
देशभर के स्कूलों में एक समान सिलेबस लागू करने को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। इसकी वजह हाल ही में सामने आई वह सिफारिश है, जिसमें मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए NEET UG और JEE के साथ 12वीं के अंकों को भी महत्व देने का सुझाव दिया गया है। इसके बाद यह सवाल उठने लगा है कि जब अलग-अलग शिक्षा बोर्डों का पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली अलग है, तो समान अवसर कैसे सुनिश्चित किए जाएंगे।
इसी संदर्भ में केंद्र सरकार सभी शिक्षा बोर्डों के लिए समान शैक्षणिक मानक विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अब तक पूरे देश में “एक राष्ट्र-एक सिलेबस” लागू करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। सरकार और शिक्षा मंत्रालय की ओर से समान शैक्षणिक गुणवत्ता, सीखने के परिणाम और मूल्यांकन प्रणाली को बेहतर बनाने पर चर्चा जरूर चल रही है।
क्यों फिर चर्चा में आया एक समान सिलेबस?
हाल ही में शिक्षा मंत्रालय की ओर से गठित एक विशेषज्ञ समिति ने मेडिकल और इंजीनियरिंग में प्रवेश प्रक्रिया को लेकर कई सुझाव दिए हैं। इनमें NEET और JEE के अंकों के साथ कक्षा 12 के अंकों को भी वेटेज देने का प्रस्ताव शामिल बताया गया है। इस तरह के सुझावों ने अलग-अलग बोर्डों की परीक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम में मौजूद अंतर को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।
हालांकि, इन सिफारिशों पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और सरकार ने इन्हें लागू करने की आधिकारिक घोषणा भी नहीं की है।
देश में कितने शिक्षा बोर्ड हैं?
वर्तमान में भारत में 66 से अधिक स्कूल शिक्षा बोर्ड संचालित हैं। इनमें केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE), काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (CISCE) और विभिन्न राज्यों के बोर्ड शामिल हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल और अन्य राज्यों के बोर्ड प्रमुख हैं।
हर वर्ष करोड़ों छात्र इन बोर्डों के माध्यम से 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं देते हैं। लेकिन प्रत्येक बोर्ड का पाठ्यक्रम, परीक्षा पैटर्न, मूल्यांकन प्रणाली और अंक देने का तरीका अलग-अलग होने के कारण छात्रों के बीच समानता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
अलग-अलग बोर्ड होने से क्या दिक्कतें आती हैं?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग बोर्डों के कारण छात्रों की तैयारी, परीक्षा का स्तर और मूल्यांकन में अंतर देखने को मिलता है। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षा के अंकों को एक साथ जोड़ने की स्थिति में निष्पक्षता सुनिश्चित करना आसान नहीं होता।
यदि भविष्य में 12वीं के अंकों को मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश में अधिक महत्व दिया जाता है, तो विभिन्न बोर्डों के बीच मूल्यांकन के अंतर को कम करना जरूरी होगा।
2017 में भी हुई थी ऐसी कोशिश
देशभर में समान शैक्षणिक व्यवस्था लागू करने की कोशिश नई नहीं है। वर्ष 2017 में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (CABE) की बैठक में विभिन्न शिक्षा बोर्डों के बीच अधिक समानता लाने का प्रस्ताव रखा गया था।
उस समय कई राज्य सरकारों ने इसे स्वीकार नहीं किया। हालांकि, बोर्ड परीक्षाओं के अंकों में समानता बनाए रखने के लिए मॉडरेशन पॉलिसी अपनाने पर सहमति बनी थी। इसके बावजूद सभी राज्यों ने इसे समान रूप से लागू नहीं किया।
क्या होगा ‘वन नेशन, वन सिलेबस’ मॉडल?
शिक्षा क्षेत्र में चल रही चर्चाओं के अनुसार, भविष्य में NCERT के पाठ्यक्रम और PARAKH (Performance Assessment, Review and Analysis of Knowledge for Holistic Development) जैसे राष्ट्रीय मूल्यांकन ढांचे के आधार पर शिक्षा बोर्डों में अधिक समानता लाने की दिशा में काम किया जा सकता है।
यहां यह समझना जरूरी है कि PARAKH का उद्देश्य सभी बोर्डों में मूल्यांकन की गुणवत्ता और मानकों को बेहतर बनाना है, न कि सीधे सभी राज्यों का सिलेबस पूरी तरह एक जैसा करना। इसलिए फिलहाल “वन नेशन, वन सिलेबस” को लागू करने की कोई औपचारिक नीति घोषित नहीं हुई है।
क्या बदल सकती है मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश प्रक्रिया?
NEET और JEE में संभावित सुधारों को लेकर कई सुझाव सामने आए हैं। इनमें प्रवेश प्रक्रिया में केवल प्रवेश परीक्षा पर निर्भरता कम करने और बोर्ड परीक्षा के अंकों को भी महत्व देने की बात शामिल है।
हालांकि, इस संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर कोई अंतिम नीति लागू नहीं हुई है। भविष्य में यदि ऐसा कोई बदलाव होता है, तो सरकार को विभिन्न शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली और मूल्यांकन में संतुलन बनाने के लिए व्यापक सुधार करने होंगे।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देशभर में समान शैक्षणिक मानक विकसित किए जाते हैं, तो छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं में अधिक समान अवसर मिल सकते हैं। वहीं राज्यों की भाषाई, सांस्कृतिक और शैक्षणिक विविधता को ध्यान में रखते हुए किसी भी बड़े बदलाव के लिए सभी राज्यों और शिक्षा बोर्डों की सहमति भी जरूरी होगी।
फिलहाल केंद्र सरकार की प्राथमिकता शिक्षा की गुणवत्ता, सीखने के परिणाम और मूल्यांकन प्रणाली में सुधार लाने की है। आने वाले महीनों में यदि इस दिशा में कोई आधिकारिक फैसला लिया जाता है, तो उसका असर देश की स्कूल शिक्षा व्यवस्था और उच्च शिक्षा में प्रवेश प्रक्रिया दोनों पर पड़ सकता है।




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