
भारत विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। खासकर लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अतिरिक्त सीटों की व्यवस्था समेत कई पहल की गई हैं। लेकिन दूसरी ओर देश के सरकारी स्कूलों में विज्ञान शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।
संसद में केंद्र सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि देश के लगभग आधे सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में आज भी साइंस लैब उपलब्ध नहीं है। ऐसे में विज्ञान शिक्षा को व्यावहारिक और प्रयोग आधारित बनाने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
संसद में सरकार ने क्या जानकारी दी?
केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने संसद में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सरकारी सेकेंडरी स्कूलों के बुनियादी ढांचे से जुड़े आंकड़े साझा किए। उनके अनुसार शैक्षणिक सत्र 2025-26 में देश के केवल 50.1 प्रतिशत सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में साइंस लैब उपलब्ध है। इसका सीधा अर्थ यह है कि करीब 49.9 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशाला की सुविधा नहीं है।
पिछले वर्षों के आंकड़े भी बहुत अधिक सुधार नहीं दिखाते। शैक्षणिक सत्र 2023-24 में 50.2 प्रतिशत सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में साइंस लैब थी, जबकि 2024-25 में यह आंकड़ा 50.7 प्रतिशत रहा। इसके बाद 2025-26 में यह मामूली गिरावट के साथ 50.1 प्रतिशत पर पहुंच गया।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि देशभर में विज्ञान शिक्षा के विस्तार की चर्चा के बावजूद स्कूल स्तर पर प्रयोगशालाओं की उपलब्धता लगभग स्थिर बनी हुई है।
राजस्थान और बिहार सबसे पीछे
संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में साइंस लैब की उपलब्धता के मामले में राजस्थान और बिहार सबसे निचले पायदान पर हैं।
शैक्षणिक सत्र 2025-26 में राजस्थान के केवल 20.9 प्रतिशत सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में साइंस लैब दर्ज की गई। इसका मतलब है कि राज्य के लगभग 79 प्रतिशत स्कूलों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।
बिहार की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। यहां केवल 22.9 प्रतिशत सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में साइंस लैब मौजूद है। इसके बाद गुजरात का स्थान आता है, जहां 29.2 प्रतिशत स्कूलों में प्रयोगशाला की सुविधा दर्ज की गई। पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 29.6 प्रतिशत रहा।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विज्ञान विषय की प्रभावी पढ़ाई के लिए केवल पाठ्यपुस्तकें पर्याप्त नहीं होतीं। प्रयोगशालाएं छात्रों को सिद्धांतों को समझने और वैज्ञानिक सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
दिल्ली ने किया बेहतर प्रदर्शन
जहां कई राज्य साइंस लैब की उपलब्धता को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दिल्ली इस मामले में सबसे आगे दिखाई देती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2025-26 में दिल्ली के 99.6 प्रतिशत सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में साइंस लैब उपलब्ध है।
दिल्ली के बाद गोवा दूसरे स्थान पर है, जहां 89.4 प्रतिशत स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशालाएं हैं। पंजाब तीसरे स्थान पर है और यहां 82.8 प्रतिशत सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में साइंस लैब की सुविधा उपलब्ध है।
इन राज्यों का प्रदर्शन यह दिखाता है कि यदि बुनियादी शिक्षा ढांचे पर लगातार निवेश और निगरानी की जाए तो स्कूल स्तर पर विज्ञान शिक्षा को मजबूत बनाया जा सकता है।
STEM शिक्षा के लक्ष्य पर असर
भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देना राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कौशल विकास से जुड़े प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है। सरकार विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अधिक छात्रों, विशेषकर लड़कियों, की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रही है। हालांकि स्कूल स्तर पर प्रयोगशालाओं की कमी इस लक्ष्य को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि छात्रों को शुरुआती स्तर पर प्रयोग आधारित विज्ञान शिक्षा नहीं मिलेगी तो उच्च शिक्षा में विज्ञान और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में उनकी रुचि और तैयारी दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
संसद में सामने आए आंकड़े यह संकेत देते हैं कि STEM शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए केवल उच्च शिक्षण संस्थानों में अवसर बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्कूल स्तर पर साइंस लैब, उपकरण और प्रशिक्षित शिक्षकों जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी प्राथमिकता देनी होगी, ताकि देशभर के छात्रों को समान गुणवत्ता वाली विज्ञान शिक्षा मिल सके।




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