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क्या NMC का PG डिप्लोमा खत्म करने का फैसला मेडिकल शिक्षा के लिए सही दिशा में बड़ा कदम है?

क्या NMC का PG डिप्लोमा खत्म करने का फैसला मेडिकल शिक्षा के लिए सही दिशा में बड़ा कदम है?

क्या NMC का PG डिप्लोमा खत्म करने का फैसला मेडिकल शिक्षा के लिए सही दिशा में बड़ा कदम है?

भारत की चिकित्सा शिक्षा एक नए बदलाव के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 पोस्टग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा मेडिकल कोर्स में प्रवेश का अंतिम वर्ष होगा। इसके बाद 2027-28 से इन पाठ्यक्रमों में नए दाखिले नहीं होंगे और इन्हें चरणबद्ध तरीके से एमडी (MD) तथा एमएस (MS) डिग्री पाठ्यक्रमों में परिवर्तित किया जाएगा। पहली नजर में यह फैसला केवल पाठ्यक्रमों के पुनर्गठन जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में इसका प्रभाव भारत की चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता तक दिखाई देगा।

बीते कई दशकों से पीजी डिप्लोमा मेडिकल कोर्स उन डॉक्टरों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प रहे हैं, जो कम अवधि में किसी विशेष विषय में प्रशिक्षण लेकर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ना चाहते थे। विशेष रूप से जिला अस्पतालों और छोटे शहरों में कार्यरत डॉक्टरों के लिए यह व्यवस्था काफी उपयोगी मानी जाती थी। लेकिन बदलते समय में चिकित्सा विज्ञान की जटिलताओं, आधुनिक उपचार तकनीकों और वैश्विक मानकों को देखते हुए डिग्री आधारित विशेषज्ञ शिक्षा की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में एनएमसी का यह निर्णय सामने आया है।

इस फैसले का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि देशभर में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा का स्वरूप अधिक समान और मानकीकृत होगा। अभी तक कई संस्थानों में एक ही विषय में डिप्लोमा और डिग्री दोनों प्रकार के पाठ्यक्रम चलते थे, जिससे प्रशिक्षण की अवधि, पाठ्यक्रम और विशेषज्ञता के स्तर में अंतर देखने को मिलता था। यदि सभी सीटें एमडी और एमएस कार्यक्रमों में बदलती हैं तो छात्रों को अधिक व्यापक प्रशिक्षण मिलेगा और उनकी योग्यता का स्तर भी एक समान होगा।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ा है। आधुनिक चिकित्सा में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जटिल बीमारियों के इलाज, नई तकनीकों के उपयोग और अनुसंधान आधारित चिकित्सा के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों का बेहतर प्रशिक्षण आवश्यक है। डिग्री आधारित पाठ्यक्रम इस दिशा में अधिक व्यवस्थित और व्यापक माने जाते हैं। ऐसे में यह बदलाव भविष्य में मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने में भी मदद कर सकता है।

हालांकि इस फैसले के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या देश के सभी मेडिकल कॉलेज एमडी और एमएस सीटों में बदलाव के लिए आवश्यक फैकल्टी, अस्पतालों में मरीजों की संख्या, बुनियादी ढांचे और शिक्षण संसाधनों की शर्तों को पूरा कर पाएंगे? यदि सीटों का रूपांतरण समय पर नहीं हो सका तो स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा में सीटों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर उन हजारों एमबीबीएस स्नातकों पर पड़ेगा जो हर वर्ष पीजी प्रवेश परीक्षा में शामिल होते हैं।

यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत पहले से ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में। यदि संक्रमण काल के दौरान सीटों की संख्या घटती है या नए डिग्री कार्यक्रम पर्याप्त गति से शुरू नहीं हो पाते, तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों को डिप्लोमा सीटों को एमडी और एमएस में बदलने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और संसाधनों के उचित विकास के साथ पूरी होती है, तो यह भारतीय चिकित्सा शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार साबित हो सकती है। लेकिन यदि आवश्यक बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो इस बदलाव का उद्देश्य अधूरा रह सकता है।

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था तेजी से बदल रही है। बढ़ती आबादी, नई बीमारियां और आधुनिक चिकित्सा तकनीकें ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की मांग कर रही हैं, जो केवल डिग्रीधारी ही नहीं बल्कि बेहतर प्रशिक्षित भी हों। ऐसे में एनएमसी का यह फैसला भविष्य की जरूरतों के अनुरूप दिखाई देता है। फिर भी किसी भी बड़े शैक्षणिक सुधार की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।

यह बदलाव केवल डिप्लोमा कोर्स समाप्त करने का निर्णय नहीं है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को नए स्तर पर ले जाने की कोशिश है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि इस परिवर्तन के दौरान छात्रों के अवसर कम न हों, मेडिकल कॉलेजों की क्षमता बढ़े और देश को अधिक संख्या में योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर मिल सकें। यदि ऐसा होता है, तो यह फैसला आने वाले वर्षों में भारतीय चिकित्सा शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में याद किया जाएगा।

रईस अहमद 'लाली'

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