
श्रुति कुमार। अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली भारतीय मूल की छात्रा। श्रुति इन दिनों अपने एक वीडियो के कारण सोशल मीडिया में जमकर ट्रेंड हो रही हैं। कमेंसमेंट सेरेमनी के दौरान दी गयी उनकी स्पीच का वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। वजह, अपनी इस स्पीच में श्रुति ने इजराइल-हमास जंग को लेकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट के खिलाफ जमकर अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं। उन्हें अपनी स्पीच के लिए स्टैंडिंग ओवेशन भी मिला।
दरअसल, श्रुति ने अपनी स्पीच में 13 छात्रों को ग्रेजुएशन डिग्री रोकने के विरोध में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट की आलोचना की है। उनकी स्पीच का कमाल कि उनकी स्पीच के बाद हजार से ज्यादा छात्रों ने इस कार्यक्रम का बायकॉट कर दिया। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इजराइल-हमास जंग से इस स्पीच का कैसा सम्बन्ध? स्पीच तो 13 छात्रों के ग्रेजुएशन डिग्री रोकने के विरोध में था।
दरअसल, हाल ही में अमेरिका की कई यूनिवर्सिटीज में फिलीस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन हुए थ। हार्वर्ड में भी ऐसे प्रदर्शन बहुत देखने को मिले थे। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने कार्रवाई करते हुए 13 छात्रों को ग्रेजुएट होने से रोक दिया था। तभी इसका विरोध करते हुए श्रुति ने अपनी स्पीच में कहा, ‘मैं कैंपस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सविनय अवज्ञा के अधिकार के प्रति सहनशीलता न दिखाने से बेहद निराश हूं। ये सिविल राइट्स और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कायम रखने के बारे में है।’ इसके आगे उन्होंने जोर से चिल्लाते हुए कहा, ‘हार्वर्ड, क्या आप हमें सुन रहे हैं?’
बहरहाल, श्रुति की इस स्पीच के बाद एक हजार से ज्यादा छात्रों ने विरोध में वॉकआउट कर दिया। कई छात्रों ने फिलीस्तीनी झंडे और बैनर भी दिखाए, जिनमें ‘नरसंहार को खत्म’ करने की मांग की गई थी। श्रुति को अपने मुखर अंदाज के लिए हार्वर्ड के बाहर दूसरे कॉलेज और यूनिवर्सिटीज से भी समर्थन मिल रहा है। जैसे जैसे उनका यह वीडियो वायरल हो रहा है, वह दुनिया भर में पहचानी जाने लगी है।
श्रुति अपने परिवार से पहली महिला हैं, जो किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही हैं। उनका बचपन नेब्रास्का के एक फार्म और खेतों के आसपास बीता है। नेब्रास्का से हार्वर्ड तक का सफर उन्होंने खुद अपनी मेहनत से तय किया।
श्रुति कहती हैं कि 2023 में इजरायल-हमास की जंग के बाद हार्वर्ड कैम्पस बंटा हुआ था और इससे पूरे कैम्पस में अनिश्चितता और अशांति थी। वो कहती हैं कि क्या हम उन लोगों में मानवता देख सकते हैं, जिन्हें हम नहीं जानते? क्या हम उन लोगों का दर्द महसूस कर सकते हैं जिनसे हम सहमत नहीं हैं?




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