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बिहार में युवाओं के सामने रोजगार का संकट, हर 100 में से 12 युवा बेरोजगार; 57% स्कूलों में कंप्यूटर नहीं

बिहार में युवा बेरोजगारी, स्कूलों में डिजिटल सुविधाओं की कमी और सरकारी नौकरियों के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा रोजगार की चुनौती को गंभीर बना रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, युवाओं को बेहतर अवसर देने के लिए शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और उद्योगों की जरूरतों के बीच तालमेल बढ़ाना जरूरी है।

बिहार में शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार हासिल करना युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक ओर बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरियों की तैयारी में जुटे हैं, तो दूसरी ओर निजी क्षेत्र में रोजगार पाने के लिए जरूरी तकनीकी कौशल और व्यावहारिक अनुभव की कमी भी सामने आती है। इस स्थिति को राज्य की शिक्षा व्यवस्था में मौजूद बुनियादी कमियां और अधिक चुनौतीपूर्ण बना रही हैं।

आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 15 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं की बेरोजगारी दर 2025 में 12.1 प्रतिशत रही। वहीं, शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के 95,285 स्कूलों में से केवल 40,960 में कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध है। इसका मतलब है कि लगभग 43 प्रतिशत स्कूलों में ही कंप्यूटर हैं, जबकि 57 प्रतिशत स्कूल इस सुविधा से वंचित हैं। डिजिटल शिक्षा के दौर में यह अंतर छात्रों की पढ़ाई और भविष्य की रोजगार संबंधी तैयारी पर सवाल खड़ा करता है। 

बिहार में रोजगार की चुनौती को केवल बेरोजगारी दर से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि कितने युवा काम की तलाश में हैं, कितने शिक्षा और प्रशिक्षण से जुड़ पा रहे हैं और स्कूल से निकलने के बाद उन्हें रोजगार के लिए किस तरह की तैयारी मिल रही है।

बिहार में युवा बेरोजगारी और श्रम बल भागीदारी की स्थिति

बिहार में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 2025 में 12.1 प्रतिशत दर्ज की गई। इसके अलावा, राज्य में श्रम बल भागीदारी दर 34.3 प्रतिशत रही, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह करीब 46 प्रतिशत थी। ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार में युवाओं की रोजगार संबंधी चुनौती केवल नौकरी नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। काम करने या काम तलाशने की प्रक्रिया में शामिल युवाओं का अनुपात भी राष्ट्रीय स्तर से कम है। 

श्रम बल भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate) उन लोगों का अनुपात बताती है जो काम कर रहे हैं या काम की तलाश में हैं। इसलिए कम भागीदारी का अर्थ यह नहीं है कि इतने ही युवा बेरोजगार हैं। इसके पीछे पढ़ाई जारी रखना, घरेलू जिम्मेदारियां, काम के सीमित अवसर और अन्य कारण भी हो सकते हैं।

बेरोजगारी की समस्या को समझने के लिए शिक्षा और रोजगार के बीच के संबंध पर भी ध्यान देना जरूरी है। डिग्री हासिल करने के बाद यदि युवाओं के पास कंप्यूटर का व्यावहारिक ज्ञान, डिजिटल काम करने की क्षमता या उद्योगों की जरूरत के मुताबिक कौशल नहीं है, तो नौकरी पाने में मुश्किल बढ़ सकती है। हालांकि, बेरोजगारी का कारण केवल पारंपरिक डिग्रियां नहीं हैं। रोजगार के अवसरों की उपलब्धता, उद्योगों का विकास और भर्ती की प्रक्रिया भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

स्कूलों में कंप्यूटर की कमी से डिजिटल तैयारी प्रभावित

आज पढ़ाई से लेकर नौकरी के आवेदन तक कई जरूरी काम डिजिटल माध्यम से होते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरने, ऑनलाइन परीक्षा देने, डेटा से जुड़े काम करने और डिजिटल मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में कंप्यूटर का ज्ञान उपयोगी है। ऐसे में स्कूली स्तर पर कंप्यूटर और डिजिटल शिक्षा की उपलब्धता छात्रों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।

UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, बिहार के 95,285 स्कूलों में से 40,960 स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा है। यानी करीब 43 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर उपलब्ध हैं और 54,325 स्कूलों में यह सुविधा नहीं है। 

कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध होना और उसका पढ़ाई में प्रभावी इस्तेमाल होना, दोनों अलग बातें हैं। छात्रों को नियमित प्रैक्टिकल का समय, प्रशिक्षित शिक्षक, काम करने वाले कंप्यूटर और उपयोगी शैक्षणिक सामग्री भी चाहिए। इन सुविधाओं के बिना केवल कंप्यूटर उपलब्ध कराने से डिजिटल शिक्षा का पूरा लाभ नहीं मिल सकता।

ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों के लिए स्कूल में मिलने वाली डिजिटल शिक्षा खास महत्व रखती है। जिन छात्रों के पास घर पर कंप्यूटर या लैपटॉप नहीं है, उनके लिए स्कूल ही तकनीकी कौशल सीखने का प्रमुख माध्यम हो सकता है। इसलिए स्कूलों में कंप्यूटर की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ उनके नियमित उपयोग पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

