
केंद्र सरकार ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए स्कूल शिक्षा में बड़े बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसी कड़ी में 1 अप्रैल से ‘समग्र शिक्षा 3.0’ अभियान शुरू किया जाएगा, जिसके तहत सरकारी स्कूलों को समाज से सीधे जोड़ने का नया मॉडल लागू किया जाएगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और 11 राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ हुई बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।
अब स्कूल प्रबंधन में विशेषज्ञ भी होंगे शामिल
बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अब सरकारी स्कूलों की संचालन व्यवस्था में सिर्फ अभिभावक ही नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। ये विशेषज्ञ स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) का हिस्सा होंगे और पढ़ाई के स्तर, खेल सुविधाओं, कौशल विकास, फीस नियंत्रण और ड्रॉप-आउट रोकने जैसे अहम मुद्दों पर सुझाव देंगे।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा कि स्कूलों की संरचना और शिक्षकों के वेतन की जिम्मेदारी सरकार की होगी, लेकिन स्कूलों का संचालन समाज की सहभागिता से आगे बढ़ाया जाएगा।
उद्देश्य: पुरानी सोच से आगे बढ़कर नई पीढ़ी के लिए बेहतर शिक्षा
सरकार का मानना है कि देश को 2047 तक विकसित बनाने के लिए मजबूत और सक्षम मानव पूंजी आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए समग्र शिक्षा 3.0 को इस तरह तैयार किया गया है कि स्कूल शिक्षा पुरानी व्यवस्था और सीमाओं से बाहर निकलकर अधिक गुणवत्तापूर्ण, व्यावहारिक और परिणाम-आधारित बन सके।
बैठक में कई राज्यों की भागीदारी
इस बैठक में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र सहित 11 राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया। राज्यों से प्राप्त सुझावों के आधार पर देशभर में एक समान, अधिक प्रभावी और जवाबदेह शिक्षा प्रबंधन प्रणाली तैयार की जाएगी।
मुख्य फोकस: नामांकन बढ़ाना, तकनीक से जोड़ना और तनाव कम करना
नई शिक्षा व्यवस्था में तीन मुख्य लक्ष्य तय किए गए हैं—
– 12वीं तक शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करना
– परीक्षा के तनाव को कम करना
– स्कूलों में आधुनिक तकनीक और डिजिटल संसाधनों का विस्तार करना
सरकार अब शिक्षा को सिर्फ एक पारंपरिक योजना के रूप में नहीं, बल्कि क्वालिटी और लर्निंग आउटकम पर आधारित फ्रेमवर्क के रूप में विकसित कर रही है। इसका मकसद है कि हर बच्चे को बेहतर सीखने का अवसर मिले और देश के भविष्य को मजबूत आधार मिल सके।




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