
मीडिया शिक्षक और शोधकर्ता डॉ. शशि पांडे से एडइनबॉक्स की ख़ास बातचीत
तेज़ी से बढ़ती AI-जनित सामग्री, डीपफेक्स और लगातार बदलते सूचना पारिस्थितिकी तंत्र के दौर में न्यूज़रूम बार-बार अपनी मूल जिम्मेदारियों की कसौटी पर कसा जा रहा है। प्रत्यक्षदर्शी सूचनाओं और संपादकीय विवेक पर आधारित यह पेशा अब अभूतपूर्व तकनीकी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इस पूरे परिवर्तन के केंद्र में एक अहम सवाल बार-बार सामने आता है: जब तकनीक झूठ को सच जैसा बना दे, तो पत्रकार सच की रक्षा कैसे करें?
एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए पूजा खन्ना से बातचीत में लंबे समय से मीडिया शिक्षक और शोधकर्ता रहे डॉ. शशि पांडे देशभर के न्यूज़रूम से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक हो रहे बदलावों पर अपनी राय रखते हैं। प्रैक्टिस और शिक्षण—दोनों की गहरी समझ उन्हें पत्रकार की बदलती भूमिका, मीडिया शिक्षा के भविष्य और भारत के क्षेत्रीय मीडिया पर बढ़ते दबाव को नए नजरिये से देखने पर मजबूर करती है।
डॉ. पांडे की यह राय चेतावनी भी देती है और सीख भी, और एक सरल बात को रेखांकित करती है: उपकरण बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता का नैतिक मूल कभी नहीं बदलता। एल्गोरिदमिक अव्यवस्था, भ्रामक सूचनाओं और गति आधारित ख़बरों के प्रकाशन के इस दौर में उनकी दृष्टि युवा पत्रकारों को फिर याद दिलाती है कि इस पेशे का मूल मिशन वही है—सच की पुष्टि करना और सवाल पूछना, वह भी पूरी ईमानदारी के साथ सार्वजनिक हित में।
आज के मीडिया छात्रों के लिए, जिन्हें लगातार जटिल होते डिजिटल संसार में अपनी जगह बनानी है, उनके ये विचार सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि नैतिक और पेशेवर अस्तित्व का एक ढांचा बन जाते हैं।
प्रश्न 1: दो दशकों से अधिक समय न्यूज़रूम और अकादमिक दुनिया में बिताने के बाद, AI-जनित कंटेंट और डीपफेक्स के दौर में आप पत्रकार की भूमिका को कैसे देखते हैं?
– अपने वर्षों के अनुभव के आधार पर मैं यह और अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाया हूं कि डीपफेक और एआई-जनित कंटेंट के दौर में पत्रकारों की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। एक ऐसी दुनिया में जहां तस्वीरें और वीडियो आसानी से बदले जा सकते हैं, पत्रकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी विश्वसनीयता और सत्यापन सुनिश्चित करना है। इसके लिए डिजिटल फोरेंसिक, मेटाडेटा विश्लेषण और एआई-डिटेक्शन टूल्स को पारंपरिक रिपोर्टिंग तकनीकों के साथ मिलाना होगा। निष्पक्षता, समय पर त्रुटि सुधार और मानव तथा एआई इनपुट के बारे में पारदर्शिता जैसे नैतिक तत्व बेहद जरूरी हैं। तकनीक चाहे जितनी बदल जाए, लेकिन पत्रकारिता का पहला सिद्धांत—सटीक और सत्यापित जानकारी देना—हमेशा वही रहता है।
प्रश्न 2: आज ज्यादातर छात्र पारंपरिक प्रिंट की बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म पसंद करते हैं। ऐसे में मीडिया शिक्षा खुद को कैसे अनुकूल बनाती है ताकि छात्र मल्टीमीडिया-फर्स्ट इंडस्ट्री के लिए तैयार हों?
