
– रईस अहमद ‘लाली’
पिछले दस वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा भाषाओं के विकास पर किए गए खर्च का डेटा साफ़ तौर पर एक असमान तस्वीर पेश करता है। जहां संस्कृत को लगभग ₹2,500 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम फंडिंग मिली, वहीं तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया जैसी अन्य शास्त्रीय भाषाएँ मिलकर भी ₹150 करोड़ से कम पर सिमट गईं। हिंदी, उर्दू और सिंधी को संयुक्त रूप से लगभग ₹1,300 करोड़ मिले, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा उर्दू के खाते में गया।
यह बजट वितरण न सिर्फ भाषाई विविधता के सिद्धांत पर सवाल खड़े करता है, बल्कि “समान अवसर” की उस सरकारी नीति पर भी, जिसे भारत अपनी बहुभाषी पहचान की नींव मानता है।
संस्कृत के पक्ष में बजट- लेकिन क्यों इतना बड़ा अंतर?
निस्संदेह संस्कृत भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और दार्शनिक परंपरा की मूल भाषा है। इसके विकास और संरक्षण पर धन खर्च किया जाना उचित है। परंतु सवाल यह है कि क्या यह खर्च अन्य भाषाओं के मुकाबले इतना असमान होना चाहिए?
दक्षिण भारतीय भाषाएँ—तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और ओडिया—भी उतनी ही प्राचीन, साहित्यिक रूप से समृद्ध और सांस्कृतिक विरासत की वाहक हैं। तमिल दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषाओं में से एक है और उसे “क्लासिकल लैंग्वेज” का दर्जा सबसे पहले मिला था। बावजूद इसके, इस भाषा की कुल फंडिंग ₹113 करोड़ के आसपास है—संस्कृत के मुकाबले बेहद कम।
क्या बजट वितरण राजनीतिक है?
भाषाओं पर खर्च का यह असंतुलन महज़ संयोग नहीं माना जा सकता। यह नीति निर्माण में प्राथमिकताओं को दर्शाता है। संस्कृत को मिल रहे disproportionate फंडिंग से यह संदेश जाता है कि केंद्र सरकार कुछ भाषाओं को विशेष महत्व दे रही है, जबकि अन्य ऐतिहासिक भाषाएँ, विशेषकर दक्षिण की, हाशिये पर धकेली जा रही हैं। इससे क्षेत्रीय असंतोष भी बढ़ सकता है और संघीय ढाँचा कमजोर पड़ सकता है।
हिंदी और उर्दू: अलग कहानी
हिंदी और उर्दू पर कुल मिलाकर अच्छा खासा बजट खर्च किया गया— उर्दू को सबसे ज़्यादा लगभग ₹838 करोड़, हिंदी को लगभग ₹427 करोड़, सिंधी को लगभग ₹53 करोड़। यह दिखाता है कि सरकार ने आधुनिक भारतीय भाषाओं पर भी निवेश किया, परंतु यहाँ भी असमानता साफ़ दिखती है।
क्या बदलने की जरूरत है?
भारत की भाषाई विविधता उसकी ताकत है। ऐसी स्थिति में किसी एक भाषा को अत्यधिक प्राथमिकता देना और दूसरों को कमतर आंकना बुद्धिमानी नहीं है। आवश्यक है कि:
- क्लासिकल भाषाओं के लिए फंडिंग समान रूप से तय की जाए।
- भाषा अकादमियों और अनुसंधान संस्थानों को उनकी ज़रूरत और कार्य की गुणवत्ता के आधार पर बजट दिया जाए।
- दक्षिण और पूर्वोत्तर की भाषाओं को भी उचित महत्व मिले।
- डेटा और बजट दोनों को पारदर्शी बनाया जाए ताकि नागरिक जान सकें कि उनका पैसा किस दिशा में जा रहा है।
एक लोकतांत्रिक, विविध और बहुभाषी देश में भाषा बजट वैसा ही होना चाहिए—संतुलित, निष्पक्ष और समावेशी। संस्कृत का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन अन्य भाषाएँ भी भारत की आत्मा हैं। यदि भारत को “बहुभाषी महाशक्ति” बनना है, तो सभी भाषाओं को सम्मान और संसाधन समान रूप से मिलना चाहिए।




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