
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने युद्ध और सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। भारत ने स्पष्ट कहा कि स्कूलों और बच्चों को निशाना बनाने वालों को बिना किसी अपवाद के जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। भारत का मानना है कि जब तक ऐसे अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पार्वथनेनी ने सुरक्षा परिषद में ‘सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित बच्चों की शिक्षा की सुरक्षा’ विषय पर आयोजित चर्चा के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल एक बुनियादी अधिकार ही नहीं, बल्कि शांति स्थापित करने और समाज को स्थिर बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम भी है। युद्ध जैसी कठिन परिस्थितियों में भी बच्चों का शिक्षा का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए।
युद्ध प्रभावित इलाकों में बच्चों पर बढ़ा संकट
भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव की वर्ष 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया भर में संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों के खिलाफ हिंसा चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में बच्चों के खिलाफ 38,558 गंभीर उल्लंघन दर्ज किए गए, जिनसे 24,174 बच्चे प्रभावित हुए। इनमें 15,493 लड़के, 7,990 लड़कियां और 691 ऐसे बच्चे शामिल हैं जिनकी पहचान नहीं हो सकी। कई बच्चों को एक से अधिक बार हिंसा और गंभीर अपराधों का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि युद्ध में शामिल कई सशस्त्र समूहों ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का पालन नहीं किया। इसके अलावा कुछ मामलों में सरकारी सेनाओं पर भी बच्चों की हत्या, स्कूलों पर हमले और मानवीय सहायता में बाधा डालने जैसे गंभीर आरोप दर्ज किए गए हैं।
स्कूलों पर हमलों में 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी
भारत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार एक वर्ष के भीतर स्कूलों पर होने वाले हमलों में 44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति वैश्विक शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है।
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में लगभग 47.3 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां किसी न किसी रूप में सशस्त्र संघर्ष जारी है। इनमें से 8.5 करोड़ से अधिक बच्चे शिक्षा की नियमित सुविधा से वंचित हैं। भारत ने इसे केवल किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता की सामूहिक विफलता बताया।
“बच्चों की शिक्षा बचाना, भविष्य बचाने के समान”
राजदूत पार्वथनेनी ने कहा कि किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चों की शिक्षा पर निर्भर करता है। इसलिए संघर्ष के समय शिक्षा व्यवस्था को सुरक्षित रखना सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत बच्चों के अधिकारों की रक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
भारत में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था है। इसके साथ ही भारत ने DIKSHA (Digital Infrastructure for Knowledge Sharing) डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से कई भारतीय भाषाओं में डिजिटल शिक्षण सामग्री उपलब्ध करा रहा है।
संकट के समय डिजिटल शिक्षा बन सकती है सहारा
भारत ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि डिजिटल शिक्षा युद्ध और आपदा जैसी परिस्थितियों में बच्चों की पढ़ाई जारी रखने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। देश ने पड़ोसी देशों में शरणार्थी बच्चों की शिक्षा के लिए भी निवेश किया है और स्कूलों तथा प्रशिक्षण केंद्रों के विकास में सहयोग दिया है।
भारत का मानना है कि शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि संकट से उबरने, सामाजिक स्थिरता लाने और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य की सबसे मजबूत नींव है। इसी कारण भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों और स्कूलों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए तथा शिक्षा पर होने वाले हर हमले के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।




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