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वैज्ञानिक अनुसंधान से भी अधिक जटिल है विज्ञान संचार और लेखन: डॉ. मनीष मोहन गोरे

वैज्ञानिक अनुसंधान से भी अधिक जटिल है विज्ञान संचार और लेखन: डॉ. मनीष मोहन गोरे

राष्ट्रीय विज्ञान संचार और नीति संस्थान (CSIR) से संबद्ध ख्यात वैज्ञानिक, लेखक और विज्ञान संचारक डॉ. मनीष मोहन गोरे से ख़ास बातचीत

भारत में विज्ञान संचार और लोकोपयोगी विज्ञान की मुहीम में विगत करीब तीन दशकों से काम कर रहे डॉ. मनीष मोहन गोरे से बातचीत एक सुखद अनुभव रहा। वे एक वैज्ञानिक, लेखक और प्रभावशाली विज्ञान संचारक हैं। नई दिल्ली स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR) में वे विज्ञान संचार प्रभाग में अध्ययन और शोध का नेतृत्व कर रहे हैं। वनस्पति विज्ञान में डॉक्टरेट होने के बावजूद उन्होंने विज्ञान लेखन, संपादन और लोकप्रियकरण को अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बनाया। पर्यावरण, वैज्ञानिकों की जीवनी, जन्तु व्यवहार, भारतीय विज्ञान, जैव विविधता और विज्ञान कथाओं पर उनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें पाठकों और विशेषज्ञों ने समान रूप से सराहा है। विज्ञान संचार में योगदान के लिए उन्हें सर सीवी रमण तकनीकी लेखन पुरस्कार, राजभाषा गौरव पुरस्कार और जगपति चतुर्वेदी बाल विज्ञान लेखन सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

इन्हीं अनुभवों और उनके विचारों को समझने के लिए एडइनबॉक्स (EdInbox) की तरफ से रईस अहमद ‘लाली’ ने सीएसआईआर-निस्पर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं ‘विज्ञान प्रगति’ पत्रिका के संपादक डॉ. मनीष मोहन गोरे से यह विशेष बातचीत की।

  1. विज्ञान संचार के क्षेत्र में आपका सफर कैसे शुरू हुआ? आपको इस दिशा में काम करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

– मैं मूलतः विज्ञान का विद्यार्थी रहा, और मेरे बचपन के दिनों में किताबों से लदे घर और पिता के साहित्य प्रेम ने मुझमें साहित्य (जो बाद में विज्ञान साहित्य की ओर उन्मुख हो गया), संचार और लेखन की ओर काम करने के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर 1997 में जब मैं बी.एस-सी. का छात्र था तो मैं कुछ अनुभवी विज्ञान लेखकों के संपर्क में आया। उसी समय मैं राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (एनसीएसटीसी) के संपर्क में आया जिसने मेरे भीतर पनप रहे एक विज्ञान संचारक और विज्ञान लेखक को उचित दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। मेरे पिता श्रीचंद गोरे जो अंग्रेजी साहित्य के शिक्षक और शौकिया तौर पर पत्रकार रहे, उन्होंने परोक्ष रूप से मेरे भीतर मौजूद एक लेखक को उकसाया। हालांकि वे नहीं चाहते थे कि मैं साहित्य सृजन या लेखन को अपना करियर बनाऊं क्योंकि इस पेशे में जीवनयापन कठिन होता है, ऐसा वे मानते थे। मैं भी एक तरह से देखें तो विज्ञान संचार-लेखन शौकिया तौर पर करता रहा, यह अलग बात है कि विज्ञान संचार के संस्थान में मुझे सेवा करने का अवसर मिला है जिसके कारण मेरी स्वाभाविक रुचि और सेवा दायित्व में काफी एकरूपता का योग बन जाता है और इससे निष्कर्ष बड़े सुन्दर और सकारात्मक आते हैं।

  1. वनस्पति विज्ञान से विज्ञान लेखन और विज्ञान संचार की ओर आपके झुकाव का कौन-सा मोड़ सबसे महत्वपूर्ण रहा?

– वनस्पति विज्ञान मेरे अध्ययन का विषय रहा है। विभिन प्रकार के पौधे, उनके भीतर होने वाली जैविक क्रियाएं और उनके पीछे निहित विज्ञान मुझे अक्सर रोमांचित करता रहा। पौधों के विज्ञान को आमजन की भाषाशैली में बताने से मेरे विज्ञान लेखन की शुरुआत 1994 से हुई। इसके अलावा मैंने जंतु विज्ञान, जंतुओं के व्यवहार, पर्यावरण के नवीनतम मुद्दों, भारत में विज्ञान और भारतीय वैज्ञानिकों के संबंध में मैं विज्ञान लेखन करता रहा हूँ। अपने लेखन के आरम्भ में जब मेरे मन में यह विचार आया कि बच्चों और किशोरों को विज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में उन्मुख करने के लिए विज्ञान लेखन बेहद कारगर युक्ति हो सकती है और फिर उस दिशा में मैं पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लिखने लगा। यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव था मेरे जीवन का या इसे वह मोड़ भी कह सकते हैं जिसने मुझे विज्ञान संचार और लेखन में काम करने की ओर प्रेरित किया। 

  1. CSIR-NIScPR के विज्ञान संचार प्रभाग में आप किस तरह के अनुसंधान और प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर रहे हैं?

