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भारतीय ज्ञान प्रणाली आज की चुनौतियों का सबसे प्रभावी समाधान है: प्रो. ए.एम. श्रीधरन

Indian Knowledge Systems Can Provide the Most Useful Solutions for Today's World - Prof. (Dr.) A. M. Sridharan

एलायंस यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस इन इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (CoE IKS) के निदेशक प्रो. (डॉ.) ए.एम. श्रीधरन से खास बातचीत 

ऐसे समय में जब दुनिया नई और जटिल चुनौतियों का सामना कर रही है, भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) भारत की गहरी सांस्कृतिक विरासत पर आधारित हल प्रदान करती है। बेंगलुरु के एलायंस यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस इन इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (CoE IKS) के निदेशक और कन्नूर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और मलयालम विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) ए. एम. श्रीधरन का मानना है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक आवश्यकताओं के साथ जोड़ना समय की मांग है। एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए कनिष्का से इस खास इंटरव्यू में उन्होंने NEP 2020 के संदर्भ में भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge Systems) की भूमिका, उपयोगिता और भविष्य की दिशा पर विस्तार से चर्चा की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश: 

प्रश्न 1: आज की शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान प्रणालियों को आप कैसे परिभाषित करते हैं? और आधुनिक भारत के लिए इन परंपराओं को दोबारा समझना क्यों ज़रूरी है?

– भारतीय ज्ञान प्रणाली उन विशाल और परस्पर जुड़े बौद्धिक परंपराओं का समूह है, जो हजारों वर्षों में भारत में विकसित हुईं और जिनमें दर्शन, कला, विज्ञान, पर्यावरण, भाषा, शासन, वास्तुकला और चिकित्सा जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं। आज इन परंपराओं को बीते समय की वस्तु की तरह नहीं बल्कि एक जीवित ढांचे की तरह देखा जा रहा है, जो समग्र, टिकाऊ और नैतिक सोच को बढ़ावा देता है। इन परंपराओं को दोबारा समझने का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इससे भारत अपनी बौद्धिक विरासत को दुनिया के सामने स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सकता है, साथ ही वैश्विक शोध को विविध दृष्टिकोणों से समृद्ध कर सकता है।

प्रश्न 2: क्या भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) केवल इतिहास तक सीमित है? तकनीक, प्रबंधन, पर्यावरण, मनोविज्ञान या वास्तुकला जैसे आधुनिक क्षेत्रों में इसकी क्या भूमिका है?

– कई छात्रों को लगता है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली सिर्फ इतिहास है, जबकि सच यह है कि इसकी अवधारणाएँ आज की तकनीक, प्रबंधन, पर्यावरण, मनोविज्ञान और वास्तुकला जैसे आधुनिक क्षेत्रों में भी बेहद उपयोगी हैं। पाणिनी के अष्टाध्यायी के सिद्धांत आज कम्प्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स और मशीन लर्निंग के कई मॉडलों को प्रभावित करते हैं। न्याय दर्शन की तर्क पद्धतियाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में रीजनिंग और पैटर्न समझने में मदद करती हैं। प्रबंधन क्षेत्र में अर्थशास्त्र से नेतृत्व, निर्णय-प्रक्रिया, कूटनीति और आर्थिक शासन के कई मॉडल मिलते हैं। पर्यावरण विज्ञान में पारंपरिक जल प्रबंधन और टिकाऊ कृषि आज भी प्रभावी रूप से लागू किए जा सकते हैं। भारतीय मनोविज्ञान की जड़ें गीता, योगसूत्र और नाट्यशास्त्र में हैं, जो भावनात्मक संतुलन और तनाव प्रबंधन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। वास्तुकला और डिजाइन में भी आज स्थानीय सामग्री और वास्तु सिद्धांतों का उपयोग जलवायु-अनुकूल संरचनाएँ बनाने के लिए किया जा रहा है।

प्रश्न 3: ऐसे कौन-से कम चर्चित उदाहरण हैं जिन्हें युवा सीखकर व्यावहारिक लाभ उठा सकते हैं?

– छात्रों को शुल्ब सूत्र जैसे ग्रंथों को अवश्य पढ़ना चाहिए, जिनमें कई ऐसे ज्यामितीय सिद्धांत मिलते हैं जो आधुनिक अवधारणाओं से भी पहले लिखे गए थे। कृषि संबंधी ज्ञान के लिए कृषि-पराशर और वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रंथ मिट्टी की देखभाल, बीज संरक्षण और जलवायु के अनुरूप खेती करने की तकनीक बताते हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुर्वेद की दिनचर्या और ऋतुचर्या जैसे सिद्धांत आज की लाइफस्टाइल समस्याओं से निपटने में बेहद प्रभावी माने जाते हैं और प्रिवेंटिव हेल्थ के रूप में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

प्रश्न 4: छात्र और पेशेवर भारतीय ज्ञान प्रणाली को अपने प्रोजेक्ट्स और कार्यों में कैसे शामिल कर सकते हैं?

