
भारत के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता और अकादमिक ईमानदारी को लेकर एक नई रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। देश के NIRF (National Institutional Ranking Framework) की टॉप-100 रैंकिंग वाले विश्वविद्यालयों के शोध कार्यों के विश्लेषण में पाया गया है कि आठ संस्थानों के वर्तमान कुलपतियों (Vice Chancellors) और निदेशकों (Directors) से जुड़े कई शोध पत्र वापस (Retraction) लिए गए हैं। इनमें छह सरकारी और दो निजी संस्थान शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन शोध पत्रों को वापस लेने के पीछे छवियों में हेरफेर (Image Manipulation), AI-जनित सामग्री, साहित्यिक चोरी (Plagiarism), संदिग्ध पीयर रिव्यू प्रक्रिया और शोध सामग्री की पुनरावृत्ति (Duplication) जैसे कारण बताए गए हैं।
यह विश्लेषण Author Trends Database के आंकड़ों और Research Watch Database के मैन्युअल सत्यापन के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें केवल उन मामलों को शामिल किया गया है जहां शोध पत्रों की वापसी कथित शोध अनियमितताओं से जुड़ी थी, न कि सामान्य मानवीय त्रुटियों से।
तमिलनाडु के एक राज्य विश्वविद्यालय में सबसे अधिक मामले
रिपोर्ट में बताया गया है कि तमिलनाडु के एक प्रमुख राज्य विश्वविद्यालय में कुल नौ शोध पत्र वापस लिए गए हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में छवियों में कथित हेरफेर की बात सामने आई है।
दिलचस्प बात यह है कि इन रिट्रैक्शन में से अधिकांश उस समय हुए जब संबंधित व्यक्ति कुलपति के पद पर कार्यरत थे। इसी अवधि में विश्वविद्यालय की NIRF रैंकिंग में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। कुछ मामलों में रिट्रैक्शन नोटिस में यह भी दर्ज है कि संबंधित लेखकों, जिनमें कुलपति भी शामिल थे, ने शोध पत्र वापस लेने के फैसले से असहमति जताई थी।
निजी विश्वविद्यालय में AI-जनित सामग्री पर कार्रवाई
महाराष्ट्र के एक निजी विश्वविद्यालय में दो शोध पत्रों को वापस लिया गया। समीक्षा करने वाले विशेषज्ञों ने इनमें AI-जनित सामग्री और तथाकथित “Tortured Phrases” की पहचान की। यह शब्द आमतौर पर उन शोध पत्रों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो तथाकथित “पेपर मिल” के जरिए तैयार किए जाते हैं।
रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के आंतरिक कामकाज से परिचित सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि वहां शोधकर्ताओं को हर वर्ष कम से कम चार शोध पत्र प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
IIT और AIIMS जैसे संस्थानों का भी नाम
रिपोर्ट में दो IIT और एक AIIMS सहित छह अन्य संस्थानों का भी उल्लेख किया गया है। इन मामलों में संबंधित संस्थानों के निदेशक या कार्यकारी निदेशक से जुड़े शोध पत्रों को संभावित साहित्यिक चोरी, संदिग्ध पीयर रिव्यू, सामग्री की पुनरावृत्ति और अन्य शोध अनियमितताओं के कारण वापस लिया गया।
वैश्विक स्तर पर शोध अनियमितताओं के कारण रिट्रैक्शन के मामलों में भारत का स्थान आठवां बताया गया है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति 10,000 शोध दस्तावेजों पर लगभग 22.5 रिट्रैक्शन दर्ज किए जाते हैं। यह संख्या पाकिस्तान, सऊदी अरब और नाइजीरिया जैसे कुछ देशों से कम है, लेकिन फिर भी शोध गुणवत्ता को लेकर चिंता का विषय बनी हुई है।
अधिकांश लोग नहीं चाहते विवादित रिकॉर्ड वाले कुलपति
हाल ही में Indian Research Watch (IRW) द्वारा LinkedIn पर कराए गए एक सर्वेक्षण में करीब 200 लोगों ने भाग लिया। सर्वेक्षण के अनुसार, 83 प्रतिशत प्रतिभागियों का मानना है कि जिन व्यक्तियों के नाम शोध अनियमितताओं से जुड़े रिट्रैक्शन मामलों में आए हैं, उन्हें कुलपति या निदेशक जैसे शीर्ष शैक्षणिक पदों पर नहीं रहना चाहिए।
वहीं 11 प्रतिशत प्रतिभागियों ने माना कि चूंकि ये पद मुख्य रूप से प्रशासनिक होते हैं, इसलिए ऐसे मामलों का ज्यादा महत्व नहीं होना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित विश्वविद्यालयों से उनकी प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक अधिकांश संस्थानों की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला था।
“रैंकिंग की दौड़ से बढ़ सकता है दबाव”
- Ramgopal Rao, जो वर्तमान में BITS Pilani के ग्रुप वाइस चांसलर और IIT दिल्ली के पूर्व निदेशक रह चुके हैं, का कहना है कि जब संस्थान प्रकाशनों, उद्धरणों (Citations) और पेटेंट की संख्या को ही सफलता का मुख्य पैमाना बना लेते हैं, तब मूल उद्देश्य पीछे छूट सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि हर रिट्रैक्शन को स्वतः धोखाधड़ी का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी मामले में निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच के बाद ही जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
उनके अनुसार, किसी समस्या को छिपाने या पद के प्रभाव के कारण जांच में देरी करने से संस्थान की प्रतिष्ठा को अधिक नुकसान पहुंचता है।
“रैंकिंग सिस्टम भी जिम्मेदार”
- C. Lakhotia, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित प्रोफेसर और पूर्व SERB Distinguished Fellow रहे हैं, का मानना है कि भारत में बढ़ती शोध अनियमितताओं के पीछे रैंकिंग आधारित प्रतिस्पर्धा भी एक बड़ा कारण है।
उन्होंने कहा कि लगातार अधिक शोध पत्र प्रकाशित करने के दबाव ने ऐसे जर्नलों और तथाकथित “पेपर मिल” नेटवर्क को बढ़ावा दिया है जो शोध गुणवत्ता से अधिक संख्या पर जोर देते हैं। उनका सुझाव है कि रैंकिंग एजेंसियों को रिट्रैक्शन और अनैतिक सहयोगों पर कड़ी सजा देनी चाहिए।
शीर्ष स्तर पर जवाबदेही की मांग
Achal Agrawal का कहना है कि शैक्षणिक संस्थानों के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों का रिकॉर्ड साफ-सुथरा होना चाहिए ताकि वे शोध ईमानदारी को प्रभावी ढंग से लागू कर सकें।
उन्होंने कहा कि कई मामलों में शोध छात्र और जूनियर शोधकर्ता जिम्मेदारी उठाते हैं, जबकि निर्णय लेने वाले वरिष्ठ अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। उन्होंने अमेरिका के कुछ प्रमुख विश्वविद्यालयों का उदाहरण देते हुए कहा कि शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही सुनिश्चित करना भारत की वैश्विक शैक्षणिक प्रतिष्ठा को मजबूत कर सकता है।
रिपोर्ट ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में केवल शोध की संख्या नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और नैतिक मानकों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। शोध विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को वैश्विक शोध महाशक्ति बनने के लिए अकादमिक ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।




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