
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में 1975 के आपातकाल पर अलग अध्याय शामिल किए जाने को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि भारतीय लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण और विवादित दौर की जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंचना जरूरी है, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के महत्व को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान की पुस्तक ‘Understanding Society: India and Beyond’ में पहली बार आपातकाल पर अलग खंड जोड़ा गया है। पुस्तक में इस अवधि को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई प्रमुख चुनौतियों में से एक बताया गया है। इसमें उल्लेख किया गया है कि आपातकाल के दौरान कई मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
भाजपा बोली- इतिहास के इस दौर को जानना जरूरी
पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि युवाओं को देश के लोकतांत्रिक इतिहास के इस अध्याय के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि आपातकाल पर खुलकर चर्चा होगी तो उस समय लिए गए कई फैसलों और घटनाओं पर भी सवाल उठेंगे।
उन्होंने कहा कि लोग यह जानना चाहेंगे कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित कई विपक्षी नेताओं को क्यों गिरफ्तार किया गया, जबरन नसबंदी अभियान क्यों चलाया गया और उस समय लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर क्या असर पड़ा। प्रसाद का आरोप है कि कांग्रेस इन सवालों से बचना चाहती है।
शहजाद पूनावाला ने बताया लोकतंत्र का काला दौर
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादित और अंधकारमय दौर माना जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने सत्ता बनाए रखने के लिए आपातकाल लागू किया था।
पूनावाला ने कहा कि उस समय संसद, न्यायपालिका, मीडिया और अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हुई और कई मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि छात्रों को इन घटनाओं की जानकारी होना लोकतांत्रिक व्यवस्था को समझने के लिए आवश्यक है।
छात्रों को लोकतंत्र की समझ देने की पहल
भाजपा नेताओं का कहना है कि एनसीईआरटी की नई पुस्तक छात्रों को भारतीय लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दौर से परिचित कराएगी। उनका मानना है कि इतिहास की ऐसी घटनाओं का अध्ययन करने से विद्यार्थियों में संविधान, मौलिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के महत्व के प्रति बेहतर समझ विकसित होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास को याद रखने का उद्देश्य किसी राजनीतिक विवाद को बढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा पैदा न हों।
कांग्रेस की आपत्तियों पर भाजपा का जवाब
भाजपा ने कांग्रेस द्वारा इस अध्याय को लेकर जताई गई आपत्तियों पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि यदि लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की रक्षा की बात की जाती है, तो आपातकाल जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रम को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने का विरोध नहीं होना चाहिए।
भाजपा नेताओं ने यह भी याद दिलाया कि आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव सहित कई नेताओं ने इसका विरोध किया था और लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन चलाया था।
क्या था 1975 का आपातकाल?
भारत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने 25 जून 1975 को संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया था। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक प्रभावी रहा। इस अवधि में कई विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई और कई मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाए गए। इसी कारण भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह दौर सबसे अधिक चर्चित और विवादित अवधियों में गिना जाता है।
एनसीईआरटी की नई पुस्तक में इसी ऐतिहासिक घटनाक्रम और उसके लोकतांत्रिक प्रभावों को छात्रों के लिए विस्तार से शामिल किया गया है। वहीं, इस विषय को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद भी सामने आ रहे हैं, जिससे शिक्षा और इतिहास लेखन पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।




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