Edinbox Hindi
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26: ड्रॉपआउट और कम नामांकन भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26: ड्रॉपआउट और कम नामांकन भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26: ड्रॉपआउट और कम नामांकन भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती

केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से बीते वर्षों में शिक्षा को बेहतर और सभी तक पहुंचाने के लिए कई बड़े कदम उठाए गए हैं। इसके बावजूद, स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट की समस्या और उच्च शिक्षा में कम सकल नामांकन अनुपात (GER) भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर तय लक्ष्यों को हासिल करना है, तो इस दिशा में प्रयासों की रफ्तार बढ़ानी होगी।

स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट की चिंता

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, देश में प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 1.9 प्रतिशत है, जबकि उच्च प्राथमिक स्तर पर यह 5.2 प्रतिशत और माध्यमिक स्तर पर 14.1 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। यह आंकड़े बताते हैं कि जैसे-जैसे बच्चे आगे की कक्षाओं में बढ़ते हैं, पढ़ाई छोड़ने वालों की संख्या भी बढ़ती जाती है।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि बारहवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते बड़ी संख्या में छात्र शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं। सर्वे के मुताबिक, पहली से पांचवीं कक्षा तक सकल नामांकन अनुपात 90.9 प्रतिशत है, जबकि बारहवीं कक्षा में यह घटकर 58.4 प्रतिशत रह जाता है। इसके पीछे बोर्ड परीक्षाओं में असफलता, कमजोर आर्थिक स्थिति और परिवार की जिम्मेदारियां जैसे कारण प्रमुख हैं। कई बच्चे पढ़ाई छोड़कर मजदूरी या छोटे-मोटे कामों में लग जाते हैं।

2030 और 2035 के लक्ष्य पर खतरा

आर्थिक सर्वेक्षण में यह चिंता ऐसे समय जताई गई है, जब सरकार ने 2030 तक स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों पर 100 फीसदी GER और 2035 तक उच्च शिक्षा में GER को 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। मौजूदा स्थिति को देखते हुए सर्वे ने साफ कहा है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए मौजूदा प्रयास पर्याप्त नहीं हैं और नीति स्तर पर तेजी लाने की जरूरत है।

फिलहाल, उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात करीब 28 प्रतिशत है। इसे लगभग दोगुना करना आसान नहीं होगा, इसके लिए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ नए अवसर तैयार करने होंगे।

उच्च शिक्षा में बहुविषयक मॉडल पर जोर

आर्थिक सर्वेक्षण में 2040 तक सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को बहुविषयक संस्थान के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि केवल इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट या शिक्षक शिक्षा तक सीमित संस्थानों को भी अन्य विषयों से जुड़े कोर्स शुरू करने होंगे।

इस दिशा में आईआईटी जैसे प्रमुख संस्थानों ने पहल शुरू कर दी है, लेकिन सर्वे का कहना है कि इसे बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और संसाधनों की जरूरत होगी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) लागू होने के बाद शिक्षा सुधार की दिशा में जो कदम उठाए गए हैं, उन पर सर्वे ने संतोष जताया है, लेकिन साथ ही रफ्तार बढ़ाने की सलाह भी दी है।

युवा आबादी: अवसर भी, चेतावनी भी

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती है, लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने इसे लेकर भी चेतावनी दी है। सर्वे के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत की करीब 27 प्रतिशत आबादी 3 से 18 वर्ष की उम्र के बच्चों की थी। अनुमान है कि 2047 तक भी यह हिस्सा 20 प्रतिशत से अधिक बना रहेगा।

इसके बावजूद, संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक (HDI) में शामिल भारत का एजुकेशन इंडेक्स वैश्विक स्तर पर कमजोर बना हुआ है। इसकी बड़ी वजह Expected Years of Schooling यानी बच्चों की औसत अपेक्षित पढ़ाई के वर्षों का कम होना है, जो कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पीछे है।

शिक्षा से प्रोडक्टिविटी और इनोवेशन का रास्ता

सर्वे में कहा गया है कि स्कूली शिक्षा ही मानव पूंजी की नींव रखती है और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने में इसकी भूमिका बेहद अहम है। एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के अनुभव बताते हैं कि शिक्षा, कौशल विकास और तकनीक में लगातार निवेश से उत्पादकता बढ़ती है, नवाचार को बढ़ावा मिलता है और आर्थिक बदलाव तेज होते हैं।

सर्वे साफ संकेत देता है कि स्कूल शिक्षा को मजबूत करना अब सिर्फ एक सेक्टोरल सुधार नहीं, बल्कि देश के भविष्य की समृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती का सवाल है। अगर बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता और शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधरी, तो युवा आबादी का यह लाभ आगे चलकर बोझ भी बन सकता है।

सरकारी स्कूलों की अहम भूमिका, निजी क्षेत्र की मजबूत मौजूदगी

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के मुताबिक, देश में इस समय 24.69 करोड़ छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इन्हें 14.71 लाख स्कूलों और 1.01 करोड़ से अधिक शिक्षक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। यह आंकड़े भारत की शिक्षा व्यवस्था के विशाल आकार को दिखाते हैं।

सर्वे के अनुसार, देश के कुल स्कूलों में 69 प्रतिशत सरकारी स्कूल हैं, जिनमें लगभग आधे छात्र पढ़ते हैं। वहीं, निजी स्कूल कुल स्कूलों का 26 प्रतिशत हैं, लेकिन इनमें कुल नामांकन का 41 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया है। इससे साफ है कि सरकारी स्कूल शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं, जबकि निजी क्षेत्र भी बड़ी संख्या में छात्रों को शिक्षा दे रहा है।

NEP 2020 और 100 फीसदी GER का रोडमैप

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य प्री-प्राइमरी से सेकेंडरी स्तर तक 100 प्रतिशत GER हासिल करना है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, इस दिशा में प्रगति जरूर हुई है, लेकिन असमानता अब भी बनी हुई है। फाउंडेशनल स्टेज में GER 41.4, प्रिपरेटरी स्टेज में 95.4, मिडिल स्टेज में 90.3 और सेकेंडरी स्टेज में 68.5 दर्ज किया गया है। सेकेंडरी स्तर पर नामांकन बढ़ाना अब भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

APAAR ID से छात्रों की डिजिटल ट्रैकिंग

सर्वे में बताया गया है कि NEP के लक्ष्यों की निगरानी अब APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) ID के जरिए की जा रही है। यह आधार से जुड़ी डिजिटल पहचान प्रणाली है, जिसके तहत छात्रों के शैक्षणिक रिकॉर्ड को सुरक्षित तरीके से डिजिटल रूप में रखा जाता है। APAAR ID के जरिए स्कूल, उच्च शिक्षा और स्किल एजुकेशन के दौरान छात्रों की नामांकन स्थिति और पढ़ाई की प्रगति पर नजर रखी जा सकेगी।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 का संदेश साफ है—भारत के पास एक ऐतिहासिक अवसर है कि वह अपनी बड़ी स्कूली आबादी को बेहतर शिक्षा देकर डेमोग्राफिक डिविडेंड को आर्थिक ताकत में बदले। लेकिन इसके लिए ड्रॉपआउट दर कम करना, पढ़ाई के वर्षों को बढ़ाना और सीखने के नतीजों में सुधार करना जरूरी होगा। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो 2047 तक भी भारत की युवा आबादी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकती है।

एडइनबॉक्स टीम

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed