
जैसे-जैसे भारत का प्रीस्कूल सेक्टर तेज़ी से एक हाई-रिटर्न फ्रेंचाइज़ी बाज़ार में बदलता जा रहा है, वैसे-वैसे शिक्षा, व्यापार और ट्रस्ट कानून के बीच की सीमाओं को लेकर कानूनी विशेषज्ञों की चिंताएं भी बढ़ रही हैं। जिला जज कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता अभिषेक चौधरी ने एडइनबॉक्स (EdInbox) से बातचीत में बताया कि किस तरह प्रारंभिक शिक्षा चुपचाप भारत के सबसे मुनाफ़े वाले बिज़नेस मॉडल्स में शामिल हो गई है और क्यों यह पूरा सेक्टर एक कानूनी “ग्रे ज़ोन” की ओर बढ़ रहा है।
सवाल: आज प्रीस्कूल्स को फ्रेंचाइज़ी बिज़नेस की तरह क्यों बेचा जा रहा है? क्या बदला है?
अभिषेक चौधरी: यह बदलाव तब शुरू हुआ जब बड़ी चेन कंपनियों ने समझा कि प्रीस्कूल शिक्षा राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट के दायरे में नहीं आती। के–12 स्कूलों के विपरीत, प्रीस्कूल्स के लिए गैर-लाभकारी संस्था होना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। इसी वजह से आक्रामक फ्रेंचाइज़िंग का रास्ता खुल गया।
आज निवेशकों को साफ संदेश दिया जाता है—₹8–10 लाख निवेश करें और सालाना ₹40 लाख तक कमाएं। यह मॉडल शिक्षकों से ज़्यादा निवेशकों को आकर्षित करता है।
रंग-बिरंगे क्लासरूम्स के पीछे एक पूरा कमर्शियल इकोसिस्टम काम करता है—ब्रांडिंग फीस, रॉयल्टी, ट्रेनिंग चार्ज, करिकुलम किट, यहां तक कि यूनिफॉर्म की अनिवार्य खरीद। असल में पढ़ाने की पद्धति (पेडागॉजी) कुल लागत का बहुत छोटा हिस्सा होती है।
सवाल: कई प्रीस्कूल चेन ट्रस्ट या सोसाइटी के तहत चलते हैं। क्या यह विरोधाभास नहीं है?
अभिषेक चौधरी: यहीं असली कानूनी तनाव पैदा होता है। ट्रस्ट सीधे तौर पर “मुनाफ़ा” घोषित नहीं कर सकता, लेकिन वह सरप्लस बना सकता है। इस सरप्लस को कंसल्टेंसी फीस, मैनेजमेंट चार्ज, करिकुलम डेवलपमेंट, किराया या आउटसोर्स सेवाओं के ज़रिये बाहर निकाला जा सकता है।
अक्सर ट्रस्ट और ये सेवाएं देने वाली प्राइवेट कंपनियां एक ही प्रमोटर द्वारा संचालित होती हैं। पैसा कानूनी रूप से ट्रांसफर होता है, लेकिन चैरिटेबल गतिविधि की मूल भावना कमजोर पड़ जाती है।
जैसा कि मैं अक्सर कहता हूं—“यह तकनीकी रूप से अवैध नहीं है, लेकिन जब कोई ट्रस्ट कॉरपोरेट चेन की तरह काम करने लगे, तो कानून की भावना पर चोट लगती है।”
सवाल: फ्रेंचाइज़ी लेने वाले लोग क्या वाकई हाई रिटर्न के वादों से गुमराह होते हैं?
अभिषेक चौधरी: यह बहुत आम है। लोग इसे गारंटीड रिटर्न वाला बिज़नेस समझकर जुड़ते हैं। बाद में रॉयल्टी, अनिवार्य अपग्रेड्स और मार्केटिंग फीस का बोझ सामने आता है। कई फ्रेंचाइज़ी ओनर्स कहते हैं कि चेन कंपनी उनकी तुलना में ज़्यादा कमाती है।
आज प्रीस्कूल की सफलता काफी हद तक लोकेशन पर निर्भर है। लोअर या मिडिल-इनकम इलाकों में यह मॉडल अक्सर फेल हो जाता है। प्रीस्कूल अब शिक्षा की ज़रूरत नहीं, बल्कि एक लग्ज़री प्रोडक्ट बनता जा रहा है।
सवाल: इसका असर अभिभावकों पर कैसे पड़ रहा है?
अभिषेक चौधरी: आज माता-पिता प्रीस्कूल में एडमिशन को प्रीमियम कंज़्यूमर ब्रांड की तरह देखने लगे हैं। फीस कई बार प्राइमरी स्कूलों के बराबर होती है, लेकिन टीचर्स की सैलरी या करिकुलम की गुणवत्ता पर पारदर्शिता नहीं होती।
कई अभिभावक कहते हैं—“यह ट्रस्ट द्वारा चलाया गया स्कूल कम और कॉरपोरेट प्राइसिंग ज़्यादा लगता है।”
यह गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि प्रारंभिक शिक्षा बच्चों की नींव होती है। अगर यह केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित हो गई, तो असमानता सबसे शुरुआती स्तर से ही बढ़ने लगेगी।
सवाल: इस स्थिति में किस तरह के रेगुलेटरी बदलाव ज़रूरी हैं?
अभिषेक चौधरी: भारत को तुरंत इन सुधारों की ज़रूरत है—
– प्रीस्कूल्स के लिए स्पष्ट लाइसेंसिंग मानक
– फ्रेंचाइज़ी चलाने वाले ट्रस्ट्स के लिए पारदर्शिता नियम
– फीस स्ट्रक्चर और अनिवार्य खरीद की निगरानी
– शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता और वेतन मानक
– प्रारंभिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा
फिलहाल प्रीस्कूल एक रेगुलेटरी वैक्यूम में काम कर रहे हैं, और इसी खाली जगह में व्यावसायिक हित फल-फूल रहे हैं।
सवाल: क्या हम अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं?
अभिषेक चौधरी: बिल्कुल। अगर निगरानी नहीं हुई, तो यह सिस्टम पूरी तरह प्रॉफिट-फर्स्ट मॉडल की ओर चला जाएगा—जहां बच्चे, जो समाज का सबसे संवेदनशील वर्ग हैं, फ्रेंचाइज़ी इकॉनमी के ग्राहक बनकर रह जाएंगे।
प्रारंभिक शिक्षा को निवेश उत्पाद नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक हित के रूप में देखा जाना चाहिए।




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