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पेपर लीक सिर्फ परीक्षा की नहीं, पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी है

पेपर लीक सिर्फ परीक्षा की नहीं, पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी है

पेपर लीक सिर्फ परीक्षा की नहीं, पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी है

भारत में करोड़ों छात्रों के लिए परीक्षा केवल पढ़ाई का आकलन नहीं होती, बल्कि यह उनके सपनों, परिवार की वर्षों की बचत, कोचिंग पर किए गए खर्च और बेहतर भविष्य की उम्मीदों से भी जुड़ी होती है। ऐसे में जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो नुकसान केवल परीक्षा रद्द होने तक सीमित नहीं रहता। इससे छात्रों का उस व्यवस्था पर भरोसा भी कमजोर पड़ता है, जो मेहनत के आधार पर निष्पक्ष अवसर देने का दावा करती है।

पिछले कुछ वर्षों में देश में पेपर लीक की घटनाएं अब इक्का-दुक्का मामले नहीं रह गई हैं। यह समस्या शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। लगातार सामने आ रहे मामले यह दिखाते हैं कि उच्च दांव वाली परीक्षाओं (High-Stakes Exams), जवाबदेही की कमी और शिक्षा की असमान गुणवत्ता ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

सात वर्षों में 70 से अधिक पेपर लीक के मामले

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों और विभिन्न मामलों के रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में भारत में 70 से अधिक पुष्टि किए गए पेपर लीक के मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं से देशभर में करीब 1.7 करोड़ अभ्यर्थी प्रभावित हुए। यह समस्या केवल भर्ती परीक्षाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्कूल बोर्ड परीक्षाओं और विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं में भी प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आईं, जिससे छात्रों की पढ़ाई और रोजगार दोनों प्रभावित हुए।

साल 2002 से 2025 के बीच परीक्षा से जुड़े मामलों की समीक्षा यह भी बताती है कि दोषियों को सजा मिलने की दर बेहद कम रही है। भर्ती परीक्षाओं, उच्च शिक्षा प्रवेश परीक्षाओं और स्कूल बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े मामलों में 1,658 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 925 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुए। इसके बावजूद केवल दो मामलों में 18 दोषसिद्धियां दर्ज की गईं। गिरफ्तारी और अंतिम सजा के बीच इतना बड़ा अंतर छात्रों के मन में जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

NEET विवाद ने फिर उठाए बड़े सवाल

देश में पेपर लीक की समस्या सबसे ज्यादा चर्चा में तब आई जब NEET-UG 2024 परीक्षा विवाद सामने आया। इस मामले में 22 नवंबर 2024 तक केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) 45 आरोपियों के खिलाफ पांच चार्जशीट दाखिल कर चुका था।

इसके बाद 2026 में पेपर लीक के आरोपों के चलते 20 लाख से अधिक मेडिकल अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी। पुनर्परीक्षा के दौरान बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और अतिरिक्त पुलिस सुरक्षा जैसी सख्त व्यवस्थाएं की गईं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही रहा कि अगर व्यवस्था पहले से मजबूत होती, तो दोबारा परीक्षा कराने की जरूरत ही क्यों पड़ती?

छात्रों के लिए पुनर्परीक्षा केवल एक और परीक्षा नहीं होती। इसका मतलब है फिर से यात्रा का खर्च, मानसिक तनाव, प्रवेश प्रक्रिया में देरी और कई बार आर्थिक बोझ। छोटे शहरों और सीमित आय वाले परिवारों के छात्रों को दोबारा यात्रा, रहने और कोचिंग जैसी जरूरतों के लिए अतिरिक्त पैसे जुटाने पड़ते हैं। ऐसे में एक पेपर लीक कई छात्रों के लिए पूरे एक साल की मेहनत पर भारी पड़ सकता है।

सिर्फ सुरक्षा बढ़ाने से हल नहीं होगी समस्या

सरकार ने पेपर लीक रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के तहत प्रश्नपत्र लीक करना, संगठित नकल, फर्जी उम्मीदवार बैठाना और परीक्षा सामग्री तक अवैध पहुंच जैसे अपराधों को दंडनीय बनाया गया है।

हालांकि, केवल कानून सख्त कर देने या परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे, मेटल डिटेक्टर और मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। असली चुनौती यह है कि भारत में शिक्षा और सरकारी नौकरियों के लिए आज भी कुछ चुनिंदा परीक्षाओं पर अत्यधिक निर्भरता है।

