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जब दुनिया सुलगती है तो कैंपस भी कांपता है

जब दुनिया सुलगती है तो कैंपस भी कांपता है

जब दुनिया सुलगती है तो कैंपस भी कांपता है

क्यों युद्ध, गर्मी, आर्थिक दबाव, प्रवासन, मानसिक तनाव और एआई भारत की उच्च शिक्षा को नया आकार दे रहे हैं

एक समय था जब लोगों को लगता था कि विश्वविद्यालय इतिहास की हलचल से कुछ ऊपर खड़े होते हैं। बाहर आर्थिक मंदी हो, चुनावी लहर हो या सामाजिक अशांति—फिर भी यह कल्पना की जाती थी कि कैंपस के भीतर जीवन अपने शांत और नियमित ढंग से चलता रहेगा। छात्र बैग लेकर कक्षाओं की ओर जाएंगे, प्रोफेसर विचारों पर बहस करेंगे, पुस्तकालय खुले रहेंगे, प्रयोगशालाएँ काम करती रहेंगी और हॉस्टल देर रात तक करियर, सिनेमा, राजनीति और प्रेम पर चर्चाओं से भरे रहेंगे।

यह तस्वीर आज भी विश्वविद्यालयों के ब्रोशर में दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता अब काफी बदल चुकी है।

आज उच्च शिक्षा उस दौर से गुजर रही है जिसे कई विद्वान “पॉलीक्राइसिस” यानी बहु-संकट का समय कहते हैं। इसका मतलब है कि एक नहीं, बल्कि कई संकट एक साथ आ रहे हैं और एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। युद्ध छात्र गतिशीलता को बाधित करता है, वीज़ा प्रतिबंध विश्वविद्यालयों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं, जलवायु संकट कैंपस बंद करा देता है या कक्षाओं का समय बदल देता है। आवास संकट अंतरराष्ट्रीय शिक्षा नीतियों को प्रभावित करता है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पढ़ाने और मूल्यांकन की पारंपरिक पद्धतियों को चुनौती देता है, और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ सीखने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करती हैं।

अब ये समस्याएँ अलग-अलग नहीं आतीं। वे टकराती हैं, एक-दूसरे को बढ़ाती हैं और कई बार ऐसी प्रतिक्रियाएँ पैदा करती हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की गई थी।

इसी कारण आज उच्च शिक्षा का संकट पहले के संकटों से अलग है। यह सिर्फ पाठ्यक्रम, मान्यता, शिक्षण पद्धति या शिक्षकों की संख्या का मुद्दा नहीं रह गया है। आज के बड़े झटके अक्सर कक्षा के बाहर से आते हैं—वे भू-राजनीतिक, जलवायु, तकनीकी, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक होते हैं।

यूरोप में युद्ध कोलकाता के एक मेडिकल छात्र के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता लंदन में पढ़ रहे छात्र की हैदराबाद वापसी को महँगा बना सकती है। कनाडा में आवास संकट हजारों भारतीय परिवारों के विदेश में पढ़ाई के सपनों को सीमित कर सकता है। ओडिशा की गर्मी कक्षाओं का समय दोपहर से सुबह करवा सकती है।

भारत के लिए यह कोई दूर की कहानी नहीं है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक है। यहाँ युवा आबादी विशाल है और शिक्षा को सामाजिक सम्मान और आगे बढ़ने का प्रमुख रास्ता माना जाता है। साथ ही भारत का संबंध वैश्विक प्रवासन, खाड़ी देशों से आने वाले धन, पश्चिमी शिक्षा बाजार, जलवायु संकट और डिजिटल परिवर्तन से गहराई से जुड़ा है। इसलिए जब दुनिया अस्थिर होती है, तो भारतीय उच्च शिक्षा उससे अछूती नहीं रहती—उसके झटके तुरंत महसूस होते हैं।

अब वह समय आ गया है जब कक्षा दुनिया से अलग एक सुरक्षित जगह नहीं रही। बल्कि यह वह स्थान बनती जा रही है जहाँ दुनिया की बड़ी दरारें साफ दिखाई देती हैं।

आइवरी टावर का भ्रम टूट चुका है

“आइवरी टावर” शब्द लंबे समय तक विश्वविद्यालयों के लिए इस्तेमाल होता रहा। इसका मतलब था कि विश्वविद्यालय सामान्य जीवन की हलचल से कुछ दूर होते हैं। लेकिन बीसवीं सदी के अधिकांश समय तक विश्वविद्यालयों को वास्तव में एक तरह का संरक्षण मिला हुआ था। सरकारें बदलती थीं, बाजार ऊपर-नीचे होते थे, लेकिन विश्वविद्यालयों को लंबे समय तक स्थिर संस्थान माना जाता था।

