
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को निर्देश दिया है कि वह कक्षा 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में इस्तेमाल की गई उत्तर-पुस्तिकाओं की खरीद, टेंडर प्रक्रिया और परीक्षा से जुड़े खर्च का विवरण सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत उपलब्ध कराए। आयोग ने कहा कि यह जानकारी बिंदुवार और स्पष्ट तरीके से सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
यह मामला उस समय सामने आया जब एक आवेदक ने RTI के माध्यम से 2023-24 और 2024-25 की CBSE बोर्ड परीक्षाओं में उपयोग की गई उत्तर-पुस्तिकाओं से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी थी। आवेदन में आंसर बुक की गुणवत्ता, पन्नों की संख्या, आकार, खरीद लागत, कुल खर्च, जीएसटी भुगतान और खरीद के लिए अपनाई गई टेंडर प्रक्रिया का पूरा विवरण शामिल था।
क्या जानकारी मांगी गई थी?
RTI आवेदन में उत्तर-पुस्तिकाओं की तकनीकी और वित्तीय दोनों तरह की जानकारी मांगी गई थी। आवेदक यह जानना चाहता था कि बोर्ड परीक्षाओं के लिए किस प्रकार की कॉपियां खरीदी गईं, उनकी गुणवत्ता क्या थी, कितनी संख्या में खरीदी गईं और उन पर कुल कितना खर्च हुआ। साथ ही टेंडर प्रक्रिया में शामिल कंपनियों और चयन प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी भी मांगी गई थी।
CBSE ने क्या जवाब दिया?
CBSE ने अपने जवाब में बताया कि बोर्ड परीक्षाओं में इस्तेमाल होने वाली उत्तर-पुस्तिकाओं का पेपर 60 GSM से 120 GSM गुणवत्ता के बीच था। इन कॉपियों में 8, 20, 32, 40 और 48 पन्नों के विकल्प शामिल थे। उत्तर-पुस्तिकाओं का आकार 22×28 सेंटीमीटर और 37.5×54.5 सेंटीमीटर था।
हालांकि, बोर्ड ने उत्तर-पुस्तिकाओं की खरीद लागत, खरीदी गई कुल संख्या और उन पर हुए कुल खर्च से संबंधित जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया। इसके लिए CBSE ने RTI अधिनियम के प्रावधानों का हवाला दिया। बोर्ड ने यह भी कहा कि उत्तर-पुस्तिकाओं के वजन से संबंधित कोई रिकॉर्ड उसके पास उपलब्ध नहीं है।
इसके अलावा, टेंडर प्रक्रिया, बोली लगाने वाली कंपनियों, उनकी दरों और विक्रेता चयन से जुड़ी जानकारी को परीक्षा से संबंधित संवेदनशील और गोपनीय बताते हुए साझा नहीं किया गया। बोर्ड का यह भी कहना था कि परीक्षा खर्च का रिकॉर्ड वित्तीय वर्ष के आधार पर रखा जाता है, इसलिए मांगी गई जानकारी उसी रूप में उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
CIC ने CBSE के तर्कों को क्यों खारिज किया?
अपीलकर्ता ने CBSE के जवाब को चुनौती देते हुए केंद्रीय सूचना आयोग का रुख किया। सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त Sudha Rani Relangi ने पाया कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) ने जानकारी देने से इनकार करने के लिए पर्याप्त और कानूनी रूप से उचित कारण प्रस्तुत नहीं किए।
आयोग ने यह भी नोट किया कि सुनवाई के दौरान CPIO उपस्थित नहीं हुए और न ही उन्होंने अपने फैसले के समर्थन में कोई लिखित स्पष्टीकरण जमा किया। इस आधार पर आयोग ने 18 मार्च 2025 को जारी किए गए CPIO के जवाब को रद्द कर दिया।
CIC ने क्या निर्देश दिए?
आयोग ने CBSE को RTI आवेदन की दोबारा समीक्षा करने और मांगी गई जानकारी पर नया एवं संशोधित जवाब देने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि सरकारी खरीद और टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए ऐसी जानकारी को अनावश्यक रूप से गोपनीय नहीं रखा जा सकता।
CIC ने कहा कि जो जानकारी RTI के तहत दी जा सकती है, उसे उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि किसी दस्तावेज में कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो RTI अधिनियम की धारा 10 के तहत उन हिस्सों को हटाकर बाकी जानकारी दी जा सकती है।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी जानकारी को RTI अधिनियम की धारा 8(1)(d) के तहत रोका जाता है, तो उसके लिए ठोस और कानूनी आधार बताना आवश्यक होगा। यह धारा व्यावसायिक गोपनीयता, व्यापारिक रहस्यों और बौद्धिक संपदा से जुड़ी जानकारी की सुरक्षा से संबंधित है।
पारदर्शिता और जनहित पर जोर
अपने आदेश में आयोग ने कहा कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि जानकारी संवेदनशील है। यदि किसी सूचना के खुलासे से किसी तीसरे पक्ष की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित होती है, तभी उसे रोका जा सकता है। वहीं, यदि व्यापक जनहित जुड़ा हो तो ऐसी जानकारी भी सार्वजनिक की जा सकती है।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि छात्रों, अभिभावकों और नागरिकों को यह जानने का अवसर भी मिलेगा कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है।
CBSE को अब आयोग के निर्देशों के अनुसार आवेदन की पुनः समीक्षा कर विस्तृत और बिंदुवार जवाब देना होगा। यह मामला भविष्य में शिक्षा संस्थानों की खरीद प्रक्रियाओं और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।




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