
जब उनके पिता ने पहले जन्मदिन पर एक टेडी चिंपांजी भेंट किया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटा-सा तोहफा उनकी पूरी जिंदगी की दिशा तय कर देगा। वही बच्ची आगे चलकर दुनिया की सबसे प्रसिद्ध प्राइमेटोलॉजिस्ट बनीं—डॉ. जेन गूडाल, जिन्हें प्रेम से “चिंपांजी लेडी” कहा जाता है। हाल ही में 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन उन्होंने अपने सात दशक चिंपांजियों और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित कर दिए।
बचपन से जानवरों के प्रति लगाव
3 अप्रैल 1934 को लंदन में जन्मीं वैलेरी जेन मॉरिस गूडाल के पिता मोर्टिमर हर्बर्ट मॉरिस गूडाल इंजीनियर और बिजनेसमैन थे, जबकि मां मार्गरेट मायफैनवे जोसेफ लेखिका थीं। उनके पिता ने जन्मदिन पर जो खिलौना चिंपांजी ‘जुबली’ दिया था, वह गूडाल के जीवन का प्रतीक बन गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद माता-पिता के अलग हो जाने पर जेन अपनी मां के साथ रहीं। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने औपचारिक पढ़ाई छोड़ दी, लेकिन प्रकृति और जानवरों के प्रति उनका लगाव लगातार बढ़ता गया।
अफ्रीका से शुरू हुआ सफर
सेक्रेटेरियल कोर्स पूरा करने के बाद जेन को 1956 में अपने एक दोस्त का निमंत्रण मिला, जो केन्या में रहता था। 23वें जन्मदिन पर उन्होंने लंदन छोड़कर नैरोबी का रुख किया और यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।
1960 में वे तंजानिया के गोम्बे स्ट्रीम गेम रिजर्व (अब राष्ट्रीय उद्यान) पहुंचीं, जहां उन्होंने चिंपांजियों के व्यवहार पर गहन अध्ययन शुरू किया। यहीं उनकी मुलाकात प्रसिद्ध वन्यजीव फोटोग्राफर बैरन ह्यूगो वैन लॉविक से हुई, जिनसे उन्होंने विवाह किया। बाद में उनका तलाक हुआ और फिर उन्होंने तंजानिया के सांसद व पर्यावरणविद् डेरेक ब्राइसन से शादी की, जिनका 1980 में निधन हो गया।
चिंपांजियों की भाषा समझीं
जेन गूडाल ने चिंपांजियों से जुड़ने के लिए उनकी आवाज़ “पैंट-हूट” बोलना सीखा और उनके बीच महीनों तक रहीं। औपचारिक शिक्षा के अभाव के बावजूद उन्हें कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से 1965 में इथोलॉजी में पीएचडी की उपाधि मिली।
1977 में उन्होंने जेन गूडाल इंस्टीट्यूट की स्थापना की और 1991 में बच्चों व युवाओं के लिए “रूट्स एंड शूट्स” कार्यक्रम शुरू किया, जो आज 120 से अधिक देशों में सक्रिय है।
लेखन और सिनेमा
गूडाल के जीवन पर 40 से अधिक फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बनीं। उन्होंने 32 किताबें लिखीं, जिनमें से 15 बच्चों के लिए थीं।
उनकी चर्चित पुस्तकों में “इन द शैडो ऑफ मैन”, “थ्रू अ विंडो” और “माय फ्रेंड्स, द वाइल्ड चिंपांजीज” शामिल हैं।
उनकी अंतिम कृति “द बुक ऑफ होप: ए सर्वाइवल गाइड फॉर ट्राइंग टाइम्स” मानवता के प्रति उनके आशावादी दृष्टिकोण को दर्शाती है। निधन से पहले उन्होंने जीवविज्ञानी मार्क बेकॉफ के साथ बच्चों की किताब “एवरी एलीफेंट हैज ए नेम” लिखी थी, जो 2027 में प्रकाशित होगी।
पर्यावरण और मानवीयता की आवाज
डॉ. गूडाल अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक सक्रिय रहीं। वह साल के लगभग 300 दिन यात्राओं और व्याख्यानों में बिताती थीं।
2002 में संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें शांति दूत नियुक्त किया। उन्हें अमेरिका का प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम, डीवीएफ लाइफटाइम अवॉर्ड, और ब्रिटिश एम्पायर की डेम कमांडर जैसे अनेक सम्मान मिले।
2022 में बार्बी कंपनी ने उनकी प्रेरणा में “जेन गूडाल डॉल” लॉन्च की।
चिंपांजियों को दिया नया दर्जा
गूडाल पहली महिला वैज्ञानिक थीं जिन्होंने बताया कि चिंपांजी न केवल उपकरणों का उपयोग कर सकते हैं, बल्कि उनमें भावनाएं, परिवार और समाज की समझ भी होती है। उन्होंने कहा था, “अगर चिंपांजी इंसान होते, तो हम उन्हें दोस्त कहते।”
बेबाक विचारों वाली वैज्ञानिक
2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप की तुलना नर चिंपांजी से की थी और बाद में भी अपने बयान पर कायम रहीं।
उनकी साफगोई और ईमानदारी ने उन्हें वैज्ञानिक समुदाय से आगे बढ़कर जनता की आवाज बना दिया।
जेन गूडाल का जीवन यह याद दिलाता है कि समर्पण, जिज्ञासा और करुणा से इंसान न केवल प्रकृति को समझ सकता है, बल्कि उसे बचाने का मार्ग भी दिखा सकता है।




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