Edinbox Hindi
IIT में छात्र आत्महत्या: देश के शीर्ष संस्थानों में बढ़ता मानसिक दबाव, जवाबदेही पर उठे सवाल

IIT में छात्र आत्महत्या: देश के शीर्ष संस्थानों में बढ़ता मानसिक दबाव, जवाबदेही पर उठे सवाल

IIT में छात्र आत्महत्या: देश के शीर्ष संस्थानों में बढ़ता मानसिक दबाव, जवाबदेही पर उठे सवाल

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर में मंगलवार को एक छात्र की आत्महत्या की घटना ने एक बार फिर देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते दो वर्षों में IIT कानपुर में 9 छात्रों की मौत हो चुकी है, जो देश के सभी 23 IIT परिसरों में सबसे अधिक बताई जा रही है। यह आंकड़ा न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि संस्थागत व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़ा करता है।

देशभर के IIT में 65 छात्रों की मौत

ग्लोबल IIT एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच देश के अलग-अलग IIT कैंपस में कम से कम 65 छात्रों ने अपनी जान गंवाई। इनमें से 30 मामले सिर्फ पिछले दो वर्षों के हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह रुझान बताता है कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, पढ़ाई का दबाव और अपेक्षाओं का बोझ छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है।

IIT कानपुर पर सबसे ज्यादा सवाल

ग्लोबल IIT एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के संस्थापक और IIT कानपुर के पूर्व छात्र (2004 बैच) धीरज सिंह ने इस स्थिति को लेकर उच्च स्तर पर सीधी जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि पिछले दो वर्षों में IIT में हुई कुल आत्महत्याओं में से करीब 30 प्रतिशत मामले केवल IIT कानपुर कैंपस से सामने आए हैं।

धीरज सिंह के अनुसार, जब किसी एक संस्थान में इस तरह की घटनाएं लगातार होती हैं, तो इसे केवल छात्रों की व्यक्तिगत कमजोरी या पढ़ाई के दबाव तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह साफ तौर पर संस्थागत विफलता की ओर इशारा करता है।

नीतियां हैं, लेकिन असर क्यों नहीं?

उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य कोई मामूली मुद्दा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी इसे जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का अहम हिस्सा मानता है, जिससे यह संस्थानों की संवैधानिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे छात्रों की सुरक्षा और मानसिक भलाई सुनिश्चित करें।

धीरज सिंह का कहना है कि अधिकांश IIT परिसरों में नीतियां, समितियां और काउंसलिंग सेंटर मौजूद हैं, लेकिन जवाबदेही की कमी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। अगर देश के सबसे नामी संस्थान भी अपने छात्रों को सुरक्षित माहौल नहीं दे पा रहे हैं, तो यह संसाधनों की नहीं बल्कि प्रशासन और शासन की गंभीर नाकामी को दर्शाता है।

संवेदना से आगे ठोस कदम जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि हर घटना के बाद संवेदना जताना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता को कागजों से निकालकर जमीन पर प्रभावी बनाया जाए, काउंसलिंग सिस्टम को मजबूत किया जाए और प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट जिम्मेदारी तय हो।

IIT जैसे संस्थानों से न केवल अकादमिक उत्कृष्टता की उम्मीद की जाती है, बल्कि यह भी अपेक्षा होती है कि वे छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को समान प्राथमिकता दें। बढ़ते मामलों ने यह साफ कर दिया है कि अब समय नीतियों से आगे बढ़कर ठोस परिणाम सुनिश्चित करने का है।

एडइनबॉक्स टीम

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed