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Museum Careers in India: Growing Museums Create Demand for Skilled Professionals

भारत में म्यूजियम सेक्टर: बढ़ते संग्रहालयों के बीच प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स की कमी बड़ी चुनौती

Museum Careers in India: Growing Museums Create Demand for Skilled Professionals

भारत में म्यूजियम यानी संग्रहालयों की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब संग्रहालय केवल ऐसी जगह नहीं रह गए हैं, जहां ऐतिहासिक वस्तुओं को शीशे के पीछे रखा जाता है और लोग उन्हें देखकर आगे बढ़ जाते हैं। आज संग्रहालय शिक्षा, शोध, समुदाय से जुड़ाव, डिजिटल कहानी और नए तरह के अनुभवों के केंद्र बन रहे हैं। इसके साथ ही इस क्षेत्र में करियर के विकल्प भी बढ़ रहे हैं। क्यूरेटर और संरक्षण विशेषज्ञों के अलावा कलेक्शन मैनेजर, रिसर्चर, म्यूजियम एजुकेटर, एग्जीबिशन डिजाइनर और डिजिटल विशेषज्ञों की जरूरत बढ़ रही है।

इस बदलाव का अंदाजा सरकार के निवेश से भी लगाया जा सकता है। मार्च 2026 में संस्कृति मंत्रालय ने बताया था कि पिछले पांच वर्षों में म्यूजियम ग्रांट स्कीम के तहत 21 नए संग्रहालय बनाए गए और 23 मौजूदा संग्रहालयों को विकसित किया गया। इसके अलावा संग्रहालयों के कलेक्शन को डिजिटल बनाने और एक वर्चुअल एक्सपीरियेंशियल म्यूजियम के लिए भी सहायता दी गई है। इस योजना में म्यूजियम प्रोफेशनल्स की क्षमता बढ़ाने और प्रशिक्षण को भी शामिल किया गया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में संग्रहालयों का विस्तार जितनी तेजी से हो रहा है, उतनी ही तेजी से इस क्षेत्र के लिए प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स भी तैयार हो रहे हैं?

बढ़ता म्यूजियम सेक्टर, लेकिन प्रशिक्षित लोगों की कमी

आधुनिक संग्रहालय के लिए सिर्फ कलेक्शन संभालने वाले लोगों की जरूरत नहीं होती। यहां ऐसे प्रोफेशनल्स चाहिए जो कलेक्शन, रिकॉर्ड रखने, संरक्षण, शोध, एग्जीबिशन डिजाइन, दर्शकों से जुड़ाव, शिक्षा, तकनीक और मैनेजमेंट को समझते हों।

नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट के महानिदेशक डॉ. संजीव किशोर गौतम के अनुसार, संग्रहालयों की बदलती भूमिका के साथ वहां काम करने वाले लोगों से जुड़ी जरूरतें भी बदल रही हैं। उनका कहना है कि भारत के संग्रहालय केवल कलेक्शन रखने वाली जगहों से आगे बढ़कर शिक्षा और लोगों से जुड़ने वाले स्थान बन रहे हैं। ऐसे में क्यूरेशन, आईटी, विजिटर एक्सपीरियंस और कम्युनिटी आउटरीच जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित लोगों की जरूरत है।

डॉ. गौतम के अनुसार, मौजूदा शिक्षा व्यवस्था इन नए क्षेत्रों के लिए बहुत कम विशेषज्ञ तैयार कर रही है। विश्वविद्यालयों को केवल आर्ट हिस्ट्री पर ध्यान देने के बजाय ऐसे प्रैक्टिकल म्यूजियम स्टडीज प्रोग्राम शुरू करने चाहिए, जिनमें कलेक्शन के साथ इंटर्नशिप को भी पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा बनाया जाए। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों और संग्रहालयों के बीच मेंटरशिप और रेजिडेंसी प्रोग्राम के जरिए बेहतर संबंध बनाने की जरूरत है।

इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम्स (ICOM) की 2022 की परिभाषा भी संग्रहालयों की बदलती भूमिका को दिखाती है। इसके अनुसार संग्रहालय शोध करते हैं, कलेक्शन तैयार करते हैं, संरक्षण करते हैं, विरासत की व्याख्या करते हैं और उसे प्रदर्शित करते हैं। साथ ही उन्हें सभी लोगों के लिए सुलभ, समावेशी और समुदाय से जुड़े संस्थान के रूप में काम करना चाहिए।

इसके बावजूद भारत में म्यूजियम से जुड़े विशेषज्ञ प्रशिक्षण के अवसर अभी सीमित हैं।

सांस्कृतिक विरासत के हिसाब से प्रशिक्षण व्यवस्था पर्याप्त नहीं

छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय (CSMVS), मुंबई के महानिदेशक और बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सचिव डॉ. सब्यसाची मुखर्जी का मानना है कि भारत के पास बहुत समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, लेकिन इसके अनुरूप प्रोफेशनल ट्रेनिंग सिस्टम अभी विकसित नहीं हो पाया है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत में स्मारक, मंदिर, भाषाएं, खान-पान की परंपराएं, पहनावे, हस्तशिल्प, लोक और प्रदर्शन कलाएं तथा कई तरह की सांस्कृतिक परंपराएं शामिल हैं। डॉ. मुखर्जी के अनुसार, कल्चरल हेरिटेज मैनेजमेंट एक बहुत खास क्षेत्र है, जिसमें म्यूजियम मैनेजमेंट, संरक्षण, पुरातत्व, सांस्कृतिक पर्यटन, हेरिटेज इंटरप्रिटेशन, कलेक्शन मैनेजमेंट, सांस्कृतिक नीति, दस्तावेजीकरण, शिक्षा और डिजिटल तकनीक शामिल हैं।

कुछ विश्वविद्यालय और संस्थान पोस्टग्रेजुएट और डिप्लोमा कोर्स चला रहे हैं, लेकिन डॉ. मुखर्जी के अनुसार इनकी गुणवत्ता, संख्या और अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव अभी जरूरत के मुताबिक नहीं है।

प्रशिक्षित लोगों की कमी का असर केवल कर्मचारियों की संख्या पर नहीं पड़ता। इससे कलेक्शन के सही दस्तावेजीकरण और संरक्षण, एग्जीबिशन की योजना, विरासत की सही व्याख्या और अंत में दर्शकों के अनुभव पर भी असर पड़ सकता है।

डिग्री के साथ प्रैक्टिकल अनुभव भी जरूरी

म्यूजियम सेक्टर में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं हो सकता। उन्हें वास्तविक कलेक्शन, स्टोरेज, संरक्षण के तरीकों, एग्जीबिशन तैयार करने और संग्रहालय चलाने की रोजमर्रा की प्रक्रिया का अनुभव भी चाहिए।

बिहार म्यूजियम सोसाइटी, पटना के एडिशनल डायरेक्टर (एडमिनिस्ट्रेशन) रणबीर सिंह राजपूत का कहना है कि म्यूजियम और हेरिटेज सेक्टर की अहमियत को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन इस मांग को पूरा करने के लिए प्रशिक्षित लोगों की अभी कमी है।

उनके अनुसार, म्यूजियम प्रोफेशनल की भूमिका भी बदल गई है। अब संग्रहालय केवल अपनी वस्तुओं के कलेक्शन के लिए नहीं जाने जाते। प्रोफेशनल्स को ऐसी प्रस्तुति तैयार करनी होती है, जिसमें जानकारी के साथ दर्शकों के लिए दिलचस्प अनुभव भी हो।

राजपूत का कहना है कि कई मौजूदा कोर्स अभी भी वस्तुओं के इतिहास और महत्व पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जबकि कैटलॉग बनाना, वस्तुओं की स्थिति का आकलन करना और डिजिटल दस्तावेजीकरण जैसे प्रैक्टिकल कामों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।

म्यूजियम का काम कई क्षेत्रों से जुड़ा होता है। एक ही एग्जीबिशन पर काम करते समय किसी प्रोफेशनल को शोध, अनुवाद, डिजाइन, संरक्षण और लोगों से संवाद जैसे अलग-अलग काम करने पड़ सकते हैं। इसलिए केवल एक क्षेत्र की ट्रेनिंग किसी छात्र को पूरी तरह तैयार नहीं कर सकती।