आज यह सुरक्षा काफी हद तक खत्म हो चुकी है।

अब विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय छात्रों की फीस पर निर्भर हैं, वैश्विक उड़ानों पर छात्रों की आवाजाही निर्भर करती है, डिजिटल प्लेटफॉर्म पढ़ाई को जारी रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति वीज़ा नीतियों को तय करती है। ऐसे में विश्वविद्यालय सिर्फ एक कैंपस नहीं, बल्कि एक बड़े और अस्थिर वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं।

इसलिए जब यह नेटवर्क हिलता है, तो विश्वविद्यालय भी हिलते हैं।

जब युद्ध शुरू होता है, तो छात्र भागते हैं

उच्च शिक्षा की असुरक्षा को युद्ध जितनी स्पष्टता से शायद ही कोई और चीज दिखाती हो।

रूस-यूक्रेन युद्ध इसका बड़ा उदाहरण है। युद्ध से पहले यूक्रेन कम लागत में मेडिकल शिक्षा के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य बन चुका था। भारत के कई परिवारों के लिए, जो देश में निजी मेडिकल शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे, यूक्रेन डॉक्टर बनने का एक वास्तविक रास्ता था।

लेकिन युद्ध शुरू होते ही यह रास्ता अचानक बंद हो गया।

लेक्चर हॉल बंकर बन गए, लैब बंद हो गईं और छात्र सुरक्षित रास्तों की तलाश में सीमाओं की ओर निकल पड़े। भारत के ऑपरेशन गंगा के तहत 22,000 से अधिक भारतीयों को वापस लाया गया, लेकिन असली सवाल उसके बाद शुरू हुआ—जब पढ़ाई का भविष्य ही अनिश्चित हो गया।

पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने लौटे छात्रों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश की। कुछ छात्रों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में अस्थायी रूप से समायोजित किया गया, जबकि अन्य को इंटर्नशिप या प्रैक्टिकल प्रशिक्षण की सुविधा दी गई। लेकिन इस घटना ने एक कठोर सच्चाई सामने रखी—शिक्षा का सपना भी एक नाजुक व्यवस्था पर टिका होता है, जिसे भू-राजनीतिक संकट कभी भी तोड़ सकता है।

जब आसमान बंद होता है, तो शिक्षा के रास्ते भी बंद हो जाते हैं

पश्चिम एशिया में अस्थिरता उच्च शिक्षा को दूसरे तरीके से प्रभावित करती है। यह क्षेत्र वैश्विक विमानन मार्गों और श्रम प्रवासन का प्रमुख केंद्र है।

कई भारतीय छात्र विदेश जाते समय खाड़ी देशों के एयर हब से होकर गुजरते हैं। लेकिन यदि क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है तो उड़ानों को लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे टिकट की कीमतें अचानक कई गुना बढ़ सकती हैं। कभी 45 हजार रुपये में होने वाली यात्रा 2 लाख रुपये से अधिक की हो सकती है।

इसके अलावा खाड़ी देश भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ से बड़ी मात्रा में धन भारत आता है। भारत हर साल लगभग 130 से 140 अरब डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यह पैसा सिर्फ घर चलाने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा के लिए भी खर्च होता है।

इसलिए अगर खाड़ी देशों में आर्थिक संकट आता है, तो उसका असर सीधे भारत में शिक्षा पर पड़ सकता है।

पश्चिम अब हमेशा स्थिर विकल्प नहीं रहा

लंबे समय तक भारतीय मध्यम वर्ग के लिए विदेश में पढ़ाई का मतलब अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया था। इन देशों को स्थिर और प्रतिष्ठित माना जाता था।

लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है।

ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन में यूरोपीय छात्रों की संख्या घटी। कनाडा ने आवास संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर सीमा लगा दी। अमेरिका में कम जन्म दर के कारण कॉलेजों को घरेलू छात्रों की संख्या घटने का सामना करना पड़ रहा है।

इन बदलावों ने भारतीय परिवारों को यह एहसास कराया है कि विदेश में पढ़ाई का सपना अब पहले जितना स्थिर नहीं रहा।

जलवायु परिवर्तन अब टाइमटेबल तय कर रहा है

कई सालों तक जलवायु परिवर्तन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का विषय था। अब यह संचालन की वास्तविक चुनौती बन चुका है।

2024 में यूनिसेफ के अनुसार जलवायु से जुड़ी घटनाओं के कारण दुनिया भर में 24 करोड़ से अधिक छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई। भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है।

