
क्यूएस सस्टेनेबिलिटी रैंकिंग 2026 के ताज़ा नतीजे हमारे सामने हैं—और इनके साथ एक असहज सच भी। 103 भारतीय संस्थानों के शामिल होने के बावजूद, देश का एक भी विश्वविद्यालय शीर्ष 200 की सूची में स्थान नहीं बना पाया। यह आंकड़ा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम उच्च शिक्षा में तेजी से आगे बढ़ते हुए भी उस दिशा में पीछे छूट रहे हैं, जो आने वाले विश्व की सबसे अहम जरूरत बनने जा रही है—सस्टेनेबिलिटी।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली भले ही भारत का सर्वोच्च रैंक वाला संस्थान बना रहा, लेकिन इसका 171 से 205 तक खिसकना यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कितनी तेज हो चुकी है। IIT बॉम्बे और IIT खड़गपुर जैसे संस्थानों की रैंक में गिरावट भी यही संकेत देती है। देश के प्रमुख संस्थान जब सस्टेनेबिलिटी जैसे महत्वपूर्ण पैमाने पर कदमताल करने में संघर्ष कर रहे हों, तो यह मुद्दा केवल रैंकिंग तक सीमित नहीं रह जाता—यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की दिशा पर सवाल खड़ा करता है।
यह सच है कि भारत की उपस्थिति व्यापक है। 103 संस्थानों का शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि देश की उच्च शिक्षा प्रणाली सस्टेनेबिलिटी के महत्व को समझने लगी है। कई संस्थानों ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया है, और कई पहली बार इस सूची का हिस्सा बने हैं। लेकिन जब शीर्ष प्रदर्शन पर नजर डालते हैं, तो भारत की तस्वीर धुंधली दिखने लगती है।
दरअसल, समस्या रैंकिंग में कम और तैयारी में अधिक है। सस्टेनेबिलिटी केवल पर्यावरण-मित्र कैंपस बनाने का मामला नहीं है। यह सामाजिक प्रभाव, प्रशासनिक पारदर्शिता, ऊर्जा उपयोग, छात्रों के कल्याण, शोध की दिशा और संस्थागत नीतियों का पूरा ढांचा अपने भीतर समेटे हुए है। वैश्विक विश्वविद्यालय इन क्षेत्रों में तेज़ी से निवेश और सुधार कर रहे हैं। कई भारतीय संस्थान, खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के, अब भी इस अपनाने की गति में पीछे हैं।
आईआईटी दिल्ली का उदाहरण महत्वपूर्ण है—स्कोर बढ़ने के बावजूद रैंक गिर गई। इसका मतलब साफ है कि दुनिया तेज़ी से बदल रही है, और केवल “सुधार” काफी नहीं है; तेजी से, व्यवस्थित और डेटा-आधारित सुधार ही प्रतिस्पर्धा में टिक पाएंगे।
इसके बावजूद तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, IIT रुड़की, शूलिनी यूनिवर्सिटी, LPU, BHU, पंजाब यूनिवर्सिटी और NIT राउरकेला जैसे संस्थानों का शीर्ष 700 में आना दिखाता है कि कई विश्वविद्यालय इस दिशा में गंभीर प्रयास कर रहे हैं। निजी संस्थानों का बढ़ता योगदान भी यह बताता है कि सस्टेनेबिलिटी अब सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक प्रतिस्पर्धी प्राथमिकता बन चुकी है।
भारतीय विश्वविद्यालयों के लिए यह समय है कि वे सस्टेनेबिलिटी को अतिरिक्त एक्टिविटी न समझकर अपनी नीतियों का केंद्रीय हिस्सा बनाएं। ऊर्जा और पर्यावरणीय प्रबंधन को मजबूत करना, सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े कार्यक्रम बढ़ाना, गवर्नेंस में पारदर्शिता लाना, और सबसे अहम—डेटा रिपोर्टिंग और शोध गुणवत्ता को बेहतर बनाना, इन कदमों की अब अनदेखी नहीं की जा सकती।
भारत के पास वैश्विक शिक्षा में नेतृत्व संभालने की क्षमता है। हमारे संस्थान विज्ञान, इंजीनियरिंग और शोध के क्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं। लेकिन आने वाले समय में प्रतिष्ठा केवल तकनीकी श्रेष्ठता से नहीं, बल्कि दुनिया को अधिक टिकाऊ, न्यायसंगत और जिम्मेदार बनाने में योगदान से तय होगी।
सस्टेनेबिलिटी रैंकिंग 2026 एक चेतावनी जरूर है, पर साथ ही एक अवसर भी—कि भारत चाहे तो आने वाले वर्षों में इस सूची के शीर्ष पर जगह बना सकता है। जरूरत केवल स्पष्ट दृष्टि, सही निवेश और सस्टेनेबिलिटी को भविष्य की शिक्षा का केन्द्र बनाने की है।
क्योंकि उच्च शिक्षा का वास्तविक मूल्य सिर्फ डिग्री देने में नहीं, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील नागरिक तैयार करने में है—और यही वह दिशा है जिसमें भारत को अब निर्णायक कद




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