यही वजह है कि विश्वविद्यालयों और संग्रहालयों के बीच इंटर्नशिप, साझा शोध और मिलकर पढ़ाने जैसी व्यवस्था जरूरी हो जाती है।

क्यूरेशन से आगे बढ़ रही है म्यूजियम की भूमिका

संग्रहालयों में आने वाले लोगों की भूमिका भी बदल रही है। अब दर्शक सिर्फ जानकारी सुनने या पढ़ने वाला व्यक्ति नहीं है। आधुनिक संग्रहालय में संवाद, चर्चा और समुदाय की भागीदारी को भी महत्व दिया जा रहा है।

लखनऊ म्यूजियम ऑफ हेरिटेज एंड आर्ट की एसोसिएट क्यूरेटर और रिसर्च कंसल्टेंट सिमरन लेखी, जो फिलहाल म्यूजियोलॉजी में मास्टर डिग्री कर रही हैं, मानती हैं कि आधुनिक म्यूजियोलॉजी को समझना इस बदलाव के लिए जरूरी है।

उनके अनुसार, पारंपरिक संग्रहालय व्यवस्था में क्यूरेटर को विशेषज्ञ और शिक्षक की तरह देखा जाता था और दर्शकों से उम्मीद होती थी कि वे दी गई जानकारी को स्वीकार कर लें। लेकिन आधुनिक संग्रहालय को संवाद, बहस और समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देने वाला संस्थान होना चाहिए।

लेखी का मानना है कि संग्रहालय में काम करने से छात्रों को ऐसी चीजें सीखने को मिलती हैं, जिन्हें केवल क्लासरूम में पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता। इसमें बजट, संस्थागत ढांचा, राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ, एग्जीबिशन से जुड़े फैसले और रोजमर्रा के काम में आने वाली अचानक समस्याएं शामिल हैं।

वहीं, विशेष म्यूजियोलॉजी प्रोग्राम भी जरूरी हैं, ताकि छात्रों को एथिक्स, सहयोग के साथ संग्रहालय तैयार करने, एग्जीबिशन डिजाइन और ज्ञान निर्माण की समझ मिल सके।

उनके अनुसार, कंजर्वेशन साइंस और आर्किटेक्चर जैसे तकनीकी क्षेत्रों पर भी तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि देश में इनसे जुड़े विशेष कोर्स चलाने वाले संस्थान बहुत कम हैं।

म्यूजियम के पीछे काम करती है विज्ञान और तकनीक

दर्शकों को संग्रहालय में केवल गैलरी और प्रदर्शित वस्तुएं दिखाई देती हैं, लेकिन इनके संरक्षण के पीछे काफी वैज्ञानिक और तकनीकी काम होता है।

किसी पेंटिंग या कपड़े को किस रोशनी में रखा जाए, यह केवल सुंदर दिखने का मामला नहीं है। तापमान और नमी पर नजर रखना जरूरी होता है। रोशनी, प्रदूषण और कीड़ों से भी वस्तुओं को नुकसान हो सकता है। इसके अलावा स्टोरेज सिस्टम, वस्तुओं को संभालना, पैकिंग, ट्रांसपोर्ट, सुरक्षा और आपात स्थिति की तैयारी भी जरूरी होती है।

ICOM की कमेटी फॉर कंजर्वेशन के अनुसार, रोशनी, नमी, प्रदूषण और कीड़ों पर नियंत्रण के साथ-साथ रजिस्ट्रेशन, स्टोरेज, हैंडलिंग, पैकिंग, ट्रांसपोर्ट और इमरजेंसी प्लानिंग प्रिवेंटिव कंजर्वेशन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

इसलिए आज संग्रहालयों को केवल क्यूरेटर की जरूरत नहीं है। उन्हें कंजर्वेटर, कंजर्वेशन साइंटिस्ट, आर्किटेक्ट, इंजीनियर, डिजाइनर, कलेक्शन मैनेजर, डिजिटल विशेषज्ञ और म्यूजियम एजुकेटर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की जरूरत होती है।