– आज मीडिया शिक्षा को डिजिटल-फर्स्ट दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। इसमें डिजिटल स्टोरीटेलिंग, वीडियो प्रोडक्शन, डेटा जर्नलिज़्म और सोशल मीडिया एनालिटिक्स की समझ शामिल होनी चाहिए। छात्रों को यह सीखना जरूरी है कि वे अपने ऑडियंस को कैसे जोड़ें, जानकारी की फैक्ट-चेकिंग कैसे करें और प्लेटफॉर्म-विशेष कंटेंट स्ट्रैटेजी कैसे तैयार करें। शिक्षण मॉडल भी बदल रहे हैं—अब ज्यादा फोकस प्रैक्टिकल लैब्स, न्यूज़रूम सिमुलेशन, समूह-आधारित प्रोजेक्ट्स और टूल-ड्रिवन लर्निंग पर होता है। इससे सुनिश्चित होता है कि छात्र काम के लिए तैयार, लचीले और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सफल पेशेवर बनकर निकलें।
प्रश्न 3: आपके अनुसार सिकुड़ते न्यूज़रूम और हाइपर-लोकल खबरों की बढ़ती मांग के बीच आज क्षेत्रीय मीडिया किन वास्तविक चुनौतियों का सामना कर रहा है?
-आज का क्षेत्रीय मीडिया लगातार अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। न्यूज़रूम छोटे होते जा रहे हैं, वित्तीय स्थिति अस्थिर है, और तेज़ हाइपर-लोकल खबरों की मांग लगातार बढ़ रही है। रिपोर्टरों की संख्या कम होने से खबरों की गहराई और सटीकता बनाए रखना कठिन हो जाता है। तेज़ी से बढ़ते डिजिटल प्लेटफॉर्म की प्रतिस्पर्धा ने क्षेत्रीय मीडिया के सामने भाषाई विविधता और स्थानीय संवेदनशीलताओं को संभालने की चुनौती और बढ़ा दी है। क्षेत्रीय मीडिया तभी मजबूत रह सकता है जब फील्ड रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया जाए, डिजिटल कौशलों में निवेश हो, और दीर्घकालिक राजस्व मॉडल विकसित किए जाएँ ताकि उच्च स्तर की क्षेत्रीय पत्रकारिता जारी रह सके।
प्रश्न 4: NAAC के साथ आउटरीच और समुदाय-आधारित पहलों पर काम करने के अनुभव के आधार पर, आप इस कार्यक्रम में छात्रों को सामाजिक महत्व की कहानियाँ जुटाने के लिए कैसे प्रशिक्षित करना चाहेंगे?
– फील्ड ट्रिप, सामुदायिक-आधारित रिपोर्टिंग और सहयोगात्मक प्रोजेक्ट्स पत्रकारिता के छात्रों को सामाजिक प्रभाव वाली कहानियाँ बताना सिखाते हैं। NAAC-शैली के आउटरीच के माध्यम से छात्र विभिन्न समुदायों के बीच जाकर उनकी वास्तविक जरूरतों को पहचानते हैं और स्थानीय मुद्दों पर सीधे काम करते हैं। इस प्रक्रिया में वे जिम्मेदार पत्रकारिता सीखते हैं—ऐसी रिपोर्ट तैयार करना जो हाशिए पर मौजूद लोगों की आवाज़ को मज़बूत करे। नैतिक फील्डवर्क, जमीनी रिपोर्टिंग और समाधान-आधारित स्टोरीटेलिंग के व्यावहारिक प्रशिक्षण से छात्र सामाजिक परिवर्तन लाने वाली पत्रकारिता की मजबूत क्षमता विकसित करते हैं।
प्रश्न 5: ऐसे युवा मीडिया ग्रेजुएट्स के लिए आपका क्या सुझाव है जो तेज़ी के इस दौर में भी नैतिकता और विश्वसनीयता बनाए रखना चाहते हैं, जहाँ अक्सर स्पीड, सटीकता पर भारी पड़ जाती है?
– मीडिया संगठनों में काम करने वाले युवा ग्रेजुएट्स को गति से ज्यादा सटीकता पर जोर देना चाहिए— स्रोतों की पुष्टि करें, सभी तथ्यों को दोबारा जांचें, और अप्रमाणित जानकारी को प्रकाशित करने से साफ़ इनकार करें। उच्च नैतिक मानकों का पालन जरूरी है—रिपोर्टें पारदर्शी हों और यदि कोई गलती हो जाए तो उसे तुरंत स्वीकार किया जाए। इसके लिए आलोचनात्मक सोच, धैर्य और डिजिटल वेरिफिकेशन स्किल्स की आवश्यकता होती है। तेज़ अपडेट और प्रतिस्पर्धी न्यूज़ साइकिल के बीच भी, वह पत्रकार हमेशा विश्वसनीय रहेगा जो ईमानदारी, निष्पक्षता और जिम्मेदारी को प्राथमिकता देता है।




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