग थी कि छात्र संघ का संविधान तैयार करने की प्रक्रिया में विद्यार्थियों को भी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
अब प्रशासन ने इस मांग को स्वीकार करते हुए हर फैकल्टी से छात्र प्रतिनिधियों को शामिल करने का फैसला किया है। रजिस्ट्रार के मुताबिक, छात्रों और समिति की ओर से मिले सुझावों को संबंधित हितधारकों के पास टिप्पणियों के लिए भेजा जाएगा। इसके बाद मसौदे की कानूनी समीक्षा होगी। फिर इसे अकादमिक परिषद और कार्यकारिणी परिषद के सामने रखा जाएगा। अंतिम मंजूरी के लिए मसौदा विजिटर के नामित प्रतिनिधि के पास भेजा जाएगा।
विश्वविद्यालय का कहना है कि छात्र संघ का चुनाव लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार कराया जाएगा। इस समिति ने उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ चुनाव को पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के लिए दिशा-निर्देश दिए थे।
18 दिन के आंदोलन के बाद बनी सहमति
छात्र संघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर जामिया में 12 अक्टूबर 2026 से विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल शुरू हुई थी। छात्रों की प्रमुख मांग थी कि विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव कराने के लिए केवल आश्वासन न दे, बल्कि संविधान तैयार करने और मतदान की प्रक्रिया के लिए स्पष्ट समय-सीमा भी तय करे।
21 अक्टूबर को विश्वविद्यालय ने छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की थी। हालांकि, छात्रों ने इसमें छात्र प्रतिनिधियों को शामिल नहीं किए जाने पर असंतोष जताया। 26 अक्टूबर को प्रशासन ने संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिन के भीतर चुनाव कराने की बात कही, लेकिन संविधान को मंजूरी देने की अंतिम तारीख तय नहीं की गई थी। इससे छात्रों की चिंता दूर नहीं हुई और आंदोलन जारी रहा।
आखिरकार 29 अक्टूबर को विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस के मौके पर प्रशासन ने संविधान को 15 मई 2027 तक मंजूरी देने और लागू करने की समय-सीमा तय की। साथ ही अगले शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के छह सप्ताह के भीतर चुनाव कराने पर सहमति बनी। इसके बाद 18 दिनों से चल रहा आंदोलन और भूख हड़ताल समाप्त हो गई। प्रशासन ने आंदोलन की अवधि में जारी कारण बताओ नोटिस, निलंबन, निष्कासन और परिसर में प्रवेश पर रोक जैसे अनुशासनात्मक आदेश वापस लेने का भी निर्देश दिया।
2006 में भंग हुआ था छात्र संघ
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आखिरी बार छात्र संघ चुनाव 2005 में हुए थे। इसके बाद 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र संघ को भंग कर दिया था। प्रशासन ने उस समय परिसर में हिंसक घटनाओं, शिक्षकों पर हमलों और कक्षाओं में बाधा जैसी घटनाओं को इसकी वजह बताया था।
मई 2012 में राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में भी केंद्र सरकार ने विश्वविद्यालय की ओर से दी गई जानकारी का उल्लेख किया था। इसके अनुसार, परिसर में हिंसक घटनाओं की एक श्रृंखला के बाद छात्र संघ भंग किया गया था। इसमें आखिरी घटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति पर हमले से जुड़ी थी।
छात्र संघ के अभाव में विश्वविद्यालय के कई विभागों और केंद्रों में विषय संघों के माध्यम से छात्रों का प्रतिनिधित्व होता रहा है। हालांकि, यह व्यवस्था पूरे विश्वविद्यालय के स्तर पर चुने गए छात्र संघ का विकल्प नहीं मानी जाती।
2022 में दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचा था मामला
जामिया में छात्र संघ चुनाव कराने की मांग पहले भी अदालत तक पहुंच चुकी है। वर्ष 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को चुनाव कराने की संभावना पर विचार करने के लिए समिति गठित करने को कहा था। हालांकि, इससे तत्काल चुनाव का रास्ता नहीं खुला।
दिसंबर 2022 में भी छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई की थी। विश्वविद्यालय की ओर से छात्र संघ के भंग होने और चुनाव की जरूरत न होने संबंधी दलीलें रखी गई थीं। अदालत ने विश्वविद्यालय को चुनाव कराने का निर्देश दिए बिना याचिका का निपटारा कर दिया था। इस आदेश को भविष्य में चुनाव कराने पर स्थायी रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अब 2027 में चुनाव कराने की तैयारी
जामिया प्रशासन की नई समय-सीमा के बाद अब सबसे अहम काम छात्र संघ के संविधान को तय प्रक्रिया के तहत तैयार कर मंजूरी दिलाना है। इसमें छात्रों की भागीदारी और अलग-अलग विश्वविद्यालय निकायों की मंजूरी महत्वपूर्ण होगी। इसके बाद मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं पर काम किया जाएगा।
यदि प्रशासन तय समय-सीमा का पालन करता है, तो 2027 के नए शैक्षणिक सत्र में जामिया के विद्यार्थियों को करीब 20 साल बाद अपना विश्वविद्यालय स्तरीय छात्र प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिल सकता है। फिलहाल चुनाव की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट समय-सीमा सामने आना छात्रों और विश्वविद्यालय दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।


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