
लोकसभा में बजट सत्र के दौरान उच्च शिक्षा में सामाजिक समावेशन और समान अवसरों को लेकर अहम चर्चा हुई। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों की भागीदारी पर सवाल उठाते हुए आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सांसद डॉ. डी. रवि कुमार ने सरकार से निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में इन वर्गों के नामांकन को लेकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उन्होंने हालिया अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वे (AISHE) 2022-23 के आंकड़ों के संदर्भ में शिक्षा मंत्रालय से जवाब मांगा।
डॉ. रवि कुमार ने पूछा कि क्या सरकार ने उन निजी उच्च शिक्षा संस्थानों और ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस’ (IoE) में SC, ST और OBC छात्रों के नामांकन का आकलन किया है, जिन्हें केंद्र सरकार से वित्तीय या नीतिगत सहायता मिलती है। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि ऐसे संस्थानों में आरक्षित सीटों और वास्तविक नामांकन का संस्थान-वार विवरण उपलब्ध है या नहीं। सांसद ने आगे सवाल किया कि यदि ऐसा कोई आकलन नहीं किया गया है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं। साथ ही उन्होंने यह भी पूछा कि क्या सरकार आरक्षण, समानता और समावेशन से जुड़े नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए अनुदान, छात्रवृत्ति या IoE दर्जे से जुड़ी निगरानी और पारदर्शिता की कोई ठोस व्यवस्था लागू करने की योजना बना रही है।
इस पर शिक्षा मंत्रालय में राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने लोकसभा में जवाब देते हुए कहा कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में आती है, इसलिए उच्च शिक्षा में सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ाना केंद्र और राज्य सरकारों दोनों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि मंत्रालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत कई योजनाएं और कार्यक्रम चला रहा है। NEP 2020 का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी छात्र को उसकी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर से वंचित न होना पड़े। यह नीति सामाजिक असमानताओं को कम करने, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और शिक्षा के परिणामों को बेहतर बनाने पर जोर देती है।
मंत्री ने यह भी याद दिलाया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2006 में केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम लागू किया था। इसके तहत केंद्रीय संस्थानों में SC के लिए 15 प्रतिशत, ST के लिए 7.5 प्रतिशत और OBC के लिए 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। इसके अलावा जनवरी 2019 से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू है। दिव्यांग व्यक्तियों के लिए 5 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का भी प्रावधान है।
उच्च शिक्षा में पहुंच बढ़ाने के लिए सरकार ने कई व्यावहारिक कदम उठाए हैं। इनमें फीस में राहत, नए शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना, विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाएं और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की छात्रवृत्तियों में प्राथमिकता देना शामिल है। राज्य मंत्री ने बताया कि सरकार सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए, जिनमें पात्र निजी संस्थान भी शामिल हैं, सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के छात्रों की पढ़ाई को आसान बनाने के लिए छात्रवृत्ति और फेलोशिप योजनाएं चला रही है।
AISHE 2022-23 के आंकड़े भी इस दिशा में एक अहम तस्वीर पेश करते हैं। सर्वे के अनुसार, देश में कुल उच्च शिक्षा नामांकन में SC, ST और OBC छात्रों की हिस्सेदारी बढ़कर 60.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि सामान्य वर्ग (EWS सहित) की हिस्सेदारी लगभग 39 प्रतिशत है। सरकारी संस्थानों में इन वर्गों का नामांकन 62.2 प्रतिशत है, वहीं निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में भी यह आंकड़ा करीब 60 प्रतिशत के आसपास है। यह संकेत देता है कि आरक्षण के साथ-साथ योग्यता के आधार पर भी इन वर्गों के छात्र बड़ी संख्या में आगे बढ़ रहे हैं।
कुल मिलाकर, संसद में हुई इस चर्चा और सामने आए आंकड़ों से यह साफ होता है कि उच्च शिक्षा में सामाजिक समावेशन को लेकर सरकार की नीतियों का असर दिख रहा है, हालांकि निजी संस्थानों में पारदर्शिता और निगरानी को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं।




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