– भारतीय ज्ञान प्रणाली को अपनाने का सबसे अच्छा तरीका है समग्र दृष्टि विकसित करना, संदर्भ को समझना और समस्याओं को अलग-अलग हिस्सों में न देखकर एक-दूसरे से जुड़े रूप में देखना। भारतीय परंपराओं पर आधारित शोध पद्धतियों में फील्डवर्क, मौखिक परंपराओं का अध्ययन, समुदायों से संवाद और अनुभव आधारित सीखने को महत्व दिया जाता है। यह तरीका विशेष रूप से समाज विज्ञान, मानव विज्ञान और पर्यावरणीय शोध में अत्यंत प्रभावी होता है। पंचकोश मॉडल व्यक्ति और संगठन दोनों के व्यवहार और स्वास्थ्य को समझने का समग्र तरीका प्रदान करता है, जबकि त्रिगुण सिद्धांत मानव प्रवृत्तियों और निर्णय लेने के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझने में उपयोगी है। भारतीय तर्क प्रणाली से छात्र अपने विचारों को बेहतर ढंग से संरचित करना सीख सकते हैं। वास्तुकला छात्र वास्तु के आधार पर स्पेस प्लानिंग सीख सकते हैं, डिजाइन छात्र पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र से प्रेरणा ले सकते हैं, प्रबंधन के क्षेत्र में गीता-आधारित नेतृत्व मॉडल अपनाए जा सकते हैं और कॉर्पोरेट सेक्टर योग और माइंडफुलनेस को वेलनेस प्रोग्रामों में शामिल कर सकता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली को केवल सजावट या परंपरा के रूप में नहीं बल्कि समस्या समाधान के एक व्यावहारिक उपकरण के रूप में अपनाया जाना चाहिए।

प्रश्न 5: भारतीय ज्ञान प्रणाली को समझने के लिए किन विषयों और कौशलों की आवश्यकता होती है?

– IKS को समझने के लिए बहुविषयक दृष्टिकोण अनिवार्य है क्योंकि यह क्षेत्र मानविकी, विज्ञान और रचनात्मक विषयों को एक साथ जोड़ता है। छात्रों को भारतीय दार्शनिक परंपराओं—विशेषकर न्याय, सांख्य और वेदांत—का आधारभूत ज्ञान होना चाहिए क्योंकि ये भारतीय ज्ञान प्रणाली की वैचारिक नींव हैं। संस्कृत या किसी शास्त्रीय भाषा का आधार होने से उन्हें मूल ग्रंथों को सीधे समझने में मदद मिलती है। शोध कौशल, फील्ड अध्ययन, दस्तावेज़ीकरण, तुलना और विश्लेषण की क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही सृजनशीलता, सांस्कृतिक समझ, नैतिकता और विभिन्न विचारों को एक साथ जोड़कर देखने की क्षमता भी आवश्यक है। विज्ञान का इतिहास, सौंदर्यशास्त्र, पर्यावरण, मनोविज्ञान, भाषाविज्ञान और विरासत अध्ययन जैसे विषयों का आधार IKS को वैश्विक संदर्भ में रखने में मदद करता है।

प्रश्न 6: वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान प्रणाली आधारित दृष्टिकोण कैसे अपना रहे हैं? भविष्य में क्या संभावनाएँ हैं? 

– NEP-2020 के बाद कई विश्वविद्यालय भारतीय दर्शन, पारंपरिक विज्ञान, कला और समाज से जुड़े नए कोर्स शुरू कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में ऐसे पेशेवरों की भारी आवश्यकता होगी, जो परंपरागत भारतीय ज्ञान को आधुनिक तकनीक और वैश्विक मानकों के साथ जोड़कर नए नवाचारों और समाधान तैयार कर सकें। 

प्रश्न 7: छात्रों के मन में करियर को लेकर असमंजस रहता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के अध्ययन से कौन-कौन से करियर विकल्प खुलते हैं?

– IKS कोई सीमित क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह छात्रों को कई विविध करियर विकल्प उपलब्ध कराता है। अकादमिक क्षेत्र में छात्र शोधकर्ता, शिक्षक, पांडुलिपि विशेषज्ञ, संरक्षण विशेषज्ञ, भाषाविद् या सांस्कृतिक इतिहासकार बन सकते हैं। इसके अलावा मनोविज्ञान में योग-आधारित मॉडल पर काम करने वाले विशेषज्ञ, वास्तुकला में वास्तु को समझने वाले आर्किटेक्ट, पर्यावरण क्षेत्र में पारंपरिक ज्ञान आधारित शोधकर्ता, तथा परफॉर्मिंग आर्ट्स से जुड़े विद्वान भी भारतीय ज्ञान प्रणाली के आधार पर अपना करियर बना सकते हैं। अकादमिक क्षेत्र के बाहर भी IKS हेरिटेज टूरिज़्म, संग्रहालय प्रबंधन, पारंपरिक कला उद्यम, योग और वेलनेस इंडस्ट्री, पोषण सलाह, नेतृत्व प्रशिक्षण, नीति परामर्श, ग्रामीण विकास, डिजिटल आर्काइविंग और डेटा आधारित सांस्कृतिक अध्ययनों में कई अवसर खोलता है। डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ और AI के विस्तार के साथ ज्ञान मैपिंग और सांस्कृतिक डेटा विश्लेषण जैसे नए करियर भी तेजी से उभर रहे हैं।

प्रश्न 8: AI और डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ के दौर में तकनीक भारत के पारंपरिक ज्ञान को कैसे संरक्षित कर सकती है?

– AI और डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ भारतीय ज्ञान प्रणाली के संरक्षण और प्रसार के तरीके को पूरी तरह बदल रही हैं। आज आधुनिक OCR इंजन संस्कृत और विभिन्न भारतीय भाषाओं को पढ़ने में सक्षम हैं, जिससे दुर्लभ पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा सकता है। तकनीक प्राचीन ज्ञान और आधुनिक दुनिया के बीच सेतु का काम करती है और उससे न सिर्फ पुरानी सामग्री संरक्षित होती है, बल्कि नई व्याख्याओं और नवाचारों के लिए भी रास्ते खुलते हैं। 

एडइनबॉक्स टीम

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