सोमैया विद्याविहार यूनिवर्सिटी की डीन, फैकल्टी ऑफ धर्मा स्टडीज, डॉ. पल्लवी जांभले के अनुसार, तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने इस क्षेत्र में अलग-अलग विशेषज्ञताओं को साथ लाना और जरूरी कर दिया है। छात्रों के लिए बारकोडिंग, RFID सिस्टम, डिजिटल डेटाबेस और वर्चुअल रियलिटी जैसी तकनीकों को समझना जरूरी होता जा रहा है, लेकिन इन्हें केवल क्लासरूम में पूरी तरह नहीं सिखाया जा सकता।

भविष्य के संग्रहालयों के लिए कैसे हों कोर्स?

भारत में म्यूजियोलॉजी की पढ़ाई मुख्य रूप से पोस्टग्रेजुएट प्रोग्राम, डिप्लोमा और पुरातत्व या हेरिटेज स्टडीज से जुड़े विषयों के रूप में उपलब्ध है। इससे छात्रों के लिए अवसर तो बनते हैं, लेकिन कोर्स की संख्या, पहुंच और करियर की संभावनाओं को लेकर सवाल भी बने हुए हैं।

डॉ. जांभले के अनुसार, जिन संस्थानों में म्यूजियोलॉजी को किसी अन्य विषय के साथ पढ़ाया जाता है, वहां यह पाठ्यक्रम का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा रहता है। कुछ विश्वविद्यालयों में इसके लिए अलग विभाग और डिग्री प्रोग्राम हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कार्यक्रम भारत के बढ़ते हेरिटेज सेक्टर की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त हैं।

उनके अनुसार, केवल नए कोर्स शुरू करना ही समाधान नहीं है। मौजूदा और नए दोनों कोर्स में म्यूजियोलॉजी और म्यूजियम प्रोफेशन के बीच लगातार संवाद होना चाहिए।

इंटर्नशिप और वास्तविक काम का अनुभव भी इसमें महत्वपूर्ण है। छात्र म्यूजियम, आर्काइव, कंजर्वेशन स्टूडियो और निजी कलेक्शन के साथ काम करके अनुभव हासिल कर सकते हैं। वर्कशॉप, प्रोजेक्ट और कॉन्फ्रेंस भी उनके शोध कौशल को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।

संस्कृति मंत्रालय की म्यूजियम ग्रांट स्कीम में भी क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण को शामिल किया गया है। यह योजना म्यूजियम कलेक्शन के डिजिटलीकरण, डिजिटल कैटलॉग, हार्डवेयर, ऑनलाइन म्यूजियम लाइब्रेरी और इंटरैक्टिव इंफॉर्मेशन कियोस्क जैसी सुविधाओं के लिए भी सहायता देती है।

इससे साफ है कि भविष्य केवल नए म्यूजियम भवन बनाने का नहीं है। इनके संचालन के लिए प्रशिक्षित लोगों और तकनीकी व्यवस्था को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

क्यूरेटर से आगे बढ़ रहा है करियर का दायरा

म्यूजियम सेक्टर में बदलाव के साथ छात्रों के लिए करियर के विकल्प भी बढ़ रहे हैं।

मुंबई के विल्सन कॉलेज में इतिहास की तीसरे वर्ष की छात्रा निशिदा मेहरकर का कहना है कि म्यूजियम में उनके अनुभव ने उन्हें समझाया कि इस क्षेत्र में पारंपरिक क्यूरेशन से कहीं ज्यादा अवसर हैं।

उनके अनुसार, क्यूरेशन, रिसर्च, डॉक्यूमेंटेशन, कंजर्वेशन, म्यूजियम एजुकेशन और हेरिटेज मैनेजमेंट में करियर बनाया जा सकता है। उनका अनुभव यह भी बताता है कि किताबी ज्ञान जरूरी है, लेकिन फील्ड में काम करने का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