– सीएसआईआर-निस्पर भारत का एक अग्रणी विज्ञान संचार और विज्ञान नीति अनुसन्धान संस्थान है जिसके पास लगभग 75 वर्षों की एक समृद्ध विरासत है। यहां पर एक लोकप्रिय विज्ञान विभाग है जहाँ से ‘विज्ञान प्रगति’, ‘साइंस रिपोर्टर’ और ‘साइंस की दुनिया’ नामक तीन लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाएं क्रमशः हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं में प्रकाशित की जाती हैं। मैं ‘विज्ञान प्रगति’ के संपादक के दायित्व के अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में विज्ञान संचार से संबद्ध अनुसन्धान और भारतीय प्रयोगशालाओं की वैज्ञानिक उपलब्धियों से जुड़ी परियोजना पर कार्य कर रहा हूँ।

  1. भारत में विज्ञान संचार को मजबूत बनाने में आपके संस्थान की क्या भूमिका है?

– देश की आजादी के चार वर्ष बाद 1951 में भारत के अग्रणी वैज्ञानिक अनुसन्धान संगठन- सीएसआईआर (वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसन्धान परिषद्) के अंतर्गत प्रकाशन एवं सूचना निदेशालय (पीआईडी) का गठन किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य विज्ञान के शोध को समाज तक ले जाने से संबंधित प्रयत्न करना था। वही पीआईडी, वर्तमान में निस्पर (राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसन्धान संस्थान) है। अब आप समझ सकते हैं कि निस्पर की देश में विज्ञान संचार को सशक्त बनाने में क्या भूमिका रही है। विज्ञान की पत्रिकाओं, शोध जर्नल, लोकविज्ञान पुस्तकों का प्रकाशन इसके अहम योगदान हैं। “भारत की संपदा” पुस्तक श्रृंखला में भारत में मिलने वाली प्राकृतिक संपदाओं (खनिज, जंतु, वनस्पति) का अनमोल खजाना लिपिबद्ध किया गया है। राष्ट्रीय विज्ञान पुस्तकालय भी निस्पर की एक महत्वपूर्ण गतिविधि है जो पूरे देश की पत्रिकाओं-जर्नलों को ISSN क्रमांक प्रदान करती है।

  1. आप कई वर्षों से विज्ञान लेखन और संपादन से जुड़े हैं—इस दौरान आपने कौन-से बड़े बदलाव महसूस किए?

– विज्ञान संचार से जुड़े निरन्तर प्रयासों के कारण आमजन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के संबंध में रुचि का विकास हुआ है, नहीं तो पहले इन्हें गंभीर और दुरूह विषय मानकर इनसे दूरी बना ली जाती थी। विज्ञान संचार ने बच्चों और युवाओं को वैज्ञानिक शोध से जोड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप आज हजारों युवा विज्ञान और तकनीक के नवीनतम क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिकल्पना लेकर आगे आ रहे हैं। साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले लोग विज्ञान संचार और लेखन से प्रेरित होकर जीवनोपयोगी स्टार्टअप और उद्यमिता, कृषि के क्षेत्रों में नवाचार कर रहे हैं। ये कुछ बड़े बदलाव विज्ञान संचार से आये हैं जो कि सुखद और जीवन की समस्याओं को सुलझाने में मददगार साबित हो रहे हैं।

  1. आम पाठकों के लिए विज्ञान को सरल और रोचक बनाने की सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?

– उन्हें विज्ञान की संकल्पना या सिद्धांत को समझा पाना। यहीं पर विज्ञान संचार की भूमिका सामने आती है। यह एक कठिन कार्य है, और मेरा मानना है कि विज्ञान संचार या लेखन वैज्ञानिक अनुसन्धान से भी जटिल कार्य है। वो इसलिए क्योंकि वैज्ञानिक अनुसन्धान की एक परिभाषित परिपाटी या फ्रेमवर्क होता है, लेकिन विज्ञान संचार का ऐसा कोई सुपरिभाषित फ्रेमवर्क नहीं होता। आपको एक जनजाति, किसान या एक ऐसे बच्चे को विज्ञान की अवधारणा समझानी होती है जिसने विज्ञान की कोई शिक्षा-दीक्षा नहीं ली है। इसमें सरल भाषा, लक्ष्य समूह के अनुकूल परिवेश-संस्कृति और जीवन के व्यावहारिक प्रसंगों-उदाहरणों के माध्यम से या उनका सहारा लेकर विज्ञान की जानकारी साझा की जाती है। यही इसकी चुनौती है और इसी में इसका समाधान भी छिपा हुआ है।

  1. भारत में विज्ञान संचार को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए आप किस तरह के कदम आवश्यक मानते हैं?