ओडिशा जैसे राज्यों में भीषण गर्मी के कारण संस्थानों को कक्षाओं और परीक्षाओं का समय सुबह करने के निर्देश दिए गए। यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि संकेत है कि पर्यावरण अब शिक्षा की संरचना को प्रभावित कर रहा है।

सबसे शांत संकट: मानसिक स्वास्थ्य

कुछ संकट विस्फोट के साथ आते हैं, जबकि कुछ चुपचाप फैलते हैं। मानसिक स्वास्थ्य ऐसा ही संकट है।

कई छात्र आर्थिक दबाव, सोशल मीडिया तुलना, नौकरी की अनिश्चितता और जलवायु चिंता जैसे कई तनावों के साथ विश्वविद्यालय में प्रवेश करते हैं। महामारी के बाद यह दबाव और बढ़ गया है।

जब छात्र और शिक्षक दोनों ही मानसिक दबाव में होते हैं, तो इसका असर सीखने की गुणवत्ता पर पड़ता है। ध्यान कम होता है, आत्मविश्वास घटता है और पढ़ाई की गहराई प्रभावित होती है।

इसलिए मानसिक स्वास्थ्य अब शिक्षा की गुणवत्ता से अलग विषय नहीं रहा।

कक्षा के भीतर एआई का तूफान

इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उच्च शिक्षा को एक नई चुनौती दी है।

अगर कोई टूल कुछ सेकंड में निबंध, कोड या शोध का मसौदा लिख सकता है, तो असाइनमेंट का मूल्यांकन कैसे किया जाए? क्या यह ज्ञान की परीक्षा है, लेखन कौशल की या तकनीक के उपयोग की?

भारत जैसे बड़े शिक्षा तंत्र में यह सवाल और भी जटिल हो जाता है। हालांकि एआई खतरे के साथ अवसर भी लाता है—जैसे अनुवाद, व्यक्तिगत सीखने में सहायता और बड़े पैमाने पर शिक्षण समर्थन।

लेकिन इसके लिए शिक्षण पद्धतियों को तेजी से बदलना होगा।

भारत के सामने अवसर और परीक्षा

दुनिया में उच्च शिक्षा का नक्शा बदल रहा है। कई पश्चिमी देशों में छात्र संख्या घट रही है, जबकि भारत के पास बड़ी युवा आबादी है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत को अधिक अंतरराष्ट्रीय और बहुविषयक शिक्षा प्रणाली बनाने की कल्पना करती है। भारत 2030 तक अधिक विदेशी छात्रों को आकर्षित करना चाहता है।

लेकिन इसके लिए सिर्फ महत्वाकांक्षा काफी नहीं है। विश्वविद्यालयों को संकट के समय भी भरोसेमंद साबित होना होगा—चाहे वह जलवायु संकट हो, युद्ध हो या तकनीकी बदलाव।

भविष्य का विश्वविद्यालय

इस दशक का सबसे बड़ा सबक स्पष्ट है—भविष्य का विश्वविद्यालय सिर्फ सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं बनाया जा सकता। उसे बाधाओं और संकटों के बीच भी काम करने के लिए तैयार होना होगा।

ऐसा विश्वविद्यालय जिसे संकट के समय भी पढ़ाई जारी रखने की क्षमता हो, मजबूत डिजिटल प्रणाली हो, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन हो, जलवायु-सुरक्षित बुनियादी ढाँचा हो और एआई के उपयोग के लिए स्पष्ट नीति हो।

सबसे महत्वपूर्ण बात—विश्वास।

आज छात्र और अभिभावक सिर्फ रैंकिंग नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि संकट के समय संस्थान कैसा व्यवहार करता है।

अंतिम सच्चाई

आज उच्च शिक्षा का संकट एक कहानी नहीं है, बल्कि कई कहानियों का संगम है।

यह यूक्रेन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की कहानी है, यह खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर निर्भर परिवारों की कहानी है, यह कनाडा के आवास संकट से बदलते छात्र विकल्पों की कहानी है, यह ओडिशा की गर्मी से बदलते टाइमटेबल की कहानी है, और यह उस छात्र की कहानी है जो कक्षा में शांत दिखता है लेकिन भीतर से संघर्ष कर रहा होता है।

आज विश्वविद्यालय इतिहास से बाहर नहीं हैं। वे उसी के बीच खड़े हैं।

और अब उच्च शिक्षा की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह शांति के समय कितनी चमकती है, बल्कि यह है कि उथल-पुथल के समय भी क्या वह सीखने की रोशनी जलाए रख सकती है।

(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)

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