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गोवा में शिक्षकों के लिए नई मेडिकल लीव पॉलिसी: लाइलाज बीमारियों में एक साल तक सवैतनिक अवकाश

गोवा में शिक्षकों के लिए नई मेडिकल लीव पॉलिसी: लाइलाज बीमारियों में एक साल तक सवैतनिक अवकाश

गोवा में शिक्षकों के लिए नई मेडिकल लीव पॉलिसी: लाइलाज बीमारियों में एक साल तक सवैतनिक अवकाश

गंभीर बीमारी के दौर में सबसे बड़ी चिंता इलाज की नहीं, बल्कि नौकरी और भविष्य की होती है। लंबी मेडिकल लीव लेने से सैलरी रुकने, प्रमोशन प्रभावित होने या पेंशन पर असर पड़ने का डर कई कर्मचारियों को समय पर इलाज शुरू करने से भी रोक देता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए Goa सरकार ने स्कूल शिक्षकों के लिए एक महत्वपूर्ण नीति लागू की है।

10 फरवरी 2026 को शिक्षा निदेशक शैलेश झेंडे द्वारा जारी आदेश के तहत राज्य के शिक्षा निदेशालय ने लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे शिक्षकों के लिए एक वर्ष तक का सवैतनिक विशेष मेडिकल अवकाश देने की व्यवस्था की है। यह नीति Goa, Daman and Diu School Education Act, 1986 के नियमों और Central Civil Services Leave Rules के प्रावधानों के तहत लागू की गई है। इसका लाभ सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कार्यरत नियमित शिक्षकों को मिलेगा, जो शिक्षा निदेशालय, गोवा के प्रशासनिक दायरे में आते हैं और टर्मिनल इलनेस से ग्रसित हैं।

नई पॉलिसी के अनुसार, पात्र शिक्षक 365 दिनों तक पूर्ण वेतन सहित अवकाश ले सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि इस दौरान उनकी वरिष्ठता, प्रमोशन या सेवा लाभों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अवकाश के बाद वे उसी पद और स्थिति में लौटेंगे, जहां से उन्होंने छुट्टी ली थी। साथ ही, भविष्य में मिलने वाली पेंशन पर भी इस विशेष अवकाश का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा।

हालांकि, इस सुविधा का लाभ लेने के लिए सरकारी सत्यापन अनिवार्य है। शिक्षकों को Goa Medical College द्वारा जारी मेडिकल सर्टिफिकेट और अन्य जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। यदि बीमारी की स्थिति अत्यंत गंभीर हो और एक वर्ष से अधिक अवकाश की आवश्यकता पड़े, तो सरकारी मेडिकल बोर्ड की सिफारिश और सरकार की मंजूरी के बाद छुट्टी बढ़ाई भी जा सकती है।

पॉलिसी में जिन बीमारियों को टर्मिनल इलनेस की श्रेणी में शामिल किया गया है, उनमें एडवांस्ड कैंसर, एंड स्टेज किडनी, लिवर या हार्ट फेलियर, Amyotrophic Lateral Sclerosis (ALS) और प्रोग्रेसिव न्यूरो-डिजेनेरेटिव डिसॉर्डर्स शामिल हैं। इन बीमारियों में इलाज से पूर्ण स्वस्थ होना संभव नहीं होता, लेकिन उपचार से बीमारी की गति धीमी की जा सकती है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है।

गोवा जैसे छोटे राज्य द्वारा उठाया गया यह कदम अब अन्य राज्यों में भी चर्चा का विषय बन रहा है। कई कर्मचारी संगठनों ने इसकी सराहना करते हुए अपने-अपने राज्यों में भी ऐसी नीति लागू करने की मांग उठाई है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में टर्मिनल बीमारियों के लिए लंबी अवधि की मेडिकल लीव के स्पष्ट और व्यापक नियमों की कमी है। यदि इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना हो, तो मजबूत मेडिकल वेरिफिकेशन प्रणाली, दुरुपयोग रोकने के स्पष्ट प्रावधान और वित्तीय योजना की आवश्यकता होगी।

भारत में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी कार्यरत हैं, इसलिए किसी भी राष्ट्रीय नीति के लिए फंडिंग और प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर विचार जरूरी होगा। फिर भी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी पहल कर्मचारियों को सुरक्षा का भरोसा देती है और उन्हें बिना करियर जोखिम के समय पर इलाज कराने के लिए प्रोत्साहित करती है।

Asmita Sarkar

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