जब एक ही परीक्षा किसी छात्र के भविष्य का फैसला करती है, तो गलत तरीके अपनाने की संभावना भी बढ़ जाती है। कोचिंग उद्योग का विस्तार होता है, बिचौलियों की भूमिका बढ़ती है और अफवाहों तथा धोखाधड़ी का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में परीक्षा ज्ञान का आकलन कम और चयन की बाधा अधिक बन जाती है।

सीखने और परीक्षा के बीच बढ़ती खाई

यह संकट तब और गंभीर दिखाई देता है जब इसे बच्चों की वास्तविक सीखने की क्षमता से जोड़कर देखा जाए। ASER 2024 रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा 3 के केवल 23.4 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ सही ढंग से पढ़ पा रहे हैं। वहीं, सरकारी और निजी स्कूलों को मिलाकर सिर्फ 33.7 प्रतिशत बच्चे साधारण घटाव (Subtraction) कर पा रहे हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि एक ओर शुरुआती कक्षाओं में बुनियादी पढ़ाई और गणित की क्षमता कमजोर है, वहीं दूसरी ओर छात्रों को बेहद कठिन और प्रतिस्पर्धी प्रवेश तथा भर्ती परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। स्कूलों में सीखने और प्रतियोगी परीक्षाओं की अपेक्षाओं के बीच यह अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

यदि शुरुआती शिक्षा मजबूत नहीं होगी और आगे चलकर केवल एक परीक्षा के आधार पर छात्रों का भविष्य तय किया जाएगा, तो यह व्यवस्था अवसर देने के बजाय तनाव और असमानता को बढ़ावा देगी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन छात्रों को होगा, जिनकी स्कूली शिक्षा पहले से कमजोर रही है।

सबसे बड़ा नुकसान भरोसे का

हर पेपर लीक शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर करता है। छात्र सोचने लगते हैं कि क्या केवल मेहनत से सफलता मिल सकती है। अभिभावकों को कोचिंग और पढ़ाई पर किए गए निवेश की चिंता सताने लगती है। विश्वविद्यालयों और भर्ती एजेंसियों की प्रक्रियाएं प्रभावित होती हैं और सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।

यह समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश में लाखों ऐसे छात्र हैं, जो अपने परिवार में पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। उनके लिए एक निष्पक्ष परीक्षा ही आगे बढ़ने का सबसे बड़ा अवसर होती है। यदि उसी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो जाए, तो इसका असर केवल एक परीक्षा पर नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र पर पड़ता है।

अब सुधार केवल कानून तक सीमित नहीं रहना चाहिए

भारत को परीक्षा सुरक्षा और तकनीकी निगरानी मजबूत करने की जरूरत है, लेकिन इसके साथ परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार भी जरूरी है। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और डिजिटल रूप से ट्रैक करने योग्य बनाया जाना चाहिए। परीक्षा केंद्रों का नियमित और सख्त ऑडिट होना चाहिए। पेपर लीक की जांच तय समय में पूरी हो और उसके परिणाम सार्वजनिक किए जाएं। केवल बिचौलियों या छात्रों पर कार्रवाई करने के बजाय उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए, जिनकी लापरवाही से ऐसी घटनाएं होती हैं।

साथ ही विश्वविद्यालयों, शिक्षा बोर्डों और भर्ती एजेंसियों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जहां केवल एक परीक्षा पर पूरा भविष्य निर्भर न रहे। जहां संभव हो, वहां कई चरणों में मूल्यांकन, स्कूल के प्रदर्शन, योग्यता परीक्षण, साक्षात्कार, पोर्टफोलियो और विषय आधारित आकलन जैसे विकल्पों को भी शामिल किया जा सकता है। हर प्रक्रिया लिखित परीक्षा से अलग नहीं हो सकती, लेकिन कोई भी व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं होनी चाहिए कि एक पेपर लीक लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित कर दे।

पेपर लीक को अक्सर कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर देखा जाता है, जबकि वास्तव में यह शिक्षा व्यवस्था की गहरी खामियों का संकेत है। जब तक भारत परीक्षा सुरक्षा के साथ-साथ परीक्षा आधारित चयन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएगा, तब तक हर नया पेपर लीक छात्रों के मन में यही सवाल छोड़ जाएगा—क्या जिस व्यवस्था पर उन्हें भरोसा करने के लिए कहा जाता है, वह वास्तव में भरोसे के योग्य है?

रईस अहमद 'लाली'

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