– भारत पहले से ही विश्व स्तर के विज्ञान संचार कार्यक्रम संचालित करता आ रहा है। अलबत्ता भारत में ऐसे कई अनोखे प्रयोग हुए हैं और हो रहे हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं हुए हैं। जिला, राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तरों पर बच्चों में विज्ञान माडल विकसित करने का प्रयत्न अनोखा है। जनजातीय समुदायों के बीच विज्ञान की समझ विकसित करने का प्रयास दुनिया के लिए एक मिसाल है। ऐसे अनेक प्रयोग हैं जो दुनिया में पहली बार और हमारे देश में हुए हैं। 

  1. पर्यावरणीय चुनौतियों पर समाज में जागरूकता बढ़ाने में विज्ञान संचारक क्या भूमिका निभा सकते हैं?

– अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़ी जानकारी कहानी, कविता, चुटकुलों, नाटक के स्वरूप में प्रस्तुत करके आमजन को जागरूक किया जा सकता है। विज्ञान कथाएं विज्ञान संचार की एक सशक्त विधा है, जिनके द्वारा भी पर्यावरण चेतना जगाने में काम किया जा सकता है।

  1. आपकी विज्ञान कथाओं को पाठकों में अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है। भारतीय समाज में विज्ञान कथाओं की क्या भूमिका आप देखते हैं?

– विज्ञान कथाएं आने वाले कल की कहानी होती हैं जो विज्ञान और तकनीक से प्रभावित समाज का एक बिम्ब प्रस्तुत करती हैं। यह विधा एक सचेतक आख्यान की तरह होती है जो नाटकीयता के साथ रोमांचक तरीके से आमजन के जीवन के रास्ते चलते हुए एक ऐसे भविष्य तक पाठक को लेकर जाती है जो आश्चर्य, रोमांच और संकट से भरा होता है। विज्ञान कथाएं न केवल भारत बल्कि समग्र विश्व के समाज को तकनीकी उन्नति के साथ एक तार्किक संतुलन बनाये रखने की प्रेरणा देती हैं। 

  1. क्या विज्ञान कथा बच्चों और युवाओं में वैज्ञानिक सोच विकसित करने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है?

– अवश्य। विज्ञान कथाएं एक काल्पनिक मगर अवश्यम्भावी भविष्यगत समाज का चित्र हमारे सामने रखती हैं जो हमें अपने वर्तमान व्यवहार में उचित बदलाव की प्रेरणा देती हैं ताकि हम उस संकटपूर्ण भविष्य को समय रहते टाल सकें जिसका पूर्वानुमान विज्ञान कथा में बतलाया जाता है। इस मायने में बच्चों और युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में विज्ञान कथाएं एक प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।

  1. आपको क्या लगता है कि डिजिटल मीडिया के दौर में विज्ञान संचार के लिए कौन-सी नई क्षमताएँ जरूरी हो गई हैं?

– डिजिटल और सोशल मीडिया केवल माध्यम हैं कला, साहित्य, विज्ञान, खेल और मनोरंजन की सामग्रियों को समाज तक पहुंचाने के लिए। इन नए संचार माध्यमों के अनुरूप विज्ञान संचार को प्रामाणिक सामग्री के साथ समाज के मुखातिब होना पड़ेगा और इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं।

  1. क्या आपको लगता है कि आज भी विज्ञान और समाज के बीच एक दूरी मौजूद है?

– विज्ञान और समाज के बीच आज भी दूरी तो है लेकिन पहले के मुकाबले यह दूरी कम हुई है। आने वाले समय में जैसे-जैसे आमजन की वैज्ञानिक समझ बढ़ेगी, यह दूरी सिमटती जाएगी और इसमें विज्ञान संचार को अहम भूमिका निभानी पड़ेगी।

  1. युवा विज्ञान लेखकों और शोधार्थियों के लिए आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

– युवा विज्ञान लेखकों को सलाह नहीं बल्कि एक बहुत साधारण बात कहना चाहूँगा कि उन्हें ऐसे मुद्दों पर विज्ञान लेखन करना चाहिए जिनसे आमजन का जीवन जुड़ा हुआ हो जैसे कि खेती के दौरान देर तलक बैठकर या झुककर काम करने से किसानों की पीठ, हाथ और पैरों में दर्द होने लगता है, तो इस कठिनाई को दूर करने के लिए कौन से उपकरण या टूल उपयोगी हो सकते हैं, ऐसे विषयों पर लिखने की आवश्यकता है। शोधार्थियों से मैं कहना चाहूँगा कि वे जिस विषय में भी शोध कर रहे हैं, वो अपने शोध से समाज का क्या भला कर सकते हैं या उनके शोध का सामाजिक लाभ क्या है, उस विषय पर छोटे लेख, वीडियो, रील, कविता या कहानी बनाकर आमजन के साथ साझा करें। आप यकीन मानिए इस तरह के छोटे प्रयासों से समाज को फायदा तो होगा ही, आपको एक ऐसी आत्मसंतुष्टि होगी जिसका अनुभव आपने पहले कभी नहीं किया होगा।

एडइनबॉक्स टीम

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