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एमिटी विश्वविद्यालय की नई तकनीक बनी कचरे को संसाधन में बदलने का समाधान

एमिटी विश्वविद्यालय की नई तकनीक बनी कचरे को संसाधन में बदलने का समाधान

एमिटी विश्वविद्यालय की नई तकनीक बनी कचरे को संसाधन में बदलने का समाधान

तेजी से फैलते शहरीकरण, बढ़ते प्लास्टिक कचरे और सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बीच एक सकारात्मक खबर सामने आई है। एमिटी विश्वविद्यालय (Amity University) के शोधकर्ताओं ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जो प्लास्टिक और बांस के अपशिष्ट को मिलाकर एक मजबूत, टिकाऊ और किफायती कम्पोज़िट सामग्री में बदल देती है। यह नवाचार न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण को कम करेगा, बल्कि निर्माण और फर्नीचर उद्योग के लिए एक बेहतर और टिकाऊ विकल्प भी प्रदान करेगा।

इस शोध का नेतृत्व प्रोफेसर हर्षा खड़कवाल ने किया, जिनकी टीम ने बांस की धूल और पुनर्चक्रित प्लास्टिक के संयोजन से ऐसी सामग्री तैयार की है, जो पारंपरिक लकड़ी की तुलना में अधिक मजबूत और लंबे समय तक टिकने वाली है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक भविष्य की ‘ग्रीन बिल्डिंग मैटेरियल’ विकास यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

कैसे काम करती है यह तकनीक?

इस कम्पोज़िट सामग्री में 60–80 प्रतिशत तक पुनर्चक्रित प्लास्टिक—हाई-डेंसिटी पॉलिथिलीन (HDPE), लो-डेंसिटी पॉलिथिलीन (LDPE) और पॉलिथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET)—और 20–40 प्रतिशत बांस या लकड़ी का अपशिष्ट शामिल होता है।

शोध के दौरान 5 किलोग्राम मिश्रण में 70 प्रतिशत प्लास्टिक और 30 प्रतिशत बांस पाउडर का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया। प्रक्रिया में बांस को पहले बारीक धूल में बदला गया, फिर साफ किए गए प्लास्टिक टुकड़ों के साथ मिलाकर गर्म किया गया। इसके बाद ‘कंप्रेशन मोल्डिंग’ तकनीक से इसे पैनल का रूप दिया गया।

परिणामस्वरूप, ऐसे पैनल तैयार हुए जो नमी, दीमक और कीटों से सुरक्षित हैं और वर्षों तक बिना खराब हुए टिक सकते हैं।

70% तक प्लास्टिक कचरा कम करने की क्षमता

भारत में प्लास्टिक कचरे का बोझ हर साल बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में यह तकनीक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। अनुमान है कि इस नवाचार से 70–80 प्रतिशत तक प्लास्टिक वेस्ट का पुनः उपयोग किया जा सकता है, जिससे लैंडफिल पर पड़ रहा दबाव 60–70 प्रतिशत तक घट सकता है।

बांस या लकड़ी के अवशेषों का प्रभावी उपयोग होने से खुले में जलाने की घटनाएं कम होंगी, जिससे स्थानीय स्तर पर वायु प्रदूषण 30–40 प्रतिशत तक घटने की उम्मीद है। कुल मिलाकर यह तकनीक प्रदूषण भार को 50–70 प्रतिशत तक कम करने में सक्षम मानी जा रही है।

मजबूती में लकड़ी से बेहतर

बांस फाइबर और प्लास्टिक के संयोजन से तैयार ये पैनल कई मामलों में लकड़ी से अधिक टिकाऊ हैं। इनमें नमी और दीमक का खास असर नहीं होता। लगभग 30 वर्ष से अधिक की आयु अनुमानित है। यह न सड़ते हैं, न मुड़ते या फटते हैं। रखरखाव बेहद आसान है—पेंट या पालिश की जरूरत नहीं, सिर्फ पानी से सफाई पर्याप्त। इन गुणों की वजह से यह सामग्री जलवायु के विभिन्न परिस्थितियों में लंबे समय तक प्रदर्शन बनाए रखती है।

निर्माण से फर्नीचर तक व्यापक उपयोग

यह तकनीक सिर्फ लैब तक सीमित नहीं, बल्कि औद्योगिक स्तर पर उत्पादन के लिए तैयार है। तैयार पैनल विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग किए जा सकते हैं जैसे— आउटडोर डेकिंग, गार्डन फर्नीचर, बाड़, पार्क बेंच, दीवार पैनल, दरवाजों के कोर, फार्मवर्क बोर्ड, प्लांटर बॉक्स और औद्योगिक पैलेट। समुद्री क्षेत्रों में भी इसका उपयोग संभव है क्योंकि इन पैनलों में पानी का अवशोषण 2.5 प्रतिशत से भी कम रहता है, जो इन्हें नमी-भरे वातावरण में भी टिकाऊ बनाता है।

पर्यावरण और अर्थव्यवस्था—दोनों के लिए फायदेमंद

यह नवाचार सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करता है। जहां एक ओर प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर नई लकड़ी की मांग 30–50 प्रतिशत तक कम हो सकती है, जिससे वनों के संरक्षण में मदद मिलेगी।

चूंकि यह सामग्री किफायती है, इसलिए आम उपभोक्ता भी इसे आसानी से अपनाएंगे, जिससे निर्माण और फर्नीचर उद्योग में टिकाऊ विकल्पों की उपलब्धता बढ़ेगी।

पेटेंटेड और औद्योगिक स्तर पर सफल

एमिटी विश्वविद्यालय की इस तकनीक को पेटेंट मिल चुका है और इसे औद्योगिक पैमाने पर सफलतापूर्वक विकसित किया जा चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह नवाचार प्लास्टिक प्रबंधन, निर्माण कार्य और फर्नीचर उद्योग में बड़ा बदलाव ला सकता है।

नोएडा से निकली यह खोज “कचरे से कमाल” का एक बेहतरीन उदाहरण बन गई है। बांस और प्लास्टिक का यह अनोखा संयोजन न केवल संसाधन-स्मार्ट है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

Asmita Sarkar

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