सरकारी नौकरियों के लिए लाखों उम्मीदवार, पद सीमित

बिहार में सरकारी नौकरी को सुरक्षित करियर के रूप में देखा जाता है। नियमित वेतन, नौकरी की स्थिरता और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की संयुक्त प्रतियोगी परीक्षाओं में उम्मीदवारों की बड़ी संख्या इस प्रतिस्पर्धा को दिखाती है।

67वीं बीपीएससी संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में लगभग 802 पदों के लिए करीब 4.8 लाख उम्मीदवारों ने भाग लिया था। 68वीं परीक्षा में 324 पदों के लिए लगभग 2.6 लाख आवेदन आए। 69वीं परीक्षा में करीब 475 पद थे, जबकि 70वीं परीक्षा में 2,035 पदों के लिए लगभग 3.3 लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया। 71वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा में 1,298 पदों के लिए करीब 3.2 लाख उम्मीदवारों के शामिल होने की जानकारी दी गई है।

इन आंकड़ों से साफ है कि सरकारी भर्तियों में पदों की संख्या और उम्मीदवारों के बीच बड़ा अंतर है। हालांकि, अलग-अलग परीक्षाओं में आवेदन करने वाले और वास्तव में परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों की संख्या अलग हो सकती है। इसलिए इन आंकड़ों की तुलना करते समय यह अंतर ध्यान में रखना चाहिए।

सरकारी नौकरी की तैयारी करना युवाओं का एक महत्वपूर्ण विकल्प है, लेकिन रोजगार के अन्य रास्तों की जानकारी और उपलब्धता भी जरूरी है। निजी क्षेत्र, तकनीकी सेवाओं, विनिर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल सेवाओं और स्वरोजगार में अवसर बढ़ने से युवाओं को करियर के अधिक विकल्प मिल सकते हैं। इसके लिए प्रशिक्षण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों का विकास भी महत्वपूर्ण है।

कौशल प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप से क्या बदल सकता है?

युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करने में कौशल प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अप्रेंटिसशिप के दौरान उम्मीदवारों को काम की वास्तविक परिस्थितियों में सीखने और व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का मौका मिलता है। इससे उन्हें पढ़ाई में सीखी गई बातों को काम में इस्तेमाल करने की समझ विकसित करने में मदद मिल सकती है।

राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS) के तहत बिहार में अप्रेंटिसशिप से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या 2024-25 में 5,502 से बढ़कर 2025-26 में 9,013 बताई गई है। यह वृद्धि प्रशिक्षण के अवसरों तक पहुंच बढ़ने का संकेत देती है। हालांकि, अप्रेंटिसशिप से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या को सीधे स्थायी रोजगार पाने वाले युवाओं की संख्या नहीं माना जा सकता।

नीति आयोग की अगस्त 2026 में जारी Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047 रिपोर्ट में कौशल विकास को शिक्षा से रोजगार तक की निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उद्योगों की वास्तविक जरूरतों, रोजगार के अवसरों और युवाओं की आय में सुधार से जोड़ना जरूरी है। इसमें स्कूलों में शुरुआती स्तर से रोजगार उपयोगी कौशल सिखाने, उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने और अप्रेंटिसशिप को रोजगार की एक अहम राह बनाने पर भी जोर दिया गया है। 

बिहार के संदर्भ में इसका अर्थ है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल प्रमाणपत्र देने तक सीमित न रहें। युवाओं को ऐसे कौशल सिखाए जाएं जिनकी स्थानीय उद्योगों और रोजगार बाजार में मांग हो। प्रशिक्षण के बाद उन्हें नौकरी, अप्रेंटिसशिप या स्वरोजगार से जोड़ने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

बिहार के युवाओं के लिए आगे का रास्ता क्या है?

बिहार में रोजगार की चुनौती से निपटने के लिए शिक्षा, कौशल विकास और उद्योगों के विस्तार पर एक साथ काम करना होगा। स्कूलों में कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधाएं बढ़ाने के साथ छात्रों को नियमित व्यावहारिक प्रशिक्षण देना जरूरी है। कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों में ऐसे पाठ्यक्रम होने चाहिए जो बदलती रोजगार जरूरतों के अनुरूप हों।

इसके साथ ही, स्थानीय उद्योगों और कंपनियों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़ना होगा, ताकि युवाओं को पढ़ाई के दौरान ही काम का अनुभव मिल सके। अप्रेंटिसशिप के अवसरों की जानकारी जिला स्तर तक पहुंचाना और प्रशिक्षण पूरा करने वालों के रोजगार संबंधी नतीजों का आकलन करना भी जरूरी है।

युवाओं को करियर मार्गदर्शन देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्हें सरकारी नौकरियों की तैयारी के साथ-साथ निजी क्षेत्र, तकनीकी सेवाओं, व्यावसायिक प्रशिक्षण और स्वरोजगार के विकल्पों की जानकारी मिलनी चाहिए। इससे वे अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार अधिक सोच-समझकर करियर का चुनाव कर सकेंगे।

बिहार में युवाओं की बड़ी आबादी राज्य के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण ताकत बन सकती है। लेकिन इसके लिए केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, डिजिटल सुविधाएं, रोजगार से जुड़ा कौशल प्रशिक्षण और पर्याप्त नौकरियों का निर्माण—इन सभी पर साथ-साथ काम करना होगा। तभी युवाओं की शिक्षा को बेहतर रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता में बदला जा सकेगा।

Raish Ahmed

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