इसी तरह जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी से म्यूजियोलॉजी और हेरिटेज स्टडीज में दूसरी मास्टर डिग्री कर रहीं मीडिया प्रोफेशनल मेहा माथुर के अनुसार, इस क्षेत्र में थ्योरी, आर्काइविंग, डॉक्यूमेंटेशन, अलग-अलग तरह के म्यूजियम, मैनेजमेंट और कानूनी पहलुओं की जानकारी शामिल है।

उनके अनुसार, म्यूजियम अब केवल स्थिर वस्तुओं को प्रदर्शित करने वाली जगह नहीं रहे हैं। वे अलग-अलग समुदायों की आवाज को सामने रखने वाले इंटरैक्टिव प्लेटफॉर्म बन रहे हैं।

वह यह भी मानती हैं कि बदलते म्यूजियम सेक्टर में प्रोफेशनल्स के लिए लगातार ट्रेनिंग जरूरी होगी। साथ ही ऐसे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, आर्किटेक्ट्स और डिजाइन विशेषज्ञों की भी जरूरत होगी, जो वस्तुओं के संरक्षण से लेकर AR और VR जैसे नए अनुभव तैयार करने में योगदान दे सकें।

सिर्फ डिग्री नहीं, मजबूत प्रोफेशनल सिस्टम की जरूरत

भारत के सामने चुनौती केवल म्यूजियोलॉजी पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। जरूरत ऐसे प्रोफेशनल सिस्टम की है, जहां इन छात्रों को प्रशिक्षण के साथ बेहतर करियर के अवसर भी मिल सकें।

बिहार म्यूजियम की क्यूरेटर विशी उपाध्याय के अनुसार, भारत में प्रशिक्षित म्यूजियम प्रोफेशनल्स की संख्या बढ़ रही है, लेकिन खासकर बड़े शहरों के बाहर उनकी तैयारी और उपलब्धता में अंतर दिखाई देता है।

छोटे शहरों के कई संस्थानों में कलेक्शन मैनेजमेंट, कंजर्वेशन, डॉक्यूमेंटेशन, एग्जीबिशन डिजाइन, एजुकेशन और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक विशेषज्ञता की कमी बनी हुई है। उनका मानना है कि इंटर्नशिप, फील्डवर्क, अप्रेंटिसशिप और लाइव प्रोजेक्ट इस कमी को दूर करने में मदद कर सकते हैं।

द रोहिन स्टूडियोज, चंडीगढ़ के संस्थापक और टेक्सटाइल क्यूरेटर राजा प्रताप ककरावड़ा का मानना है कि म्यूजियम प्रोफेशनल्स के लिए टेक्सटाइल, संस्कृति, परंपराओं, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र और इतिहास की समझ के साथ तकनीकी ज्ञान भी जरूरी है।

वहीं, डॉ. सब्यसाची मुखर्जी का मानना है कि भारत को सांस्कृतिक विरासत के प्रबंधन के लिए एक मजबूत और विश्वस्तरीय संस्थान की जरूरत है। इसके लिए भारतीय और विदेशी विशेषज्ञों, सांस्कृतिक संस्थानों, सरकारी एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, फाउंडेशन और निजी क्षेत्र को साथ लाने की जरूरत है। ऐसे संस्थान में अलग-अलग विषयों की पढ़ाई, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, रिसर्च सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग होना चाहिए।

भारत के पास समृद्ध विरासत, हजारों कहानियां, कलाएं, परंपराएं और ऐतिहासिक संग्रह हैं। चुनौती अब इन्हें सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित लोगों को तैयार करने की है।

जैसे-जैसे संग्रहालय डिजिटल, इंटरैक्टिव और लोगों से जुड़े संस्थान बन रहे हैं, म्यूजियम प्रोफेशनल की भूमिका भी लगातार बड़ी होती जाएगी। आने वाले समय में इस क्षेत्र में केवल इतिहास की जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। प्रोफेशनल्स को संरक्षण की वैज्ञानिक समझ, डिजिटल तकनीक, शोध, डिजाइन और समुदायों के साथ संवाद करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।

यही बदलाव भारत में म्यूजियोलॉजी की शिक्षा और म्यूजियम सेक्टर के भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत बनता जा रहा है।

 

Asmita Sarkar

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