Edinbox Hindi
उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण: क्या भारत फिर बनेगा दुनिया का ज्ञान केंद्र?

उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण: क्या भारत फिर बनेगा दुनिया का ज्ञान केंद्र?

उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण: क्या भारत फिर बनेगा दुनिया का ज्ञान केंद्र?

भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। नई नीतियां, डिजिटल शिक्षा का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग—ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब अपनी शिक्षा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जिस तरह भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर दिया है, उससे यह बहस और तेज हो गई है कि क्या भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान व्यवस्था में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

भारत की शिक्षा परंपरा सदियों पुरानी है। नालंदा यूनिवर्सिटी और तक्षशिला जैसे संस्थानों ने कभी दुनिया भर के छात्रों को आकर्षित किया था। लेकिन आधुनिक दौर में वैश्विक शिक्षा के मंच पर भारत की उपस्थिति उतनी प्रभावशाली नहीं रही। अब सरकार और शिक्षा जगत यह मानने लगे हैं कि समय आ गया है जब भारत को अपनी अकादमिक ताकत, शोध क्षमता और ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती से पेश करना चाहिए।

शिक्षा मंत्री का तर्क है कि यह लक्ष्य केवल तकनीकी या वैज्ञानिक शोध से हासिल नहीं होगा। भारत को ज्ञान महाशक्ति बनने के लिए विज्ञान और समाज विज्ञान दोनों को साथ लेकर चलना होगा। अक्सर यह देखा गया है कि वैज्ञानिक शोध जब समाज की वास्तविक जरूरतों से जुड़ता है, तभी उसका असर व्यापक होता है। तकनीकी नवाचार और सामाजिक समझ के बीच तालमेल ही किसी देश को स्थायी प्रगति की ओर ले जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अब भारत को केवल आईटी या तकनीक के नजरिये से नहीं देख रहे। वे भारतीय समाज, लोकतंत्र, इतिहास और अर्थव्यवस्था को समझने में भी गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत वैश्विक शोध के लिए एक बड़ा विषय बन चुका है। ऐसे में भारतीय समाज विज्ञान की भूमिका और भी अहम हो जाती है।

इसी संदर्भ में Tata Institute of Social Sciences द्वारा प्रस्तावित ‘TISS-Global’ जैसी पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य दुनिया भर के उन विद्वानों को एक मंच पर लाना है जो भारत से जुड़े विषयों पर शोध कर रहे हैं। यह पहल अगर सही दिशा में आगे बढ़ती है तो भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और विकास मॉडल पर अधिक संतुलित और व्यापक विमर्श को बढ़ावा मिल सकता है।

हालांकि अंतरराष्ट्रीयकरण की इस प्रक्रिया के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। इससे भारतीय छात्रों को वैश्विक स्तर की शिक्षा और शोध का अवसर मिल सकता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में भारतीय विश्वविद्यालयों की पहचान और स्वायत्तता कमजोर न पड़े। अंतरराष्ट्रीय सहयोग तभी सार्थक होगा, जब वह बराबरी और ज्ञान के साझे आदान-प्रदान पर आधारित हो।

एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या भारत केवल विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां बुलाने तक सीमित रहेगा, या फिर खुद भी वैश्विक शिक्षा के विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में अपने शिक्षा संस्थान स्थापित करने चाहिए। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिल सकती है।

आज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा केवल आर्थिक ताकत की नहीं है। ज्ञान, विचार और शोध की दुनिया में भी देशों के बीच एक तरह की वैचारिक प्रतिस्पर्धा चल रही है। हर देश चाहता है कि उसकी विकास यात्रा और अनुभव वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनें। भारत भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत की युवा आबादी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर शोध सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र मिलता है, तो भारत आने वाले वर्षों में ज्ञान और नवाचार की दुनिया में एक मजबूत स्थान बना सकता है। लेकिन इसके लिए केवल नीतिगत घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, शोध संस्कृति और अकादमिक स्वतंत्रता को भी उतनी ही गंभीरता से मजबूत करना होगा।

भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की चर्चा दरअसल एक बड़े सवाल से जुड़ी है—क्या भारत दुनिया को केवल तकनीकी कौशल ही देगा, या फिर विचार, ज्ञान और बौद्धिक विमर्श का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। अगर यह संतुलन बन पाया, तो आने वाले वर्षों में भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान शक्ति के रूप में उभर सकता है।

रईस अहमद 'लाली'

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed