
भारत के सबसे पुराने उच्च शिक्षा संस्थानों में शामिल चेन्नई का ऐतिहासिक पचैयाप्पा कॉलेज अब एक बड़े बदलाव का गवाह बन गया है। करीब 184 वर्षों तक केवल पुरुष छात्रों के लिए संचालित होने के बाद यह प्रतिष्ठित संस्थान अब आधिकारिक तौर पर सह-शिक्षा (को-एजुकेशनल) कॉलेज बन गया है। तमिलनाडु सरकार की मंजूरी के बाद अब यहां छात्र और छात्राएं एक साथ पढ़ाई कर सकेंगे।
कॉलेज प्रशासन ने इस फैसले को संस्थान के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बताया है। इसके साथ ही पहली बार छात्राओं के लिए भी पचैयाप्पा कॉलेज के दरवाजे खुल गए हैं, जिससे प्रदेश में उच्च शिक्षा के अवसर और अधिक व्यापक होंगे।
तमिलनाडु सरकार ने जारी किया आदेश
कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. बेबी गुलनाज के अनुसार, तमिलनाडु सरकार ने 15 जून को जारी सरकारी आदेश (जी.ओ. नंबर 100) के माध्यम से पचैयाप्पा कॉलेज को सह-शिक्षा संस्थान के रूप में संचालित करने की मंजूरी दी है। इस आदेश के लागू होने के बाद कॉलेज में लड़के और लड़कियां दोनों प्रवेश लेकर साथ पढ़ाई कर सकेंगे।
यह निर्णय राज्य सरकार की समावेशी और समान अवसर आधारित शिक्षा नीति की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
1842 में हुई थी कॉलेज की स्थापना
पचैयाप्पा कॉलेज की स्थापना वर्ष 1842 में हुई थी। यह भारत के सबसे पुराने उच्च शिक्षा संस्थानों में गिना जाता है और लंबे समय से शैक्षणिक उत्कृष्टता, सामाजिक जिम्मेदारी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए अपनी पहचान बनाए हुए है। इस कॉलेज से हजारों छात्र देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुके हैं।
अब सह-शिक्षा व्यवस्था लागू होने के बाद संस्थान की पहचान और दायरा दोनों का विस्तार होने की उम्मीद है।
छात्राओं को मिलेंगे नए अवसर
कॉलेज प्रशासन का कहना है कि इस फैसले से छात्राओं को भी इस प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ाई का अवसर मिलेगा। साथ ही परिसर में अधिक विविध, संतुलित और समावेशी शैक्षणिक माहौल तैयार होगा, जिससे विद्यार्थियों के समग्र विकास को बढ़ावा मिलेगा।
कॉलेज ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह बदलाव समानता, समावेशी शिक्षा और समय के साथ बदलती शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुरूप संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
वर्षों के प्रयासों का मिला परिणाम
कॉलेज प्रबंधन ने बताया कि सह-शिक्षा व्यवस्था लागू करने के लिए लंबे समय से प्रयास किए जा रहे थे। सरकार की मंजूरी मिलने के बाद अब यह प्रक्रिया पूरी हो गई है। इस ऐतिहासिक फैसले का कॉलेज प्रबंधन, प्रिंसिपल, फैकल्टी, सेवानिवृत्त प्रोफेसरों, प्रशासनिक कर्मचारियों, वर्तमान छात्रों, पूर्व छात्रों और शुभचिंतकों ने स्वागत किया है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से न केवल छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के नए अवसर मिलेंगे, बल्कि संस्थान में शैक्षणिक और सामाजिक विविधता भी बढ़ेगी। यह निर्णय देश के पुराने उच्च शिक्षण संस्थानों में बदलते समय के अनुरूप हो रहे सुधारों का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।




Add comment