
बिहार लोक सेवा आयोग की 70वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में नॉर्मलाइजेशन के खिलाफ अभ्यार्थियों ने शुक्रवार को बीपीएससी दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन कर रहे छात्र मांग कर रहे हैं कि 13 दिसंबर को होने वाली परीक्षा से नॉर्मलाइजेशन को हटाया जाए। इससे पहले उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में भी छात्रों ने नॉर्मलाइजेशन के खिलाफ प्रदर्शन किया था। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर यह नॉर्मलाइजेशन है क्या जिसके खिलाफ स्टूडेंट्स सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
दरअसल, जब परीक्षा में नॉर्मलाइजेशन की बात होती है तो इसका सीधा मतलब यही होता है कि किसी परीक्षा को एक से ज्यादा दिन और एक से ज्यादा शिफ्ट में आयोजित कराया जाता है। यानी जब कैंडिडेट्स की संख्या को देखते हुए परीक्षा दो शिफ्ट में या फिर एक से ज्यादा दिन में आयोजित कराई जाती है उसे नॉर्मलाइजेशन कहते हैं। इस दौरान हर एग्जाम में अलग-अलग क्वेश्चन पेपर के सेट होते हैं।
अगर पहली परीक्षा में कैंडिडेट्स के औसत नंबर कम आते हैं या अटैम्प भी कम रहा हो तो ऐसे पेपर मुश्किल माने जाते हैं। इसमें परीक्षार्थियों का औसत नंबर भी कम हो जाता है। अगर दूसरी शिफ्ट में कैंडिडेट्स के औसत नंबर ज्यादा आए या अटैंप्ट ज्यादा रहा हो तो ऐसे पेपर आसान माने जाते हैं। इसमें परीक्षार्थियों का औसत नंबर ज्यादा हो जाता है जबकि फाइनल रिजल्ट इनके औसत नंबर पर आएगा।
कह सकते हैं कि नॉर्मलाइजेशन एक प्रक्रिया है जिसके तहत एक से अधिक पालियों में आयोजित परीक्षाओं के अंकों को सामान्य बनाया जाता है। जब अलग-अलग पालियों में प्रश्नपत्र का कठिनाई स्तर अलग-अलग होता है, तो नॉर्मलाइजेशन के माध्यम से अंकों को संतुलित किया जाता है। उदाहरण के लिए, अगर पहली पाली में प्रश्नपत्र अपेक्षाकृत आसान है और औसत स्कोर 140 है, जबकि दूसरी पाली में कठिन प्रश्नपत्र के कारण औसत स्कोर 120 है, तो दोनों का औसत निकालकर 130 कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया सभी अभ्यर्थियों के अंकों को एक समान मापदंड पर लाने का प्रयास करती है। लेकिन ऐसे में दूसरे दिन की परीक्षा दिए अभ्यर्थियों का कुछ नंबर बढ़ जाता है जबकि पहले दिन परीक्षा दिए अभ्यर्थियों का नंबर घट जाता है। इसी कारण नॉर्मलाइजेशन को लेकर अभ्यर्थी विरोध कर रहे हैं।
छात्रों का तर्क है कि नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया सिविल सेवा जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उचित नहीं है। इस प्रकार की परीक्षाओं में एक अंक भी चयन और असफलता के बीच अंतर पैदा कर सकता है। औसत अंक की गणना से कई मेधावी अभ्यर्थियों का नुकसान हो सकता है। छात्रों का कहना है कि औसत अंक पद्धति उन परीक्षाओं के लिए उपयुक्त हो सकती है जहां अंकों का महत्व सीमित होता है, लेकिन सिविल सेवा जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में यह प्रक्रिया न्यायसंगत नहीं है। उनका कहना है कि नॉर्मलाइजेशन से अंकों का वास्तविक मूल्यांकन संभव नहीं हो पाता और परिणाम में असमानता आ सकती है।
बिहार और यूपी लोक सेवा आयोग से पहले कर्मचारी चयन आयोग (SSC), पुलिस भर्ती परीक्षा, रेलवे भर्ती बोर्ड, एनटीए समेत कई परीक्षाओं को एक से ज्यादा पालियों में कराया जाता है जिसके बाद उनके अंकों को नॉर्मलाइजेशन किया जाता है। हालांकि बिहार लोक सेवा आयोग नॉर्मलाइजेशन को लेकर क्या नियम अपनाएगा, ये अभी तय नहीं है लेकिन सामान्य तौर पर इन्हीं नियमों को अपनाया जा सकता है। हालांकि आयोग ने इसे लागू न करने की घोषणा की है, फिर भी अभ्यर्थी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भविष्य में भी इस तरह की प्रक्रिया से बचा जाए।




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