
सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा के अधिकार (RTE) को लेकर बड़ा सवाल उठाया है। अदालत ने 2014 में पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा दिए गए उस फैसले पर गंभीर संदेह जताया है, जिसमें कहा गया था कि आरटीई अधिनियम के प्रावधान धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होते।
शीर्ष अदालत का कहना है कि यह फैसला “सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने की नींव को कमजोर करता है और इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं”। इसलिए इस पर पुनर्विचार आवश्यक है।
तमिलनाडु और महाराष्ट्र की याचिका पर सुनवाई
मामला इस बात से जुड़ा है कि अल्पसंख्यक-संचालित स्कूलों में शिक्षक नियुक्ति के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य होगी या नहीं। दो जजों की पीठ ने इस मुद्दे को बड़ी संविधान पीठ को भेजने की अनुशंसा की है। बेंच का कहना है कि अल्पसंख्यक संस्थानों को अधिनियम से बाहर रखने से समावेशिता और समान शिक्षा का उद्देश्य प्रभावित होता है।
संविधान के प्रावधानों में टकराव
2014 के फैसले से अनुच्छेद 21ए (शिक्षा का अधिकार) और अनुच्छेद 30(1) (अल्पसंख्यक समुदायों के अपने शैक्षणिक संस्थान चलाने का अधिकार) के बीच विरोधाभास पैदा हो गया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट केस में दिया गया फैसला अब पुनर्विचार योग्य है।
बच्चों की समान शिक्षा पर असर
बेंच ने कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों को आरटीई से छूट देना समान और सार्वभौमिक शिक्षा की अवधारणा को कमजोर करता है। इसका खतरा यह है कि जाति, वर्ग, पंथ और समुदाय के बच्चों को एक साथ लाने की बजाय यह व्यवस्था उन्हें और विभाजित कर देगी।
मामला बड़ी पीठ के पास
सुप्रीम कोर्ट ने चार अहम मुद्दों पर बड़ी पीठ से विचार करने की सिफारिश की है, जिनमें प्रमुख यह है कि क्या 2014 के फैसले पर पुनर्विचार कर अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई के दायरे में लाया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान में कई अल्पसंख्यक संस्थान इस छूट का दुरुपयोग कर रहे हैं।




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